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संसार मे जन्म मरण का कारण आयुष्य कर्म: साध्वी संबोधि 

आयुष्य कर्म के अस्तित्व से प्राणी जीवित रहता है और इसका क्षय होने पर मृत्यु को प्राप्त करता है। इस कर्म का स्वभाव कारागृह के समान बताया है। यह कर्म आत्मा के अविनाशी गुण को रोकता है। जैसे पैर में बेड़ी पड़ जाने पर मनुष्य एक ही स्थान से बन्ध जाता है वैसे ही आयुष्य कर्म आत्मा को अमुक जन्म में निर्धारित अवधि तक रोके रखता है। जब आयुष्य कर्म समाप्ति की ओर होता है तब दुनिया की कोई भी शक्ति उसे रोक नहीं सकती। जन्म, बाल्यत्व, युवकत्व, वृद्धत्व और मृत्यु आदि अवस्थाएं आयुष्य कर्म का ही प्रभाव है। देव, मनुष्य, तिर्यंच और नरक इन चार गतियों में से किस आत्मा को कितने काल तक अपना जीवन वहाँ बिताना है, इसका निर्णय आयु कर्म करता है। जहाँ जीव भयंकर वेदना भुगतता है उसे नरकायु कहते हैं। तीव्र क्रूर भावों के साथ सदैव हिंसा में आसक्त रहने से, अत्यधिक संचय वृत्ति से, पंचेन्द्रिय प्राणियों का वध करने से तथा मांसाहा...

हरी को पाने के लिये हीरे का त्याग करना ही पड़ेगा-पूज्याश्री कमलप्रज्ञा मसा

परिग्रह करोगे तो या तो खाएगा परिवार, या ले जाएगी सरकार-पूज्याश्री डॉ संयमलताजी मसा मालव केसरी श्री सौभाग्यमल जी मसा के सुशिष्य, श्रमण संघीय प्रवर्तक श्री प्रकाशमुनिजी मसा के आज्ञानुवर्तिनी पंडित रत्न मालव भूषण श्री महेन्द्र मुनि जी मसा के देवलोक गमन पर श्री वर्धमान स्थनकवासी जैन श्रावक संघ नीमचौक द्वारा गुणानुवाद सभा का आयोजन रखा गया, जिसमें महासाध्वी डॉ संयमलता जी मसा ने 04 लोग्गस का काउसग्ग करवाया, संघरत्न इंदरमल जैन, महेंद्र बोथरा, अजय खमेसरा एवं विनोद बाफना ने भी म.सा. के प्रति आदरांजली अर्पित की, ततपश्चात मसा ने माँगलिक फरमाइ। महासाध्वी डॉ श्री संयमलताजी मसा ने परिग्रह के बारे में बताया की जितना हम छोडना चाहते है उतनी ही इच्छा बढ़ती जाती है। परिग्रह भी 02 प्रकार के होते है। सचित परिग्रह और, अचित परिग्रह, सचित परिग्रह में दास-दासी, नौकर-चाकर, पशु-पक्षी आदि का परिग्रह होता है और अचित परि...

थॅंक्स गिव्हींग की भावना रहनी चाहिए! – साध्वी स्नेहाश्री जी म.सा.

जन्मदेनेवाले माता पिता , शिक्षा देनेवाले गुरुजन, धर्मआराधना सिखानेवाले धर्मगुरु, अन्नदाता, समाज, परिवार, एवं अपने हर कार्य मे सहाय्यभुत होने वाली व्यक्ति के प्रति हमे धन्यवाद अदा करने चाहिये!     परिवार को एक सुत्र में बॉंध रखनेकी ज़िम्मेवारी हर नारी पर है ! नारी घर परिवार की शान है, सन्मान है ! आज के धर्मसभा में विस्तार से थॅंक्स गिव्हींग का महत्व विशद साध्वी स्नेहाश्रीजी ने किया!

थॅंक्स गिव्हींग की भावना रहनी चाहिए! – साध्वी स्नेहाश्री जी म.सा.

