आत्मा के भाव को परिणाम या अध्यवसाय कहा जाता है। राग-द्वेष रूप भाव-धारा के मिलने से भाव अशुभ हो जाते हैं जो कर्मबन्ध का कारण बनते हैं। यदि भाव शुभ या प्रशस्त हो तो कर्मबन्ध को रोकने का कारण बनते हैं। इन्हीं शुभाशुभअध्यवसायों पर कर्मबन्ध निर्भर हैं।
जीवन निर्माण में अध्यवसाय का स्थान अत्यन्त महत्वपूर्ण है। आत्मा के भाव सदा एक जैसे नहीं रहते, वे हर क्षण बदलते रहते हैं। इसी कारण आत्मा कभी शुभ में तो कभी अशुभ प्रवाह में रहती है। शुभ से अशुभ में और अशुभसे शुभ में आने के लिए प्रायः कोई न कोई व्यक्ति, वस्तु या भावात्मक स्थिति निमित्त बनती है।
यदि कोई धर्मस्थान में बैठा हो तो प्रायः उस समय छल-कपट व क्रोध-लोभ का प्रसंग न होने से उसकी भावधारा शुभ होती है किन्तु धर्मस्थान से बाहर आने के बाद थोड़ा-सा अनिष्ट संयोग या प्रतिकूल निमित्त मिलते ही भावधारा अशुभ हो जाती है। सद्गुरू समागम, धर्म श्रवण और
स्वाध्यायादि भाव-धारा को शुभ बनाने में प्रबल निमित्त है। जब शुभ निमित्त निर्बल होते हैं तब अशुभ भाव मनुष्य पर शीघ्र हावी हो जाते हैं और जीवन को पतन की ओर ले जाते हैं।
कभी-कभी निमित्त के बिना भी अशुभ स्थान में शुभभाव और शुभ स्थान में अशुभ भाव उत्पन्न हो जाता है। इसी बात को समझाते हुए भगवान महावीर ने कहा है, ‘जो कर्मबन्ध के स्थान हैं वे अध्यवसाय-विशेष से कर्ममुक्ति के स्थान बन जाते हैं और जो कर्ममुक्ति के स्थान हैं वे अध्यवसाय-विशेष से कर्मबन्ध के स्थान बन जाते हैं। इसी कारण स्थान-विशेष का इतना महत्व नहीं जितना शुभ-अशुभ भावों का महत्व है।’ यदि व्यक्ति अपने भावों पर निगरानी रखें तो अशुभ भावों से बच सकता है और शुभ अध्यवसाय में अपने को स्थिर रख सकता है।
प्रत्येक व्यक्ति अपने लिए सुख के साधन जुटाता है किन्तु जिन साधनों के माध्यम से वह सुख ढूँढ़ता है वही साधन उसके लिए दुःखदायी बन जाते हैं। जो सुख इन्द्रियों के साधन से प्राप्त होता है वह पराश्रित, बाधायुक्त और विषम होने से सुख नहीं दुःख ही है। इसलिए सांसारिक सुख को दुःख रूप और आत्मिक सुख को सच्चा सुख बताया है।
यही कारण है संसार का प्रत्येक प्राणी किसी न किसी कारण से दुःखी है। नरक में रहने वाले नारकी तो अत्यधिक दुःखी हैं ही स्वर्ग में स्थित देवता भी सुखी नहीं है। तिर्यंच जाति के पशु-पक्षी, पेड़-पौधों में पराधीनता के कारण नाना प्रकार के दुःख हैं। मनुष्य में यद्यपि सर्व दुःखों से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्ति की योग्यता है तथापि ईर्ष्या द्वेष और वैर-वैमनस्य की न्यूनाधिकता के कारण मनुष्य आत्म-सुख से बहुत दूर है।
प्राणियों के दुःख का कारण न ईश्वर है, न देवी-देव है और न मनुष्य है। ज्ञानियों ने समस्त दुःखों का कारण कर्मबन्ध को बताया है। पूर्वकृत अशुभ कर्म ही दुख का
संसार में जितने भी दुःख हैं चाहे वे शारीरिक हो या मानसिक, बौद्धिक हो या राजनैतिक, प्राणीकृत हो या प्रकृतिकृत सभी दुःख पूर्वकृत कर्म का उदय हैं। कोई भी कार्य बिना कारण के नहीं होता। अतः निमित्त कुछ भी हो सकता है परन्तु मूल कारण पूर्वकृत शुभाशुभ कर्मबन्ध को ही मानना होगा।