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हमारे कर्म और विचार हमारे भविष्य को आकार देते हैं: साध्वी स्नेहाश्री जी म. सा.

जैसी मति, वैसी गति” का अर्थ है कि मनुष्य की मृत्यु के समय जैसी मानसिक स्थिति या विचार होते हैं, उसी के अनुसार उसे अगला जन्म मिलता है. इसका मतलब है कि हमारे कर्म और विचार हमारे भविष्य को आकार देते हैं, खासकर मृत्यु के समय. – साध्वी स्नेहाश्री जी म. सा. का उद बोधन। आकुर्डी निगडी प्राधिकरण श्री संघ के प्रांगण में आज साध्वी स्नेहाश्री जी म. सा. ने अपने प्रवचन में समयका महत्व समझाते हुये कहा कि जैसी मति वैसी गती!   अंतिम समय का महत्व: यह सुभाषित इस बात पर जोर देता है कि मनुष्य के जीवन का अंतिम क्षण बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि उस समय के विचार और भावनाएं ही यह निर्धारित करती हैं कि उसे अगला जन्म कैसा मिलेगा. कर्मों का प्रभाव: हमारे कर्म और विचार हमारे मन को प्रभावित करते हैं, और मृत्यु के समय हमारा मन जैसा होता है, उसी के अनुसार हमें अगला जन्म मिलता है. आध्यात्मिक दृष्टिकोण: भारत...

सन्त समागम हितकारी- डॉ श्री वरुण मुनि जी

श्री गुजराती जैन संघ गांधीनगर में चातुर्मास विराजित दक्षिण सूर्य ओजस्वी प्रवचनकार डॉ श्री वरुण मुनि जी महाराज ने शनिवार को धर्म सभा में उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि संत समागम हितकारी है। संत के दर्शन मात्र से हमारे पाप,ताप और संताप सभी दूर हो जाते है। गुरु हमारे जीवन निर्माता है। गुरु की शरण में जाएं तो अंहकार को छोड़कर निर्विकार भाव से जाना चाहिए। तभी आप गुरु कृपा आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं और गुरु भगवंत से अपने आत्म कल्याण का, आत्म ज्ञान का सही दिशा बोध, ज्ञान हासिल कर पाएंगे। उन्होंने आगे कहा कि सत्संग की महिमा बहुत बड़ी बतायी गई है। सत्संग से सुख मिलता है जीवन का कण कण खिल उठता है। सभी धर्म शास्त्रों, दर्शनो में सत्संग, सन्त समागम का विशिष्ट महत्व बतलाया गया है। जैसे माता अपने संतान को गर्भ संस्कार के साथ उसके जन्म लेने के बाद भी शिशु को प्रदान किए संस्कार संतान में...

ठान लें तो तपस्या संभव है : मुनि डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार

तपस्वी भाई का तपोभिनंदन  आचार्य महाश्रमण के प्रबुद्ध सुशिष्य मुनि डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार, मुनि रमेश कुमार, मुनि पद्म कुमार एवं मुनि रत्न कुमार के पावन सान्निध्य एवं तेरापंथी सभा के तत्वावधान में शनिवार को स्थानीय तेरापंथ धर्मस्थल में मास्टर मुदित कोठारी (सुपुत्र : दीपक-संजना कोठारी के अठाई (8) की तपस्या के उपलक्ष्य में तपोभिनंदन समारोह का आयोजन किया गया। इस अवसर पर तेरापंथी सभा, गुवाहाटी की ओर से साहित्य एवं प्रशस्ति-पत्र प्रदान कर तपस्वी भाई के तप की अनुमोदना की गई। इस अवसर पर मुनि डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार ने तपस्वी भाई की अनुमोदना करते हुए कहा कि कोई भी व्यक्ति तपस्या करने के लिए ठान ले तो वह अवश्य पूर्ण होता है। इसी का उदाहरण यह तपस्वी बालक है। तपस्या के द्वारा व्यक्ति अपने परिवार, समाज एवं संघ का गौरव बढ़ाता है। तपस्वी मुदित कोठारी इसी तरह तपस्या के क्षेत्र में आगे बढ़ते रहे, यही कामना है।  ...

…हे बंधन कोणामुळे आहे, याचा विचार करा-प.पू.रमणीकमुनीजी म.सा.

