आकुर्डी निगडी प्राधिकरण जैन श्रावक संघ के प्रांगण में महाराष्ट्र सौरभ पु. चंद्रकलाश्री जी आदि ठाणा 3 का चातुर्मास अग्रेसर है! जिनवाणीका रसपान धर्म अनुरागी कर रहे हैं! अपने मधुर वाणी द्वारा शासन सुर्या पु. स्नेहाश्रीजी ने बताया, अनुमोदना का भाव का अर्थ है किसी और के अच्छे कार्यों या तपस्या की प्रशंसा करना और उसमें खुशी महसूस करना। इसे अनुमोदन, समर्थन या सहमति के रूप में भी समझा जा सकता है। अनुमोदन का अर्थ: अनुमोदना का शाब्दिक अर्थ है “अनुमोदन करना” या “सहमति देना”। यह किसी और के अच्छे कार्य, तपस्या, या धार्मिक क्रियाकलापों को देखकर प्रसन्न होना और उसमें शामिल होने की इच्छा रखना है। यह एक सकारात्मक भावना है जो दूसरों के धार्मिक या नैतिक कार्यों के प्रति सम्मान और प्रशंसा व्यक्त करती है। अनुमोदन का महत्व: अनुमोदना दूसरों को प्रेरित करती है और उन्हें अपने धार्मिक या नैत...
जालना : मोहनिय कर्मातून बाहेर कसे पडावे. आपलं भाग्य आहे की, आपल्याला या दरबारात प्रभू महावीरांची गाथा आपल्याला श्रवण करण्याची संधी प्राप्त झाली आहे. या संधीचं आपण सोनं केलं पाहिजे, असा हितोपदेश वाणीचे जादुगार श्रमण प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा. यांनी येथे बोलतांना दिला. ते गुरु गणेश सभा मंडपात चार्तुमासानिमित्त आयोजित विशेष प्रवचनात श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा.बोलत होते. यावेळी विचार पिठावर अन्य साध्वींची उपस्थिती होती. पुढे बोलतांना श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार, प.पू.रमणीकमुनीजी म. सा. म्हणाले की, आपण या गुरुंच्या दरबारात आहोत, अंगणात आहोत. या अंगणाची शोभा कधी वाढेल? आपण जेव्हा प्रभूंचे नाम घ्याल, त्यांचे गुणगाण गाल तेव्हाच तेही आपल्या पावन होतील, तेही आपल्या इच्छा, मनोकामना पूर्ण करतील. आपल्याला ही संधी मिळाली आहे, असे समजा आणि या संधींचे सोनं करा, असे सांगू...
जालना : योगी बनू शकत नाही पण सहयोगी तर बना. असा हितोपदेश देतांनाच ते म्हणाले की, आपलं घर आहे ना, ते सुमेधापरवत असलं तरी प्रभू महावीरांना कधीच विसरु नका, असे वाणीचे जादुगार श्रमण प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा. यांनी येथे बोलतांना सांगितले. ते गुरु गणेश सभा मंडपात चार्तुमासानिमित्त आयोजित विशेष प्रवचनात श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा.बोलत होते. यावेळी विचार पिठावर अन्य साध्वींची उपस्थिती होती. पुढे बोलतांना श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार, प.पू.रमणीकमुनीजी म. सा. म्हणाले की, प्रभू महावीरांप्रमाणे आनंद दायी जीवन जगायला शिका. भगवान मेरे है, असं प्रत्येकाला वाटायला हवे. आयना तो साफ किया तो मै नजर आया, जब मैने खुद्द को साफ किया तो तू नजर आयां! सांगायचं तात्पर्य हे जोपर्यंत मै हा जाणार नाही. तोपर्यंत आपण तरी कसे सुधरु, तुही मेरा सबकुछ है । योगी (अरिहंत), उपयोगी और सहयोगी! य...
श्री गुजराती जैन संघ गांधीनगर में चातुर्मास विराजित दक्षिण सूर्य ओजस्वी प्रवचनकार डॉ श्री वरुण मुनि जी ने बुधवार को धर्म सभा में उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि प्रभु की भक्ति निष्काम भाव से करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जो मनुष्य शरीर प्राप्त करके भी प्रभु की भक्ति धर्म की आराधना नहीं करते हैं। वे मनुष्य होकर भी पशु समान है। जिसके द्वारा भजन किया जाए और अपने मन को प्रभु मय बना लिया जाए उसे भक्ति कहते है। भक्ता के हृदय में ईश्वर का वास ऐसे ही समझो जैसे की फूल में सुगंध। मुनिश्री ने भक्तामर स्तोत्र के माध्यम से विवेचना करते हुए कहा कि प्रभु की भक्ति ऐसे लगन, समर्पण भावों के साथ अत्यंत श्रद्धा भावों के साथ होनी चाहिए जैसे मानतुंग आचार्य जी ने प्रथम तीर्थंकर परमात्मा भगवान श्री ऋषभदेव की स्तुति की थी। जो उन्हें भक्त अमर बना दिया। भक्ति के मार्ग में सर्वप्रथम बालक के समान सरल हृदय...
