आकुर्डी निगडी प्राधिकरण जैन श्रावक संघ के प्रांगण में महाराष्ट्र सौरभ पु. चंद्रकलाश्री जी आदि ठाणा 3 का चातुर्मास अग्रेसर है! जिनवाणीका रसपान धर्म अनुरागी कर रहे हैं! अपने मधुर वाणी द्वारा शासन सुर्या पु. स्नेहाश्रीजी ने बताया, अनुमोदना का भाव का अर्थ है किसी और के अच्छे कार्यों या तपस्या की प्रशंसा करना और उसमें खुशी महसूस करना। इसे अनुमोदन, समर्थन या सहमति के रूप में भी समझा जा सकता है।
अनुमोदन का अर्थ:
अनुमोदना का शाब्दिक अर्थ है “अनुमोदन करना” या “सहमति देना”।
यह किसी और के अच्छे कार्य, तपस्या, या धार्मिक क्रियाकलापों को देखकर प्रसन्न होना और उसमें शामिल होने की इच्छा रखना है।
यह एक सकारात्मक भावना है जो दूसरों के धार्मिक या नैतिक कार्यों के प्रति सम्मान और प्रशंसा व्यक्त करती है।
अनुमोदन का महत्व:
अनुमोदना दूसरों को प्रेरित करती है और उन्हें अपने धार्मिक या नैतिक कार्यों को जारी रखने के लिए प्रोत्साहित करती है।
यह धार्मिक समुदायों में एकता और सद्भाव को बढ़ावा देती है।
यह एक व्यक्ति के आध्यात्मिक विकास में भी मदद करती है, क्योंकि यह दूसरों के अच्छे कार्यों को देखकर खुशी महसूस करने और उनसे सीखने की भावना को विकसित करती है।
यह सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ावा देती है और नकारात्मक भावनाओं को कम करती है। संघाध्यक्ष सुभाषजी ललवाणी ने उपस्थित महानुभाओंका स्वागत किया! और पर्युषण पर्व के आगमन की जानकारी देकर विविध कार्यक्रमोमे जुडनेका एहलान किया!


