मनुष्य के स्वभाव के आधार पर जैसे उसके गुण और शक्तियों का आकलन किया जाता है वैसे ही कर्मों की प्रकृति (स्वभाव) के आधार पर उनका विभाजन किया जाता है। आत्मा और कर्म का बन्ध होने के साथ ही कर्म के स्वभाव का विश्लेषण स्वतः हो जाता है। प्रकृति बन्ध कर्म के स्वभाव का विभाजन करने की शक्ति रखता है।
जैसे नीम की प्रकृति कड़वापन लिए हुए है तो गुड़ की प्रकृति में मीठापन है, इसी तरह ज्ञानावरणीय कर्म की प्रकृति ज्ञान को आवृत्त करने की है तो अन्तराय कर्म की प्रकृति आत्मा के अनन्त शक्ति को आच्छादित करने की है।
कर्म विज्ञान ने प्रकृति (स्वभाव) के अनुसार कर्म समूह को आठ भागों में विभक्त किया है।
उन आठ के नाम इस प्रकार हैं- ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, वेदनीय, मोहनीय, आयुष्य, नाम, गोत्र और अन्तराय। ये आठ कर्म प्रकृतियाँ आत्मा के अष्ट मूल गुणों की बाधक है।
आत्मा के अनन्त ज्ञान गुण को आवृत्त करने वाला कर्म ज्ञानावरणीय है तो आत्मा की अनन्त दर्शन की अभिव्यक्ति में बाधा डालने वाला दर्शनावरणीय कर्म है।
आत्मा को अनन्त सुख से वंचित कराने वाला वेदनीय कर्म है तो आत्मा को कषाय में व्यस्त रखने वाला एवं निज स्वभाव से हटाने वाला मोहनीय कर्म है।
आत्मा की अक्षय स्थिति में बाधक, अविनाशी गुण को आच्छादित करने वाला आयुष्य कर्म है। आत्मा के रूप, रस, गंध और स्पर्श न होने पर भी आत्मा को नानाविध विचित्र रूप धारण कराने वाला नाम कर्म है।
आत्मा न ऊँच है न नीच है फिर भी ऊँच और नीच कुल में जन्म लेती है, वह गोत्र कर्म के कारण है। वह आत्मा के अगुरुलघुत्व गुण को आवृत्त कर देता है।
आत्मा में अनन्त शक्ति होते हुए भी उसे अपनी शक्ति की अनन्तता का अनुभव अन्तराय कर्म नहीं होने देता। इस प्रकार आठों कर्म आत्मा के आठ मूल गुणों को क्रमशः दबाकर आत्मा को विकृत करने के स्वभाव वाले हैं।