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सुंदेशा मुथा जैन भवन कोन्डितौप में जैनाचार्य श्रीमद् विजय रत्नसेन सुरीश्वरजी म.सा ने पर्यूषण प्रवचन माला के पांचवे दिन महामंगलकारी कल्पसूत्र ग्रंथ के आधार पर प्रवचन में भगवान महावीर के च्यवन कल्याणक से जन्म कल्याणक संबंधी विवेचन करते हुए कहा कि:- तीर्थंकर परमात्मा का जब मता के गर्भ मे आगमन होता है, तब परमात्मा की मता , बालक के तीर्थंकर नाम कर्म के उदय से 14 महास्वप्न देखती हैं ।
ये सारे स्वप्न महामंगलकारी एवं प्रशंसनीय होते हैं । महा अर्थ वाले इन चौदह स्वप्न में प्रथम स्वप्न चार दांतवाला हाथी, तीर्थंकर के दान , शील , तप, भाव, रुप चार धर्म के देशक का प्रतिक हैं । दूसरे स्वप्न में वृषभ का दर्शन , भगवान के भावी में भरत क्षेत्र की भुमि में बोधि बीज के वपन का प्रतिक है ।
तीसरे स्वप्न में केशरी सिंह, भगवान की शूरवीरता एवं आत्मा को नुकसान करने वाले काम, क्रोध आदि हाथियो से जगत के जीवों के रक्षक का प्रतिक हैं । चौथे स्वप्न में लक्ष्मी देवी , तीर्थंकर की लक्ष्मी के भोग का सूचक हैं । पांचवे स्वप्न में फुल की माला , तीर्थंकर के तीन लोक में पूज्यता का प्रतिक हैं ।
छठे स्वप्न में चंद्र , उनकी सौम्यता एवं जगत के जीवों को शीतलता एवं आनंददायी होने का प्रतिक हैं । सातवें स्वप्न में सुर्य तीर्थंकर के आभामंडल से विभूषित होने का प्रतिक है ।
आठवें स्वप्न में ध्वज उनके धर्म रुपी के शिखर पर स्थापना का प्रतिक हैं । नौवें स्वप्न में पुर्ण कलश , दसवें स्वप्न में पद्म सरोवर उनके सुवर्ण कमल पर विचरण का सूचक हैं ।
ग्यारहवें स्वप्न में समुद्र उनके केवलज्ञान रुप अपार ज्ञान का प्रतिक हैं । बारहवें स्वप्न में विमान उनके वैमानिक देवों से भी पूजित होने का प्रतिक हैं ।
तेरहवें स्वप्न में रत्न राशि उनके रत्न के सिंहासन पर धर्म देशना का प्रतिक है । चौदहवें स्वप्न में धर्म रहित अग्नि उनके कर्म रुपी मौत को नाश करने का प्रतिक हैं ।