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प्रभु की भक्ति श्रद्धा भक्ति से करें: डॉ श्री वरुण मुनि जी

प्रभु की भक्ति श्रद्धा भक्ति से करें: डॉ श्री वरुण मुनि जी

श्री गुजराती जैन संघ गांधीनगर में चातुर्मास विराजित दक्षिण सूर्य ओजस्वी प्रवचनकार डॉ श्री वरुण मुनि जी म.सा. ने कहा कि प्रभु की भक्ति श्रद्धा भक्ति भाव से करें। क्योंकि भक्ति की शक्ति अपार है। वीतराग प्रभु के प्रति असीम श्रद्धा भक्ति रखते हुए भक्त जो भी पूजा भक्ति,गुण कीर्तन, नाम स्मरण पाठ करता है,वह मनुष्य जन्म का पहला फल है।

हमें भी परमात्मा को प्राप्त करने की प्यास जगनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जिस दिन आपमें परमात्मा को प्राप्त करने की वास्तविक प्यास जग जायेगी तो समझ लेना अब प्रभू आपसे दूर नहीं है। तब साधक आत्मा अपना सब कुछ देकर भी उस अमृत तुल्य परमात्मा को प्राप्त करने में तन मन से लग जायेगा।

जरुरत है बस प्रभू को सच्चे अर्थों में प्राप्त करने की चाह और प्यास लगनी चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि भक्ति भारतीय संस्कृति की एक आदर्श विशेषता है। परमात्मा की भक्ति करने से हमारा मन प्रसन्न हो जाता है। भक्ति का मार्ग सभी धर्म दर्शनों में सर्व श्रेष्ठ बतलाया गया है।

निष्कपट भाव से प्रभु के प्रति समर्पित होगा ही अखण्ड पूजा भक्ति है। भगवान के नाम में भी बड़ी शक्ति है। दुनिया के नाम झूठे हो सकते हैं लेकिन प्रभु का नाम सच्चा है। उन्होंने कहा कि भगवान की भक्ति, उपासना, पूजा, अर्चना आदि करने से सुख शांति समृद्धि की प्राप्ति होती है।

इतिहास में मीरा, तुलसी, रैदास,  चंदन बाला, ,सेठ सुदर्शन, भक्त प्रह्लाद की भक्ति की महिमा आज भी जग में प्रसिद्ध और सब धर्मौ में आदर भाव से स्मरण याद की जाती है और सब जगह उन वीर प्रभु भक्तों का उदाहरण प्रमुखता से दिया जाता है।

उन्होंने आगे कहा कि हृदय की पवित्रता ही भगवान की अखण्ड पूजा है। प्रारंभ में युवा मनीषी मधुर वक्ता श्री रुपेश मुनि जी ने भजन प्रस्तुत किया। उप प्रवर्तक श्री पंकज मुनि जी महाराज ने सबको मंगल पाठ प्रदान किया। संचालन राजेश मेहता ने किया।

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