जन्मदेनेवाले माता पिता , शिक्षा देनेवाले गुरुजन, धर्मआराधना सिखानेवाले धर्मगुरु, अन्नदाता, समाज, परिवार, एवं अपने हर कार्य मे सहाय्यभुत होने वाली व्यक्ति के प्रति हमे धन्यवाद अदा करने चाहिये! परिवार को एक सुत्र में बॉंध रखनेकी ज़िम्मेवारी हर नारी पर है ! नारी घर परिवार की शान है, सन्मान है ! आज के धर्मसभा में विस्तार से थॅंक्स गिव्हींग का महत्व विशद साध्वी स्नेहाश्रीजी ने किया!

प्रतिक्रमण से विशुद्ध होती है आत्मा : मुनि डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार

तपस्वी गौरव कुंडलिया का तपोभिनंदन आचार्य महाश्रमण के प्रबुद्ध सुशिष्य मुनि डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार जी , मुनि रमेश कुमार जी , मुनि पद्म कुमार जी एवं मुनि रत्न कुमार जी के पावन सान्निध्य में मंगलवार को स्थानीय तेरापंथ धर्मस्थल में गौरव कुंडलिया (सुपुत्र : धनपत कुंडलिया, सरदारशहर) के नौ (9) की तपस्या के उपलक्ष्य में तपोभिनंदन समारोह का आयोजन किया गया। मुनि डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार जी ने उपस्थित जनमेदिनी को फरमाया – जैन धर्म में निक्षेप के आधार पर प्रतिक्रमण 6 प्रकार के होते हैं- नाम, स्थापना, द्रव्य, क्षेत्र, काल एवं भाव। प्रतिक्रमण से आत्मा विशुद्ध होती है। मुनिश्रीजी ने तपस्वी गौरव कुंडलिया की तपस्या की अनुमोदना करते हुए कहा कि तपस्या प्रदर्शन के लिए नहीं, निदर्शन के लिए करनी चाहिए। तपस्या आडम्बर रहित करनी चाहिए।   मुनि रमेश कुमार ने कहा कि आत्मा और पुद्गल दोनों के मिलने पर जन्म, मरण, भय, शो...

प्रभु की भक्ति श्रद्धा भक्ति से करें: डॉ श्री वरुण मुनि जी

श्री गुजराती जैन संघ गांधीनगर में चातुर्मास विराजित दक्षिण सूर्य ओजस्वी प्रवचनकार डॉ श्री वरुण मुनि जी म.सा. ने कहा कि प्रभु की भक्ति श्रद्धा भक्ति भाव से करें। क्योंकि भक्ति की शक्ति अपार है। वीतराग प्रभु के प्रति असीम श्रद्धा भक्ति रखते हुए भक्त जो भी पूजा भक्ति,गुण कीर्तन, नाम स्मरण पाठ करता है,वह मनुष्य जन्म का पहला फल है। हमें भी परमात्मा को प्राप्त करने की प्यास जगनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जिस दिन आपमें परमात्मा को प्राप्त करने की वास्तविक प्यास जग जायेगी तो समझ लेना अब प्रभू आपसे दूर नहीं है। तब साधक आत्मा अपना सब कुछ देकर भी उस अमृत तुल्य परमात्मा को प्राप्त करने में तन मन से लग जायेगा। जरुरत है बस प्रभू को सच्चे अर्थों में प्राप्त करने की चाह और प्यास लगनी चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि भक्ति भारतीय संस्कृति की एक आदर्श विशेषता है। परमात्मा की भक्ति करने से हमारा मन प्रसन्न हो जाता है...

अर्जुन, राजा जनक आणि जम्बूस्वामींप्रमाणे जिज्ञासा पाहिजे -प.पू.रमणीकमुनीजी म.सा.

