श्री गुजराती जैन संघ गांधीनगर में चातुर्मास विराजित दक्षिण सूर्य ओजस्वी प्रवचनकार डॉ श्री वरुण मुनि जी म. सा. ने शुक्रवार को धर्म सभा में उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि एक वह चीज जिसके सुनने मात्र से मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है वो है आगम वाणी से श्रुत ज्ञान की प्राप्ति और ज्ञान से विज्ञान और क्रमशः आगे बढ़ते हुए संयम के साथ सिद्धि की प्राप्ति साधक को हो सकती है। श्रुत ज्ञान की महिमा भी अपरंपार है। तीर्थंकर भगवान की जिनवाणी साधक को संसार सागर से तिराने वाली है। आवश्यकता है बस यही कि व्यक्ति गुरु का सत्संग समागम प्राप्त कर गुरु वचनों को अपने अन्तर हृदय में धारण करें। ज्ञान का फल विरति है। विद्यावान गुणी व्यक्ति अपने जीवन में कोई उलझन, मुसीबत आए तो भी उन समस्याओं से विचलित नहीं होते हुए शान्त चित्त होकर चिन्तन करता है और उसमें से निकलने का रास्ता निकाल लेता है और समभाव से हर ...
जालना : आसक्तीचं मनुष्यालाच कोणत्या थराला नेऊन ठेवील हे सांगता येत नाही. परंतू सोन्याने माणसाला बांधून ठेवले आहे. ज्यांच्या आहे, आणि ज्यांच्याकडे नाही, त्यांचाही झोप उडाली आहे.त्यालाच तर सोना म्हणतात. पाप- पुण्य हेच नाही तर काय, , असा हितोपदेश वाणीचे जादुगार श्रमण प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा. यांनी येथे बोलतांना दिला. ते गुरु गणेश सभा मंडपात चार्तुमासानिमित्त आयोजित प्रवचनात श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा.बोलत होते. यावेळी विचार पिठावर अन्य साध्वींची उपस्थिती होती. पुढे बोलतांना श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार, प.पू.रमणीकमुनीजी म. सा. म्हणाले की, पाण्याचा स्वभाव हा खाली जाने तर अग्नीचा स्वभाव हा वर जाण्याचा आहे. परंतू भगवानने म्हटले आहे की, पाणी हे मनासारखे आहे. जसे मन तसे पाणी! स्वार्थी व्यक्तीची प्रसन्नता आणि निस्वार्थ व्यक्तीची प्रसन्नता यात जसा जमिन आसमानचा फरक...
आत्मा के भाव को परिणाम या अध्यवसाय कहा जाता है। राग-द्वेष रूप भाव-धारा के मिलने से भाव अशुभ हो जाते हैं जो कर्मबन्ध का कारण बनते हैं। यदि भाव शुभ या प्रशस्त हो तो कर्मबन्ध को रोकने का कारण बनते हैं। इन्हीं शुभाशुभअध्यवसायों पर कर्मबन्ध निर्भर हैं। जीवन निर्माण में अध्यवसाय का स्थान अत्यन्त महत्वपूर्ण है। आत्मा के भाव सदा एक जैसे नहीं रहते, वे हर क्षण बदलते रहते हैं। इसी कारण आत्मा कभी शुभ में तो कभी अशुभ प्रवाह में रहती है। शुभ से अशुभ में और अशुभसे शुभ में आने के लिए प्रायः कोई न कोई व्यक्ति, वस्तु या भावात्मक स्थिति निमित्त बनती है। यदि कोई धर्मस्थान में बैठा हो तो प्रायः उस समय छल-कपट व क्रोध-लोभ का प्रसंग न होने से उसकी भावधारा शुभ होती है किन्तु धर्मस्थान से बाहर आने के बाद थोड़ा-सा अनिष्ट संयोग या प्रतिकूल निमित्त मिलते ही भावधारा अशुभ हो जाती है। सद्गुरू समागम, धर्म श्रवण और स्वाध्...
