वृक्ष की विशालता का मुख्य श्रेय बीज को जाता है इसलिए वृक्ष को जानने हेतु बीज को जानना जरूरी है। ज्ञानियों ने कर्म महावृक्ष के दो बीज बताये हैं,
राग और द्वेष। किसी भी प्रवृत्ति की पृष्ठभूमि में जब तक राग या द्वेष नहीं होगा तब तक कर्मबन्ध भी नहीं होगा।
राग-द्वेष बिजली की भाँति है, बिजली दो प्रकार की होती है। एक बिजली अपनी ओर खींचती है तो दूसरी झटका देकर दूर फेंक देती है। दोनों प्रकार की बिजलियाँ मारक होती हैं। दोनों का दुष्परिणाम मनुष्य को भोगना पड़ता है। राग प्राणियों को अपनी ओर खींचने का काम करता है तो द्वेष झटका देकर दूर फेंकने वाली विद्युत की भाँति है।
राग भाव चाहे किसी व्यक्ति के प्रति हो या वस्तु के प्रति हो किसी उपलब्धि के प्रति हो या अनुकूल परिस्थिति के प्रति हो, रागाविष्ट व्यक्ति उसकी ओर खींचता चला जाता है। राग भाव से मनपसंद का आकर्षण और द्वेष भाव से नापसंद म विनर्गग्ण ज्ञापन्न होता है जो कर्मबन्ध का कारण हैं।
संसार में क्या प्रिय है और क्या अप्रिय है यह व्यक्ति की दृष्टि पर निर्भर करता है। यह राग और द्वेष का ही करिश्मा हैं कि मनुष्य कभी राग वश अप्रिय वस्तु को भी प्रिय मान लेता है और कभी द्वेष वश उसी प्रिय वस्तु को अप्रिय मान लेता है। प्रियत्व-अप्रियत्व ग्राहक की नजर पर निर्भर है। एक व्यक्ति एक पल में जिस वस्तु से द्वेष करता है दूसरे पल में उसी वस्तु में लवलीन हो जाता है। इसलिए इष्ट और अनिष्ट की व्याख्या करना कठिन है। जिस दिन प्रिय-अप्रिय, इष्ट-अनिष्ट, मनोज्ञ-अमनोज्ञ की सच्चाई समझ में आ जायेगी उस दिन संसार का सत्य भी समझ में आ जायेगा।
प्रत्येक मनुष्य को अपने दैनिक जीवन में प्रिय-अप्रिय वस्तुओं के साथ एवं अनुकूल-प्रतिकूल व्यक्तियों के साथ सम्बन्ध रखना पड़ता है। उन सम्बन्धों के प्रति मनुष्य कहीं घनिष्ठता जोड़ लेता है तो कहीं उपेक्षा की दृष्टि बना लेता है।
जिस पर वह अपनेपन की छाप लगा देता है उसके प्रति राग का सम्बन्ध जोड़ लेता है और अपने से विरोधी विचार वालों को पराया मानकर उनसे द्वेषभाव का सम्बन्ध बना लेता है जबकि राग-द्वेष किसी वस्तु पर नहीं किन्तु स्वयं व्यक्ति पर निर्भर हैं।
राग-द्वेष का प्रभाव सर्वत्र देखा जाता है। अपना पुत्र कुरूप और उद्दण्ड हो तो भी राग भाव के कारण प्रिय लगता है और अन्य किसी का सुन्दर व विनीत बच्चा भी प्रिय नहीं लगता। जो व्यक्ति आज तक प्रिय और हितैषी था वही व्यक्ति यदि संक्रामक या दुःसाध्य रोग से पीड़ित हो जाए तो घृणास्पद एवं अरुचिकर लगता है। यद्यपि व्यक्ति वही है, उसके गुण-दोष ज्यों के त्यों है परन्तु जब तक वह अपना
था तब तक प्रिय था। जब उसके प्रति अपनापन हट गया तो उपेक्षणीय समझा जाने लगा।
इसलिए ज्ञानियों ने कहा है, मोह से जिसे इष्ट समझ लिया जाता है वही कालान्तर में अनिष्ट हो जाता है और जिसे अनिष्ट समझ लिया जाता है वही इष्ट हो जाता है क्योंकि संसार में कोई भी पदार्थ न इष्ट है और न अनिष्ट है। वस्तुतः व्यक्ति की दृष्टि बदलती है, इसलिए वह प्रियता-अप्रियता या इष्ट-अनिष्ट के दायरे में चक्कर लगाता है।
फलतः अनुकूल-प्रतिकूल स्थिति में व्यक्ति की हृदयभूमि पर राग-द्वेष का बीजारोपण होता है। अतः ये दोनों ही स्थितियाँ अन्ततः हानिकारक, तीव्र कर्मबन्धक और वैर परम्परा की वृद्धि करने वाली सिद्ध होती है।