जालना : आसक्ती, बंधन, आणि बेडीया हे कुणी घातलं तर पापने! तुमच्या गळ्यातील हार, कानातील आणि नाकातील कुणामुळं मिळालं! आसक्ती, दिवाना पण, जीस बंधन मिलते वो तो मोहनीया करम है। परंतू आपल्या हे लक्षातच येत नाही, त्याला कोण काय करणार! असा हितोपदेश वाणीचे जादुगार श्रमण प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा. यांनी येथे बोलतांना दिला. ते गुरु गणेश सभा मंडपात चार्तुमासानिमित्त आयोजित प्रवचनात श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा.बोलत होते. यावेळी विचार पिठावर अन्य साध्वींची उपस्थिती होती. पुढे बोलतांना श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार, प.पू.रमणीकमुनीजी म. सा. म्हणाले की, आज- काल पुरुषही कानात घालू लागले आहेत. आणि हातातले ! कधी- कधी तर आमच्यासाठी खतरा बनून येतो. तरीही आम्ही घालायचे काही सोडत नाहीत. ये जो दिवाना पण है । पागल पण है… छोड दो इसे और आसक्तीमुक्त जीवन जगा, असेसांगून ते म्हणाले ...

कर्म बंधन केदो कारण राग द्वेष: साध्वी सम्बोधि

वृक्ष की विशालता का मुख्य श्रेय बीज को जाता है इसलिए वृक्ष को जानने हेतु बीज को जानना जरूरी है। ज्ञानियों ने कर्म महावृक्ष के दो बीज बताये हैं, राग और द्वेष। किसी भी प्रवृत्ति की पृष्ठभूमि में जब तक राग या द्वेष नहीं होगा तब तक कर्मबन्ध भी नहीं होगा। राग-द्वेष बिजली की भाँति है, बिजली दो प्रकार की होती है। एक बिजली अपनी ओर खींचती है तो दूसरी झटका देकर दूर फेंक देती है। दोनों प्रकार की बिजलियाँ मारक होती हैं। दोनों का दुष्परिणाम मनुष्य को भोगना पड़ता है। राग प्राणियों को अपनी ओर खींचने का काम करता है तो द्वेष झटका देकर दूर फेंकने वाली विद्युत की भाँति है। राग भाव चाहे किसी व्यक्ति के प्रति हो या वस्तु के प्रति हो किसी उपलब्धि के प्रति हो या अनुकूल परिस्थिति के प्रति हो, रागाविष्ट व्यक्ति उसकी ओर खींचता चला जाता है। राग भाव से मनपसंद का आकर्षण और द्वेष भाव से नापसंद म विनर्गग्ण ज्ञापन्न होता...

श्रुत ज्ञान सत्संग से जीवन महक उठता है- डॉ श्री वरुण मुनि जी

श्री गुजराती जैन संघ गांधीनगर में चातुर्मास विराजित दक्षिण सूर्य ओजस्वी प्रवचनकार डॉ श्री वरुण मुनि जी म. सा. ने शुक्रवार को धर्म सभा में उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि एक वह चीज जिसके सुनने मात्र से मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है वो है आगम वाणी से श्रुत ज्ञान की प्राप्ति और ज्ञान से विज्ञान और क्रमशः आगे बढ़ते हुए संयम के साथ सिद्धि की प्राप्ति साधक को हो सकती है। श्रुत ज्ञान की महिमा भी अपरंपार है। तीर्थंकर भगवान की जिनवाणी साधक को संसार सागर से तिराने वाली है। आवश्यकता है बस यही कि व्यक्ति गुरु का सत्संग समागम प्राप्त कर गुरु वचनों को अपने अन्तर हृदय में धारण करें। ज्ञान का फल विरति है। विद्यावान गुणी व्यक्ति अपने जीवन में कोई उलझन, मुसीबत आए तो भी उन समस्याओं से विचलित नहीं होते हुए शान्त चित्त होकर चिन्तन करता है और उसमें से निकलने का रास्ता निकाल लेता है और समभाव से हर ...

पापमुक्ती ही पुण्यापासूनच: प.पू.रमणीकमुनीजी म.सा.