प्रवचन – 1.08.2025 – प पू श्री मुकेश मुनीजी म सा – (बिबवेवाडी जैन स्थानक) आपल्या जैन धर्मसंस्कृतीमध्ये अनेक तपस्वी मुनिराजांनी आपल्या संयमी जीवनातून जगाला दिशा दिली आहे. त्यापैकीच एक तेजस्वी, तपस्वी, आणि आत्मसाधनात्मक व्यक्तिमत्त्व म्हणजे पूज्य रुपमुनिजी म.सा. रुपमुनिजी म.सा. यांचा जीवनप्रवास हा एक प्रेरणादायी अध्याय आहे. बालपणापासूनच त्यांच्यामध्ये वैराग्याची चुणूक दिसून आली होती. खऱ्या अर्थाने त्यांनी जीवनात काही मिळवण्याऐवजी स्वतःला गमावण्याचे ध्येय ठेवले – कारण तेच आत्मकल्याणाचे मूळ आहे. संसाराच्या मोहजाळातून स्वतःला अलग ठेवून त्यांनी संयमाचा मार्ग स्वीकारला. त्यांचा जीवनातला प्रत्येक क्षण हा धर्म आराधनेने परिपूर्ण होता. त्याग, तप, शील आणि ध्यान हे त्यांचे जीवनस्तंभ होते. त्याग म्हणजे केवळ वस्तूंचा नाही, तर आसक्तींचा त्याग – आणि तो त्यांनी अंतःकरणाने केला. परिग्रहविरती हे त...
श्री गुजराती जैन संघ गांधीनगर में चातुर्मास विराजित दक्षिण सूर्य ओजस्वी प्रवचनकार डॉ श्री वरुण मुनि जी म.सा. ने जीवन में ज्ञान के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ज्ञान आत्मा का दर्पण है। बिना ज्ञान के जीवन पशु के समान है। पांच इन्द्रिय तथा मन से जो ज्ञान उत्पन्न होता है वह मतिज्ञान है तथा पढ़ने और सुनने से जो ज्ञान होता है वह श्रुत ज्ञान कहलाता है। लौकिक ज्ञान के साथ साधक को आध्यात्मिक ज्ञान भी प्राप्त करना चाहिए। आत्म ज्ञान ही ईश्वर ज्ञान है। मुनि आत्म शोधक होता है। वह वीतराग धर्म का पथिक है। व्यक्ति को अपने जीवन में आध्यात्मिक शांति और जीवन निर्माण के साथ सच्चे सुख का रहस्य जानने के लिए आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करना परम आवश्यक है। आत्म विकास और आत्महित की साधना के लिए गुरु का अवलंबन ,शरण ग्रहण करना चाहिए। बिना गुरु शरण स्वीकार किए सच्चे आत्म बोध की शिक्षा नहीं प्राप्त हो सकती है। उन्हों...
जालना : क्रियाशिल आणि भावनाप्रधान यामध्ये खूप मोठे अंतर आहे. क्रियाशिल म्हणजे काय तर… परंतू भावनाप्रधान म्हणजे काय? जैन धर्म हा भावनाप्रधान आहे. म्हणूनच अनेकजण या धर्माकडे वळले आहेत, असा हितोपदेश वाणीचे जादुगार श्रमण प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा. यांनी येथे बोलतांना दिला. ते गुरु गणेश सभा मंडपात चार्तुमासानिमित्त आयोजित प्रवचनात श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा.बोलत होते. यावेळी विचार पिठावर अन्य साध्वींची उपस्थिती होती. पुढे बोलतांना श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार, प.पू.रमणीकमुनीजी म. सा. म्हणाले की, बर्याचदा आपण बाह्य स्वरुपाला पाहून निर्णय देतो, परंतू असा निर्णय देणे योग्य आहे काय? नाही ना! तरीही आम्ही भाह्य स्वरुपाला पाहून निर्णय देतो. असा निर्णय देणे म्हणजे स्वत:च्या पायावर धोंडा पाडून घेण्यासारखे आहे. पुण्य आणि पाप याच्यात जसे अंतर आहे, तसेच अंतर क्रिया ...
