जालना : काय योग्य, काय अयोग्य हे कळायला हवे. एखाद्याला पोहता चांगले येते. मात्र बुडणेच चांगले वाटत असेल तर… आज सहाव्या अध्यायावर त्यांनी विवेचन केले. ते म्हणाले की, काही मर्यादा पाळा आणि ही मलिनता दूर करा, असा हितोपदेश वाणीचे जादुगार श्रमण प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा. यांनी येथे बोलतांना दिला. ते गुरु गणेश सभा मंडपात चार्तुमासानिमित्त आयोजित प्रवचनात श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा.बोलत होते. यावेळी विचार पिठावर अन्य साध्वींची उपस्थिती होती. पुढे बोलतांना श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार, प.पू.रमणीकमुनीजी म. सा. म्हणाले की, मला सुधारवे असे वाटत असेल तर जीणवाणी आत्मसात केल्याशिवाय गंत्यंतर नाही. ऑपरेशन एक घंट्याचं, लागले आठ ते दहा घंटे! हिशोब तर आपण ठेवतांच ना! आपण ऐकायला आलात, हे खरे असले तरी भगवान महावीराचं जीवन जगा, आपण सगळे जण महावीरांची संतान आहोत. तो...
आचार्य श्री महाश्रमण जी के प्रबुद्ध सुशिष्य मुनिश्री ज्ञानेंद्र कुमार जी , मुनिश्री रमेश कुमार जी के पावन सान्निध्य में तेरापंथ युवक परिषद द्वारा 9 वर्ष के ज्ञानार्थियों को मंत्र दीक्षा प्रदान की गई। मंत्र दीक्षा का महत्व बताते हुए डाॅ मुनि ज्ञानेंद्र कुमार जी ने कहा- नमस्कार महामंत्र जीवन निर्माण और जीवन विकास का अनूठा उपक्रम है। मंत्र दीक्षा से दीक्षित बालक बालिकाओं की सुषुप्त शक्तियों को उजागर करना है। आपने नमस्कार महामंत्र की एक ऐतिहासिक कथा भी बच्चों को सुनाई । मुनि रमेश कुमार जी ने कहा- नमस्कार महामंत्र जैन संस्कृति का मुकुटमणि के समान है। जो साधक इसकी निष्काम भाव से साधना करता है उसके अज्ञान, मूर्च्छा और अंतराय आदि नष्ट होती है। अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जयेश जी महता ने कहा- बच्चों को संस्कारी बनाने के लिए महाराष्ट्र के कटाटूर बोराला गांव का उदाहरण देते ...
पल्लावरम में हुआ मासखमण प्रत्याख्यान समारोह निर्मलजी रांका ने किया 28 का मासखमण पल्लावरम : तमिलनाडु के पल्लावरम क्षेत्र स्थित तेरापंथ भवन में युग प्रधान आचार्य श्री महाश्रमणजी के सुशिष्य मुनिश्री दीपकुमारजी ठाणा-2 के सान्निध्य में श्रीमान निर्मलजी रांका सुपुत्र स्व. श्री राजमलजी रांका ने 28 दिन के मासखमण तप का प्रत्याख्यान समारोह रविवार को श्री जैन श्वेतांबर तेरापंथ सभा पल्लावरम द्वारा किया गया। मुनि श्री दीपकुमारजी ने कहा कि प्रबल मनोबली ही मासखमण जैसी तपस्या कर सकते हैं। निर्मलजी रांका ने मासखमण का तप कर मनोबल का परिचय दिया है। तप मंगल है क्योंकि तप शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा चारों को मंगलमय बनाता है। तप शरीर के रोग निकलता है। तप जैन शासन की प्रभावना का हेतु है। निर्मलजी ने मासखमण तप कर दृढ़ मनोबल का परिचय दिखाया है। आज के युग में इतनी बड़ी तपस्या चमत्कार से कम नहीं है, इस चातुर्मास में ...