जालना: प्रभू भगवान महावीरांच्या अंतर जगतामध्ये फुलांचा सुंगध आणि फळाचा रस आपल्याला चाखायला मिळतो. त्यांचे गुणवर्णन किती म्हणून करावे तेवढे ते थोडेच आहेत. म्हणूनच म्हटले आहे की, अर्जुन, राजा जनक आणि जम्बूस्वामींप्रमाणे जिज्ञासा पाहिजे, तुमची, आमची जिज्ञासा कशी आहे? याचा कधी तरी विचार केला का, असा हितोपदेश वाणीचे जादुगार श्रमण प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा. यांनी येथे बोलतांना दिला. ते गुरु गणेश सभा मंडपात चार्तुमासानिमित्त आयोजित विशेष प्रवचनात श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा.बोलत होते. यावेळी विचार पिठावर अन्य साध्वींची उपस्थिती होती. पुढे बोलतांना श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार, प.पू.रमणीकमुनीजी म. सा. म्हणाले की, अर्जुनाने गिता सांगितली अन् राजा जनक आणि जम्बू स्वामींनी आपल्याला सांगितले आहे. जेव्हा शिष्यत्व जेंव्हा बरसते तेव्हा मात्र हा घडा आपल्या गिळकृत केला पाहिज...

धन्यवाद देना और क्षमायाचना करना कभी ना भुले- आगमज्ञाता डॉ. सुयोगऋषिजी

नवकार आराधक उपप्रवर्तक पु तारकऋषिजी म.सा. आगमज्ञाता डॉ. सुयोगऋषिजी म.सा. आदि ठाणा 7 सादड़ी सदन स्थानकभवनमे चातुर्मासार्थ विराजमान है! धर्मआराधना एवं तपआराधना के माध्यमसे चातुर्मास गतिमान है! जिनवाणी की मधुर रसना भक्तगण ग्रहण कर रहै है! आज डॉ. सुयोगऋषिजी म.सा. ने धन्यवाद एवं क्षमा का महत्व अपने मधुरवाणी से द्रुष्टांतो सह समझाया! और दो छोटे शब्दोकी महानता बतायी! जन्म देनेवाले मॉं-बापका धन्यवाद यह सबसे बड़ा पुण्यका काम है ! सॉंस- और बहु के मधुर रिश्तो मे धन्यवाद की अदाकारी एवं क्षमापना की महकता समझायी! आज के धर्मसभा मे आकुर्डी-निगडी-प्राधिकरण श्री संघ के अध्यक्ष सुभाषजी ललवाणी तथा चातुर्मास समिती के स्वागताध्यक्ष मोतीलालजी चोरडीया उपस्थित थे ! प्रवचन, दर्शन एवं मंगलमय आशिर्वाद का लाभ लिया! अपने उदबोधन मे सुभाषजीने गुरुचरणोमे क्रुतज्ञता व्यक्त कर गुरुमॉं पु. चंद्रकलाश्री जी पु. स्नेहाश्रीजी आद...

तपस्वी करते हैं धर्मसंघ की प्रभावना : मुनि डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार

तपस्विनी बहिन लीला देवी के 35 दिन की तपस्या पर तपोभिनंदन आचार्य महाश्रमण के प्रबुद्ध सुशिष्य मुनिश्री डॉ. ज्ञानेन्द्र कुमार जी एवं मुनिश्री रमेश कुमार जी आदि ठाणा-4 के पावन सान्निध्य में सोमवार को तेरापंथ धर्मस्थल में लीला देवी महनोत के मासखमण तप (35 दिन) एवं प्रतीक बोथरा के धर्मचक्र तप के उपलक्ष्य पर तपोभिनंदन समारोह का आयोजन किया गया, जिसमें अच्छी संख्या में लोग उपस्थित हुए। तपस्विनी बहन लीला देवी महनोत को जुलूस के साथ समता भवन के सामने से तेरापंथ धर्मस्थल में लाया गया।   मुनि श्री डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार जी ने उपस्थित जनमेदिनी को फरमाया – तपस्या करने वाले सिर्फ अपने कर्मों की निर्जरा ही नहीं करते हैं बल्कि जन-जन के प्रेरणास्रोत बनते हैं तथा धर्मसंघ की प्रभावना भी करते हैं। तपस्या ज्ञान, दर्शन एवं चारित्र की आराधना है। सभी तपस्वियों के प्रति मंगल कामना।   मुनि रमेश कुमार जी ने कहा कि ...