प्रवचन – 31.07.2025 – प पू श्री मुकेश मुनीजी म सा – (बिबवेवाडी जैन स्थानक) आत्मा अनंत काळापासून संसाराच्या चक्रामध्ये भटकत आहे. कधी मानवगती, कधी देवगती, कधी तिर्यंचगती, तर कधी नरकगती — या चार गतिंमधून जन्म घेत जन्मो जन्मी पुनःपुन्हा कर्म भोगतो आहे आणि नव्या कर्मांची गुंफण करत आहे. अज्ञानामुळे आत्म्याचा खरा उद्देश विसरला गेला आहे. म्हणूनच तो जन्म आणि मृत्यू यांच्या चक्रामध्ये अडकून राहिला आहे. पण जेव्हा नम्रतेपूर्वक शरणागती पत्करून सद्गुरूंच्या मार्गदर्शनाखाली ज्ञान प्राप्त केलं जातं, तेव्हा मुक्तीच्या दिशेचा निर्धार आणि दिशा दोन्ही स्पष्ट होतात. उदाहरणार्थ, जर पुण्याहून मुंबईला जायचं असेल, पण रस्त्याचं ज्ञान नसेल, तर वाट चुकण्याची शक्यता अधिक असते. त्याचप्रमाणे मोक्ष गतीकडे जाण्यासाठी योग्य मार्गदर्शन, म्हणजेच आत्मज्ञान, अत्यंत आवश्यक आहे. आणि हे ज्ञान फक्त सद्गुरूंनी सांगितलेल...
समझा-समझा एक है, अनसमझा सब एक । समझा सोई जानिए, जाके हृदय विवेक ।। जिस हृदय में विवेक का. विचार का दीपक जलता है, वह हृदय देव-मन्दिर-तुल्य है। जिस हृदय में विवेक-विचार का दीपक नहीं है, वह अन्धकार-मय हृदय श्मशान के समान है। जब तक हृदय में विवेक तथा विचार की ज्योति नहीं जलती, तब तक कोई कितना ही उपदेश दे, समझाये बुझाये सब भैंस के सामने बीन बजाने के समान है, अन्धे के सामने कत्थक नृत्य दिखाने के वरावर है और बहरे के समक्ष शास्त्रीय संगीत गाने के तुल्य है। विचार शून्य मनुष्य कभी भी भले-बुरे का, हित-अहित का निर्णय नहीं कर सकता। इसलिए कहा है- आँख का अन्धा संसार में सुखी हो सकता है, किन्तु विचार का अन्धा मुखी नहीं हो सकता। विचार, और विवेक जीवन-महल की नीव है। सुरम्य प्रासाद, आलीशान भवन और आकाश से बातें करने वाले महल आख़िर किस पर टिके होते है ? नीव पर। यदि महल की नीव नही है या नींव कमजोर है तो प्रथम तो...
चेन्नई, — जैन डॉक्टर्स एसोसिएशन (JDA) द्वारा E-होटल, चेन्नई में एक भव्य स्थापना समारोह का आयोजन किया गया, जिसमें नई कार्यकारिणी की घोषणा की गई। इस गरिमामयी अवसर पर 90 से अधिक डॉक्टर्स ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और कार्यक्रम को सफल बनाया। जैन डॉक्टर्स एसोसिएशन एक ऐसा मंच है जो चेन्नई में कार्यरत 200 से अधिक विभिन्न विशेषज्ञताओं के जैन डॉक्टर्स को एकजुट करता है। इस संस्था का उद्देश्य न केवल चिकित्सा क्षेत्र में उत्कृष्टता को बढ़ावा देना है, बल्कि समाज सेवा, हेल्थकेयर अवेयरनेस, परस्पर सहयोग, और युवा डॉक्टर्स को मार्गदर्शन प्रदान करना भी है। यह संस्था एक परिवार की भावना के साथ कार्य करती है — “एकता में शक्ति है” के मूलमंत्र को आत्मसात करते हुए। नव-गठित मुख्य कार्यकारिणी में शामिल हैं: • डॉ. नितेश जैन – अध्यक्ष • डॉ. जसवंत खातोड़ – उपाध्यक्ष • डॉ. जीनेन्दर गोती – सचिव • डॉ. विजय कुमार सोहनल...
युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी के प्रबुद्ध सुशिष्य मुनिश्री डाॅ ज्ञानेन्द्र कुमार जी एवं मुनिश्री रमेश कुमार जी आदि ठाणा-4 के पावन सान्निध्य में आज तेरापंथ धर्मस्थल में तपोत्सव का आयोजन हुआ। जिसमें एक साथ छह तपस्वियों का तेरापंथी सभा द्वारा तपोभिनन्दन किया गया। राजेन्द्र जी कोठारी (खुश्कीबाग बिहार) 31 दिन की , श्रीमती मंजुला सेठिया ( गंगाशहर राजस्थान) धर्मचक्र तप , दस वर्षीय सुश्री पूर्वी भादानी 9 दिन की , मास्टर श्रेयांस भादानी 8 दिन की ( भाई – बहन ) , नो वर्षीय सुश्री हरविका महनोत 8 दिन की तपस्या, सुश्री दीक्षा छल्लाणी 8 दिन की तपस्या पर तपोत्सव का आयोजन हुआ। मुनि डाॅ ज्ञानेन्द्र कुमार जी ने कहा – गुवाहाटी में छोटे छोटे बालक बालिकाओं की तपस्या की लहर पूरे देश में फैल रही है। बच्चों देखकर बच्चों के मन में तपस्या करने की प्रतिस्प्रदा सी चल रही है। बच्चों को देखकर बडे भी तपस...
तपस्वी भाई-बहन का तपोभिनंदन आचार्य महाश्रमण के प्रबुद्ध सुशिष्य मुनि डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार जी , मुनि रमेश कुमार जी , मुनि पद्म कुमार जी एवं मुनि रत्न कुमार जी के पावन सान्निध्य एवं तेरापंथी सभा के तत्वावधान में बुधवार को स्थानीय तेरापंथ धर्मस्थल में मास्टर देव महनोत एवं सुश्री मानसी महनोत ( भाई – बहन – सुपुत्र-सुपुत्री : प्रदीप कुमार-पूजा देवी) के क्रमश: नौ (9) एवं अठाई (8) की तपस्या के उपलक्ष्य में तपोभिनंदन समारोह का आयोजन किया गया। इस अवसर पर तेरापंथी सभा, गुवाहाटी की ओर से साहित्य एवं प्रशस्ति-पत्र प्रदान कर तपस्वी भाई-बहन के तप की अनुमोदना की गई। इस अवसर पर मुनि डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार ने तपस्वी भाई-बहनों की अनुमोदना करते हुए कहा कि आज दो छोटे-छोटे बच्चों ने 9 एवं 8 की तपस्या करके अपनी आत्मा को पुष्ट किया है। तपस्वी व्यक्ति अपने परिवार, समाज एवं संघ का गौरव बढ़ाता है। तपस्वी भा...
श्री गुजराती जैन संघ गांधीनगर में चातुर्मास विराजित दक्षिण सूर्य ओजस्वी प्रवचनकार डॉ श्री वरुण मुनि जी म .सा. ने धर्म सभा में उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि व्यक्ति के लिए अपने जीवन में सद्गुरु का सत्संग , समागम कल्याणकारी हितकारी, मंगलकारी और हमारे असंतुलित जीवन को सही दिशा बोध प्रदान करने वाला होता है। सद्गुरु का समागम मिलना बड़ा कठिन है। उन्होंने कहा कि गुरु हमें जीवन जीने की सही कला सीखाते है। मुनि श्री ने राष्ट्रसंत अनन्त उपकारी उत्तर भारतीय प्रर्वतक परम पूज्य दादा गुरुदेव भण्डारी श्री पदम चन्द्र जी महाराज साहब,परम पूज्य श्री मोतीलाल जी महाराज साहब के उन पर एवं जिनशासन पर किये असीम उपकारों को याद करते हुए कहा कि महापुरुषों का जीवन हम सबके लिए एक प्रकाश स्तंभ के समान जीवन को सही दिशा प्रदान करने वाला और प्रेरणादायी होता है। गुरु हमारे जीवन निर्माता है। बिना गुरु के जी...