श्री गुजराती जैन संघ गांधीनगर में चातुर्मास विराजित दक्षिण सूर्य ओजस्वी प्रवचनकार डॉ श्री वरुण मुनि जी म.सा.ने रविवार को युवा दिवस के रूप में मनाये गये विशेष कार्यक्रम के आयोजन पर युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि युवा समाज एवं राष्ट्र की रीढ़ है। उन्होंने सभी युवाओं को आव्हान करते हुए कहा कि उन्हें अपनी शक्ति ऊर्जा को समाज एवं राष्ट्र के हित में लगाना चाहिए। तभी समाज और देश सभी क्षेत्रों में और अधिक विकास एवं प्रगति कर सकता है। हमारे देश के लोकप्रिय प्रधान मंत्री जी मोदी जी ने भी सन् 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र की श्रेणी में लाने के लिए सभी देशवासियों और विशेष रूप से युवा शक्ति को इसके लिए आगे आने और अपनी श्रम शक्ति को इस और लगाने और विशेष पुरुषार्थ करने की बात कही है। मुनि श्री ने कहा कि अगर आपके पास शक्ति ऊर्जा, सामर्थ्य है तो उसे अपने समाज एवं राष्ट्र के विकास में योगदान देने में लग...
मनुष्य के स्वभाव के आधार पर जैसे उसके गुण और शक्तियों का आकलन किया जाता है वैसे ही कर्मों की प्रकृति (स्वभाव) के आधार पर उनका विभाजन किया जाता है। आत्मा और कर्म का बन्ध होने के साथ ही कर्म के स्वभाव का विश्लेषण स्वतः हो जाता है। प्रकृति बन्ध कर्म के स्वभाव का विभाजन करने की शक्ति रखता है। जैसे नीम की प्रकृति कड़वापन लिए हुए है तो गुड़ की प्रकृति में मीठापन है, इसी तरह ज्ञानावरणीय कर्म की प्रकृति ज्ञान को आवृत्त करने की है तो अन्तराय कर्म की प्रकृति आत्मा के अनन्त शक्ति को आच्छादित करने की है। कर्म विज्ञान ने प्रकृति (स्वभाव) के अनुसार कर्म समूह को आठ भागों में विभक्त किया है। उन आठ के नाम इस प्रकार हैं- ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, वेदनीय, मोहनीय, आयुष्य, नाम, गोत्र और अन्तराय। ये आठ कर्म प्रकृतियाँ आत्मा के अष्ट मूल गुणों की बाधक है। आत्मा के अनन्त ज्ञान गुण को आवृत्त करने वाला कर्म ज्ञानाव...
पुनाः आज आकुर्डी- निगडी- प्राधिकरण गुरु आनंद प्रार्थना मंडल का गुरु दर्शन यात्रा का प्रथम चरण उपाध्याय प्रवर पु. प्रविणऋषिजी म. सा. एवं मधुर गायक पु तिर्थेष ऋषिजी के दर्शन एवं मंगलमय आशिर्वाद से प्रारंभ हुई! दर्शन यात्रा मे 24 महानुभावोने सहभाग लेनेसे उपाध्याय श्री जी ने 24 तिर्थंकर कर उपमा दी! विविध धार्मिक आध्यात्मिक जप तप आराधना के माध्यमसे “परिवर्तन चातुर्मास 2025” स्वर्णिम बननेके लिए अग्रेसर है !आकुर्डी निगडी प्राधिकरण श्री संघके अध्यक्ष सुभाषजी ललवाणी अपने धर्मपत्नी कांता सह दर्शन यात्रा में सम्मिलित हुये! सजोड दर्शन यात्रा में सम्मिलित हुये श्री सुभाषजी राका, मोतीलालजी चोरडीया, विजयजी ओस्तवाल, प्रेमचंदजी जैन, प्रेमसुख कटारिया, सुभाष खाबिया,शांतीलालजी दुगड, श्रीकांतजी नहार, वैसेही नवनीतजी मुनोत, सुर्यकांतजी मुथीयान नेनसुंखजी मांडोत, सुभाषजी सुराणा, दलीतंदजी शिंगवी, रतिलालजी चोरडीया आ...