प्रवचन – 13.08.2025 – प पू श्री मुकेश मुनीजी म सा – (बिबवेवाडी जैन स्थानक) भगवंत महावीर स्वामींनी सांगितलेल्या 12 भावनांपैकी पहिली भावना म्हणजे अनित्य भावना. ‘अनित्य’ म्हणजे न टिकणारे, क्षणभंगुर. या जगात काहीही कायमचे नाही – शरीर, संपत्ती, मान, पद, नाती, सुख-दुःख… हे सारे बदलणारे आहे. या भावनेचे चिंतन केल्याने आपण बाह्य वस्तूंवर अनावश्यक मोह ठेवत नाही आणि जीवनाचा खरा उद्देश ओळखतो. धन ही जीवनाची आवश्यकता आहे, पण त्याची प्राप्ती सत्मार्गाने झाली पाहिजे. • सत्मार्गाने मिळालेल्या धनाचे परिणाम: मनात समाधान, शांतता, सत्प्रवृत्तीला चालना, समाजाचा विश्वास. • दुर्मार्गाने मिळालेल्या धनाचे परिणाम: भीती, असुरक्षितता, अपराधीपणा, सतत गुप्ततेची गरज, समाजात अविश्वास. उदाहरण : एक व्यापारी प्रामाणिकपणे व्यापार करून धन मिळवतो. थोडे उशिरा का होईना, पण त्याला समाजात सन्मान मिळतो, मनाला शांती मिळते...
आचार्य महाश्रमण के प्रबुद्ध सुशिष्य मुनि डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार जी, मुनि रमेश कुमार जी , मुनि पद्म कुमार एवं मुनि रत्न कुमार के पावन सान्निध्य में तेरापंथ धर्मस्थल में आयोजित आगम आधारित प्रवचनमाला में बुधवार को मुनि डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार ने कहा कि जैन धर्म में प्रतिक्रमण एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक प्रक्रिया है, जिसका अर्थ है अपनी गलतियों को स्वीकार करना, पश्चाताप करना और भविष्य में उन गलतियों को न दोहराने का संकल्प लेना। यह आत्मा को कर्मों के बंधन से मुक्त करने और आध्यात्मिक शुद्धि प्राप्त करने का एक तरीका है। इसलिए भावपूर्वक प्रतिक्रमण करके अपनी आत्मा को विशुद्ध बनाएं। मुनिश्री ने श्रावक-श्राविकाओं को भादवा महीने एवं पर्युषण महापर्व के दौरान अधिकाधिक तपस्या करने की भी प्रेरणा दी। मुनि रमेश कुमार ने उपस्थित जनमेदिनी को फरमाया – नमि राजर्षि एक ऐसे संत थे, जो अध्यात्म के उच्च शिखर पर आरोहण ...
आयुष्य कर्म के अस्तित्व से प्राणी जीवित रहता है और इसका क्षय होने पर मृत्यु को प्राप्त करता है। इस कर्म का स्वभाव कारागृह के समान बताया है। यह कर्म आत्मा के अविनाशी गुण को रोकता है। जैसे पैर में बेड़ी पड़ जाने पर मनुष्य एक ही स्थान से बन्ध जाता है वैसे ही आयुष्य कर्म आत्मा को अमुक जन्म में निर्धारित अवधि तक रोके रखता है। जब आयुष्य कर्म समाप्ति की ओर होता है तब दुनिया की कोई भी शक्ति उसे रोक नहीं सकती। जन्म, बाल्यत्व, युवकत्व, वृद्धत्व और मृत्यु आदि अवस्थाएं आयुष्य कर्म का ही प्रभाव है। देव, मनुष्य, तिर्यंच और नरक इन चार गतियों में से किस आत्मा को कितने काल तक अपना जीवन वहाँ बिताना है, इसका निर्णय आयु कर्म करता है। जहाँ जीव भयंकर वेदना भुगतता है उसे नरकायु कहते हैं। तीव्र क्रूर भावों के साथ सदैव हिंसा में आसक्त रहने से, अत्यधिक संचय वृत्ति से, पंचेन्द्रिय प्राणियों का वध करने से तथा मांसाहा...
जन्मदेनेवाले माता पिता , शिक्षा देनेवाले गुरुजन, धर्मआराधना सिखानेवाले धर्मगुरु, अन्नदाता, समाज, परिवार, एवं अपने हर कार्य मे सहाय्यभुत होने वाली व्यक्ति के प्रति हमे धन्यवाद अदा करने चाहिये! परिवार को एक सुत्र में बॉंध रखनेकी ज़िम्मेवारी हर नारी पर है ! नारी घर परिवार की शान है, सन्मान है ! आज के धर्मसभा में विस्तार से थॅंक्स गिव्हींग का महत्व विशद साध्वी स्नेहाश्रीजी ने किया!