जालना : आसक्तीचं मनुष्यालाच कोणत्या थराला नेऊन ठेवील हे सांगता येत नाही. परंतू सोन्याने माणसाला बांधून ठेवले आहे. ज्यांच्या आहे, आणि ज्यांच्याकडे नाही, त्यांचाही झोप उडाली आहे.त्यालाच तर सोना म्हणतात. पाप- पुण्य हेच नाही तर काय, , असा हितोपदेश वाणीचे जादुगार श्रमण प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा. यांनी येथे बोलतांना दिला. ते गुरु गणेश सभा मंडपात चार्तुमासानिमित्त आयोजित प्रवचनात श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा.बोलत होते. यावेळी विचार पिठावर अन्य साध्वींची उपस्थिती होती. पुढे बोलतांना श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार, प.पू.रमणीकमुनीजी म. सा. म्हणाले की, पाण्याचा स्वभाव हा खाली जाने तर अग्नीचा स्वभाव हा वर जाण्याचा आहे. परंतू भगवानने म्हटले आहे की, पाणी हे मनासारखे आहे. जसे मन तसे पाणी! स्वार्थी व्यक्तीची प्रसन्नता आणि निस्वार्थ व्यक्तीची प्रसन्नता यात जसा जमिन आसमानचा फरक...

कर्मबन्ध का मूल कारण भाव: साध्वी सम्बोधि

आत्मा के भाव को परिणाम या अध्यवसाय कहा जाता है। राग-द्वेष रूप भाव-धारा के मिलने से भाव अशुभ हो जाते हैं जो कर्मबन्ध का कारण बनते हैं। यदि भाव शुभ या प्रशस्त हो तो कर्मबन्ध को रोकने का कारण बनते हैं। इन्हीं शुभाशुभअध्यवसायों पर कर्मबन्ध निर्भर हैं। जीवन निर्माण में अध्यवसाय का स्थान अत्यन्त महत्वपूर्ण है। आत्मा के भाव सदा एक जैसे नहीं रहते, वे हर क्षण बदलते रहते हैं। इसी कारण आत्मा कभी शुभ में तो कभी अशुभ प्रवाह में रहती है। शुभ से अशुभ में और अशुभसे शुभ में आने के लिए प्रायः कोई न कोई व्यक्ति, वस्तु या भावात्मक स्थिति निमित्त बनती है। यदि कोई धर्मस्थान में बैठा हो तो प्रायः उस समय छल-कपट व क्रोध-लोभ का प्रसंग न होने से उसकी भावधारा शुभ होती है किन्तु धर्मस्थान से बाहर आने के बाद थोड़ा-सा अनिष्ट संयोग या प्रतिकूल निमित्त मिलते ही भावधारा अशुभ हो जाती है। सद्‌गुरू समागम, धर्म श्रवण और स्वाध्...

संयमाचा दीपस्तंभ – पूज्य रुपमुनिजी म.सा. यांचा जीवनप्रवास

प्रवचन – 1.08.2025 – प पू श्री मुकेश मुनीजी म सा – (बिबवेवाडी जैन स्थानक) आपल्या जैन धर्मसंस्कृतीमध्ये अनेक तपस्वी मुनिराजांनी आपल्या संयमी जीवनातून जगाला दिशा दिली आहे. त्यापैकीच एक तेजस्वी, तपस्वी, आणि आत्मसाधनात्मक व्यक्तिमत्त्व म्हणजे पूज्य रुपमुनिजी म.सा. रुपमुनिजी म.सा. यांचा जीवनप्रवास हा एक प्रेरणादायी अध्याय आहे. बालपणापासूनच त्यांच्यामध्ये वैराग्याची चुणूक दिसून आली होती. खऱ्या अर्थाने त्यांनी जीवनात काही मिळवण्याऐवजी स्वतःला गमावण्याचे ध्येय ठेवले – कारण तेच आत्मकल्याणाचे मूळ आहे. संसाराच्या मोहजाळातून स्वतःला अलग ठेवून त्यांनी संयमाचा मार्ग स्वीकारला. त्यांचा जीवनातला प्रत्येक क्षण हा धर्म आराधनेने परिपूर्ण होता. त्याग, तप, शील आणि ध्यान हे त्यांचे जीवनस्तंभ होते. त्याग म्हणजे केवळ वस्तूंचा नाही, तर आसक्तींचा त्याग – आणि तो त्यांनी अंतःकरणाने केला. परिग्रहविरती हे त...