युवक परिषद् तमिलनाडु द्वारा प्रतिक्रमण सीखों अभियान के अंतर्गत चेन्नई में 3 अगस्त को चतुर्थ चरण की परीक्षा का आयोजन आचार्य भगवन्त पूज्यश्री हीराचन्द्रजी म.सा की प्रभावी प्रेरणा हैं कि जैनी परिवार के हर सदस्यों को प्रतिक्रमण के पाठ कंठस्थ हो | इसी लक्ष्य को लेकर अखिल भारतीय श्री जैन रत्न हितैषी श्रावक संघ,जोधपुर के अंतर्गत अखिल भारतीय स्तर पर प्रतिक्रमण की परीक्षाओं का आयोजन इस वर्ष गतिमान हैं | रविवार 3 अगस्त 2025 को चेन्नई में श्री जैन रत्न युवक परिषद् तमिलनाडु के कुशल संचालन में प्रतिक्रमण के चतुर्थ चरण की परीक्षा का आयोजन किया जाएगा | श्री जैन रत्न हितैषी श्रावक संघ तमिलनाडु के निवर्तमान कार्याध्यक्ष आर नरेन्द्रजी कांकरिया ने बताया कि रत्न स्वर्ण महोत्सव के अन्तर्गत प्रतिक्रमण के चतुर्थ चरण की परीक्षा चेन्नई के साहूकारपेट में बेसिन वाटर वर्क्स स्ट्रीट स्थित स्वाध्याय भवन सहित महानगर के...
जैसी मति, वैसी गति” का अर्थ है कि मनुष्य की मृत्यु के समय जैसी मानसिक स्थिति या विचार होते हैं, उसी के अनुसार उसे अगला जन्म मिलता है. इसका मतलब है कि हमारे कर्म और विचार हमारे भविष्य को आकार देते हैं, खासकर मृत्यु के समय. – साध्वी स्नेहाश्री जी म. सा. का उद बोधन। आकुर्डी निगडी प्राधिकरण श्री संघ के प्रांगण में आज साध्वी स्नेहाश्री जी म. सा. ने अपने प्रवचन में समयका महत्व समझाते हुये कहा कि जैसी मति वैसी गती! अंतिम समय का महत्व: यह सुभाषित इस बात पर जोर देता है कि मनुष्य के जीवन का अंतिम क्षण बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि उस समय के विचार और भावनाएं ही यह निर्धारित करती हैं कि उसे अगला जन्म कैसा मिलेगा. कर्मों का प्रभाव: हमारे कर्म और विचार हमारे मन को प्रभावित करते हैं, और मृत्यु के समय हमारा मन जैसा होता है, उसी के अनुसार हमें अगला जन्म मिलता है. आध्यात्मिक दृष्टिकोण: भारत...
श्री गुजराती जैन संघ गांधीनगर में चातुर्मास विराजित दक्षिण सूर्य ओजस्वी प्रवचनकार डॉ श्री वरुण मुनि जी महाराज ने शनिवार को धर्म सभा में उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि संत समागम हितकारी है। संत के दर्शन मात्र से हमारे पाप,ताप और संताप सभी दूर हो जाते है। गुरु हमारे जीवन निर्माता है। गुरु की शरण में जाएं तो अंहकार को छोड़कर निर्विकार भाव से जाना चाहिए। तभी आप गुरु कृपा आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं और गुरु भगवंत से अपने आत्म कल्याण का, आत्म ज्ञान का सही दिशा बोध, ज्ञान हासिल कर पाएंगे। उन्होंने आगे कहा कि सत्संग की महिमा बहुत बड़ी बतायी गई है। सत्संग से सुख मिलता है जीवन का कण कण खिल उठता है। सभी धर्म शास्त्रों, दर्शनो में सत्संग, सन्त समागम का विशिष्ट महत्व बतलाया गया है। जैसे माता अपने संतान को गर्भ संस्कार के साथ उसके जन्म लेने के बाद भी शिशु को प्रदान किए संस्कार संतान में...