जन्मदेनेवाले माता पिता , शिक्षा देनेवाले गुरुजन, धर्मआराधना सिखानेवाले धर्मगुरु, अन्नदाता, समाज, परिवार, एवं अपने हर कार्य मे सहाय्यभुत होने वाली व्यक्ति के प्रति हमे धन्यवाद अदा करने चाहिये! परिवार को एक सुत्र में बॉंध रखनेकी ज़िम्मेवारी हर नारी पर है ! नारी घर परिवार की शान है, सन्मान है ! आज के धर्मसभा में विस्तार से थॅंक्स गिव्हींग का महत्व विशद साध्वी स्नेहाश्रीजी ने किया!
तपस्वी गौरव कुंडलिया का तपोभिनंदन आचार्य महाश्रमण के प्रबुद्ध सुशिष्य मुनि डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार जी , मुनि रमेश कुमार जी , मुनि पद्म कुमार जी एवं मुनि रत्न कुमार जी के पावन सान्निध्य में मंगलवार को स्थानीय तेरापंथ धर्मस्थल में गौरव कुंडलिया (सुपुत्र : धनपत कुंडलिया, सरदारशहर) के नौ (9) की तपस्या के उपलक्ष्य में तपोभिनंदन समारोह का आयोजन किया गया। मुनि डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार जी ने उपस्थित जनमेदिनी को फरमाया – जैन धर्म में निक्षेप के आधार पर प्रतिक्रमण 6 प्रकार के होते हैं- नाम, स्थापना, द्रव्य, क्षेत्र, काल एवं भाव। प्रतिक्रमण से आत्मा विशुद्ध होती है। मुनिश्रीजी ने तपस्वी गौरव कुंडलिया की तपस्या की अनुमोदना करते हुए कहा कि तपस्या प्रदर्शन के लिए नहीं, निदर्शन के लिए करनी चाहिए। तपस्या आडम्बर रहित करनी चाहिए। मुनि रमेश कुमार ने कहा कि आत्मा और पुद्गल दोनों के मिलने पर जन्म, मरण, भय, शो...
श्री गुजराती जैन संघ गांधीनगर में चातुर्मास विराजित दक्षिण सूर्य ओजस्वी प्रवचनकार डॉ श्री वरुण मुनि जी म.सा. ने कहा कि प्रभु की भक्ति श्रद्धा भक्ति भाव से करें। क्योंकि भक्ति की शक्ति अपार है। वीतराग प्रभु के प्रति असीम श्रद्धा भक्ति रखते हुए भक्त जो भी पूजा भक्ति,गुण कीर्तन, नाम स्मरण पाठ करता है,वह मनुष्य जन्म का पहला फल है। हमें भी परमात्मा को प्राप्त करने की प्यास जगनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जिस दिन आपमें परमात्मा को प्राप्त करने की वास्तविक प्यास जग जायेगी तो समझ लेना अब प्रभू आपसे दूर नहीं है। तब साधक आत्मा अपना सब कुछ देकर भी उस अमृत तुल्य परमात्मा को प्राप्त करने में तन मन से लग जायेगा। जरुरत है बस प्रभू को सच्चे अर्थों में प्राप्त करने की चाह और प्यास लगनी चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि भक्ति भारतीय संस्कृति की एक आदर्श विशेषता है। परमात्मा की भक्ति करने से हमारा मन प्रसन्न हो जाता है...
जालना: प्रभू भगवान महावीरांच्या अंतर जगतामध्ये फुलांचा सुंगध आणि फळाचा रस आपल्याला चाखायला मिळतो. त्यांचे गुणवर्णन किती म्हणून करावे तेवढे ते थोडेच आहेत. म्हणूनच म्हटले आहे की, अर्जुन, राजा जनक आणि जम्बूस्वामींप्रमाणे जिज्ञासा पाहिजे, तुमची, आमची जिज्ञासा कशी आहे? याचा कधी तरी विचार केला का, असा हितोपदेश वाणीचे जादुगार श्रमण प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा. यांनी येथे बोलतांना दिला. ते गुरु गणेश सभा मंडपात चार्तुमासानिमित्त आयोजित विशेष प्रवचनात श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा.बोलत होते. यावेळी विचार पिठावर अन्य साध्वींची उपस्थिती होती. पुढे बोलतांना श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार, प.पू.रमणीकमुनीजी म. सा. म्हणाले की, अर्जुनाने गिता सांगितली अन् राजा जनक आणि जम्बू स्वामींनी आपल्याला सांगितले आहे. जेव्हा शिष्यत्व जेंव्हा बरसते तेव्हा मात्र हा घडा आपल्या गिळकृत केला पाहिज...