श्री गुजराती जैन संघ गांधीनगर में चातुर्मास विराजित दक्षिण सूर्य ओजस्वी प्रवचनकार डॉ श्री वरुण मुनि जी ने बुधवार को धर्म सभा में उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि प्रभु की भक्ति निष्काम भाव से करनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि जो मनुष्य शरीर प्राप्त करके भी प्रभु की भक्ति धर्म की आराधना नहीं करते हैं। वे मनुष्य होकर भी पशु समान है। जिसके द्वारा भजन किया जाए और अपने मन को प्रभु मय बना लिया जाए उसे भक्ति कहते है। भक्ता के हृदय में ईश्वर का वास ऐसे ही समझो जैसे की फूल में सुगंध।
मुनिश्री ने भक्तामर स्तोत्र के माध्यम से विवेचना करते हुए कहा कि प्रभु की भक्ति ऐसे लगन, समर्पण भावों के साथ अत्यंत श्रद्धा भावों के साथ होनी चाहिए जैसे मानतुंग आचार्य जी ने प्रथम तीर्थंकर परमात्मा भगवान श्री ऋषभदेव की स्तुति की थी। जो उन्हें भक्त अमर बना दिया। भक्ति के मार्ग में सर्वप्रथम बालक के समान सरल हृदय और निष्कपटता होनी चाहिए। तभी भक्त का भगवान से सच्चा साक्षात्कार हो सकता है। भक्ति भक्त को साक्षात ईश्वर बना देती हैं।
भक्ति का मार्ग बड़ा विस्तृत मार्ग बतलाया गया है। भक्ति चारित्र का निर्माण करती है और भक्ति ही आत्म मैल को साफ कर आत्मा को निर्मल शुद्ध पवित्र बना देती है।
उन्होंने कहा कि भगवान के द्वारा बताए मार्ग का अनुसरण करना ही सच्ची भक्ति का रुप है। प्रारंभ में युवा मनीषी मधुर वक्ता श्री रुपेश मुनि जी ने भावपूर्ण रचना प्रस्तुत की। उप प्रवर्तक श्री पंकज मुनि जी महाराज ने सबको मंगल पाठ प्रदान किया।
कार्यक्रम संचालन राजेश मेहता ने किया। इस अवसर पर समाज के अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। विविध तप साधना का क्रम भी सानंद गतिमान है।