तपस्वी भाई का तपोभिनंदन आचार्य महाश्रमण के प्रबुद्ध सुशिष्य मुनि डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार, मुनि रमेश कुमार, मुनि पद्म कुमार एवं मुनि रत्न कुमार के पावन सान्निध्य एवं तेरापंथी सभा के तत्वावधान में शनिवार को स्थानीय तेरापंथ धर्मस्थल में मास्टर मुदित कोठारी (सुपुत्र : दीपक-संजना कोठारी के अठाई (8) की तपस्या के उपलक्ष्य में तपोभिनंदन समारोह का आयोजन किया गया। इस अवसर पर तेरापंथी सभा, गुवाहाटी की ओर से साहित्य एवं प्रशस्ति-पत्र प्रदान कर तपस्वी भाई के तप की अनुमोदना की गई। इस अवसर पर मुनि डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार ने तपस्वी भाई की अनुमोदना करते हुए कहा कि कोई भी व्यक्ति तपस्या करने के लिए ठान ले तो वह अवश्य पूर्ण होता है। इसी का उदाहरण यह तपस्वी बालक है। तपस्या के द्वारा व्यक्ति अपने परिवार, समाज एवं संघ का गौरव बढ़ाता है। तपस्वी मुदित कोठारी इसी तरह तपस्या के क्षेत्र में आगे बढ़ते रहे, यही कामना है। ...
जालना : आसक्ती, बंधन, आणि बेडीया हे कुणी घातलं तर पापने! तुमच्या गळ्यातील हार, कानातील आणि नाकातील कुणामुळं मिळालं! आसक्ती, दिवाना पण, जीस बंधन मिलते वो तो मोहनीया करम है। परंतू आपल्या हे लक्षातच येत नाही, त्याला कोण काय करणार! असा हितोपदेश वाणीचे जादुगार श्रमण प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा. यांनी येथे बोलतांना दिला. ते गुरु गणेश सभा मंडपात चार्तुमासानिमित्त आयोजित प्रवचनात श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा.बोलत होते. यावेळी विचार पिठावर अन्य साध्वींची उपस्थिती होती. पुढे बोलतांना श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार, प.पू.रमणीकमुनीजी म. सा. म्हणाले की, आज- काल पुरुषही कानात घालू लागले आहेत. आणि हातातले ! कधी- कधी तर आमच्यासाठी खतरा बनून येतो. तरीही आम्ही घालायचे काही सोडत नाहीत. ये जो दिवाना पण है । पागल पण है… छोड दो इसे और आसक्तीमुक्त जीवन जगा, असेसांगून ते म्हणाले ...
वृक्ष की विशालता का मुख्य श्रेय बीज को जाता है इसलिए वृक्ष को जानने हेतु बीज को जानना जरूरी है। ज्ञानियों ने कर्म महावृक्ष के दो बीज बताये हैं, राग और द्वेष। किसी भी प्रवृत्ति की पृष्ठभूमि में जब तक राग या द्वेष नहीं होगा तब तक कर्मबन्ध भी नहीं होगा। राग-द्वेष बिजली की भाँति है, बिजली दो प्रकार की होती है। एक बिजली अपनी ओर खींचती है तो दूसरी झटका देकर दूर फेंक देती है। दोनों प्रकार की बिजलियाँ मारक होती हैं। दोनों का दुष्परिणाम मनुष्य को भोगना पड़ता है। राग प्राणियों को अपनी ओर खींचने का काम करता है तो द्वेष झटका देकर दूर फेंकने वाली विद्युत की भाँति है। राग भाव चाहे किसी व्यक्ति के प्रति हो या वस्तु के प्रति हो किसी उपलब्धि के प्रति हो या अनुकूल परिस्थिति के प्रति हो, रागाविष्ट व्यक्ति उसकी ओर खींचता चला जाता है। राग भाव से मनपसंद का आकर्षण और द्वेष भाव से नापसंद म विनर्गग्ण ज्ञापन्न होता...