ज्ञान से होता है आत्म कल्याण: डॉ श्री वरुण मुनि जी

श्री गुजराती जैन संघ गांधीनगर में चातुर्मास विराजित दक्षिण सूर्य ओजस्वी प्रवचनकार डॉ श्री वरुण मुनि जी म.सा. ने जीवन में ज्ञान के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ज्ञान आत्मा का दर्पण है। बिना ज्ञान के जीवन पशु के समान है। पांच इन्द्रिय तथा मन से जो ज्ञान उत्पन्न होता है वह मतिज्ञान है तथा पढ़ने और सुनने से जो ज्ञान होता है वह श्रुत ज्ञान कहलाता है। लौकिक ज्ञान के साथ साधक को आध्यात्मिक ज्ञान भी प्राप्त करना चाहिए। आत्म ज्ञान ही ईश्वर ज्ञान है। मुनि आत्म शोधक होता है। वह वीतराग धर्म का पथिक है। व्यक्ति को अपने जीवन में आध्यात्मिक शांति और जीवन निर्माण के साथ सच्चे सुख का रहस्य जानने के लिए आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करना परम आवश्यक है। आत्म विकास और आत्महित की साधना के लिए गुरु का अवलंबन ,शरण ग्रहण करना चाहिए। बिना गुरु शरण स्वीकार किए सच्चे आत्म बोध की शिक्षा नहीं प्राप्त हो सकती है। उन्हों...

जैन धर्म हा क्रियाशिल नव्हे तर भावनाप्रधान -प.पू.रमणीकमुनीजी म.सा

जालना : क्रियाशिल आणि भावनाप्रधान यामध्ये खूप मोठे अंतर आहे. क्रियाशिल म्हणजे काय तर… परंतू भावनाप्रधान म्हणजे काय? जैन धर्म हा भावनाप्रधान आहे. म्हणूनच अनेकजण या धर्माकडे वळले आहेत, असा हितोपदेश वाणीचे जादुगार श्रमण प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा. यांनी येथे बोलतांना दिला. ते गुरु गणेश सभा मंडपात चार्तुमासानिमित्त आयोजित प्रवचनात श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा.बोलत होते. यावेळी विचार पिठावर अन्य साध्वींची उपस्थिती होती. पुढे बोलतांना श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार, प.पू.रमणीकमुनीजी म. सा. म्हणाले की, बर्‍याचदा आपण बाह्य स्वरुपाला पाहून निर्णय देतो, परंतू असा निर्णय देणे योग्य आहे काय? नाही ना! तरीही आम्ही भाह्य स्वरुपाला पाहून निर्णय देतो. असा निर्णय देणे म्हणजे स्वत:च्या पायावर धोंडा पाडून घेण्यासारखे आहे. पुण्य आणि पाप याच्यात जसे अंतर आहे, तसेच अंतर क्रिया ...

ज्ञानाचा प्रकाश आणि मोक्षाचा मार्ग

प्रवचन – 31.07.2025 – प पू श्री मुकेश मुनीजी म सा – (बिबवेवाडी जैन स्थानक) आत्मा अनंत काळापासून संसाराच्या चक्रामध्ये भटकत आहे. कधी मानवगती, कधी देवगती, कधी तिर्यंचगती, तर कधी नरकगती — या चार गतिंमधून जन्म घेत जन्मो जन्मी पुनःपुन्हा कर्म भोगतो आहे आणि नव्या कर्मांची गुंफण करत आहे. अज्ञानामुळे आत्म्याचा खरा उद्देश विसरला गेला आहे. म्हणूनच तो जन्म आणि मृत्यू यांच्या चक्रामध्ये अडकून राहिला आहे. पण जेव्हा नम्रतेपूर्वक शरणागती पत्करून सद्गुरूंच्या मार्गदर्शनाखाली ज्ञान प्राप्त केलं जातं, तेव्हा मुक्तीच्या दिशेचा निर्धार आणि दिशा दोन्ही स्पष्ट होतात. उदाहरणार्थ, जर पुण्याहून मुंबईला जायचं असेल, पण रस्त्याचं ज्ञान नसेल, तर वाट चुकण्याची शक्यता अधिक असते. त्याचप्रमाणे मोक्ष गतीकडे जाण्यासाठी योग्य मार्गदर्शन, म्हणजेच आत्मज्ञान, अत्यंत आवश्यक आहे. आणि हे ज्ञान फक्त सद्गुरूंनी सांगितलेल...

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