गुरु अमर संयम अमृत वर्ष समापन समारोह का विराट आयोजन 5 अक्टूबर को बेंगलुरु में

कर्नाटक प्रदेश की राजधानी फूलों की नगरी बेंगलुरु की धर्मधरा पर तुरकिया जैन भवन, गांधीनगर में चातुर्मासार्थ विराजित श्रमण संघीय उपप्रवर्तक परम पूज्य गुरुदेव श्री पंकज मुनि जी म. सा., दक्षिण सूर्य अमर शिष्य प.पू. डॉ. श्री वरुणमुनि जी म. सा., मधुर गायक मुनिरत्न प.पू. श्री रूपेशमुनि जी म.सा आदि ठाणा 3 एवं बेंगलुरु में विराजित समस्त साधु-साध्वीजी भगवंतो की पावन निश्रा में 5 अक्टूबर 2025 को सरदार वल्लभ भाई पटेल सभागार, वसंतनगर, बेंगलुरु के भव्य विशाल प्रांगण में श्री गुजराती वर्धमान स्थानकवासी जैन संघ, गांधीनगर, बेंगलुरु के तत्वावधान में श्रुताचार्य, साहित्य सम्राट, उत्तर भारतीय प्रवर्तक, पूज्य गुरुदेव श्री अमरमुनि जी म.सा. के संयम अमृत महोत्सव समापन समारोह के विराट आयोजन के साथ श्रमण संघीय प्रथम आचार्य सम्राट प.पू.श्री आत्मारामजी म. सा. एवं प. पू. प्रवर्तक गुरुदेव श्री शुक्लचंद्रजी म.सा. का जन्...

अनित्यतेची जाणीव – वैराग्याकडे पहिले पाऊल

प्रवचन – 11.08.2025 – प पू श्री मुकेश मुनीजी म सा – (बिबवेवाडी जैन स्थानक) जैन तत्त्वज्ञानात बार भावना (१२ भावना) साधकाला आत्मशुद्धी, वैराग्य आणि मोक्षमार्गावर दृढ करण्यासाठी सांगितल्या आहेत. त्यातील पहिली भावना म्हणजे अनित्य भावना – जगातील सर्व गोष्टी नश्वर आहेत, क्षणभंगुर आहेत, याची सतत जाणीव ठेवणे. ‘अनित्य’ म्हणजे ‘स्थिर नसलेले’, ‘जे नाश पावणारे आहे’. हा भौतिक संसार, शरीर, संपत्ती, मान-सन्मान, संबंध – हे सर्व कालांतराने बदलतात आणि नष्ट होतात. आपला जीव मात्र नित्य आहे, पण शरीर आणि त्याच्याशी जोडलेल्या वस्तू अनित्य आहेत. उदाहरण जसे आपण रोज बाजारातून ताजे फुल विकत आणतो. दुसऱ्या दिवशी ते वाळते, तिसऱ्या दिवशी टाकून द्यावे लागते. हे जाणूनही आपण फुलाचा आनंद घेतो, पण त्याच्या टिकण्याची अपेक्षा ठेवत नाही. त्याचप्रमाणे जगातील प्रत्येक वस्तू तात्पुरती आहे, त्यामुळे तिच्याशी अति आसक्ती ...

जीवन निर्माण की शाला है ज्ञानशाला : मुनि डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार

ज्ञानशाला दिवस का आयोजन आचार्य महाश्रमण के विद्वान सुशिष्य मुनिश्री डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार जी , मुनि रमेश कुमार जी , मुनि पद्म कुमार जी एवं मुनि रत्न कुमार जी के सान्निध्य एवं श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा, गुवाहाटी के तत्वावधान में रविवार को स्थानीय तेरापंथ धर्मस्थल में ज्ञानशाला दिवस का भव्य आयोजन किया गया। इस अवसर पर ज्ञानशाला संयोजक रोहित सुराणा एवं मुख्य प्रशिक्षिका ममता पुगलिया के नेतृत्व में सभी ज्ञानार्थी एवं प्रशिक्षिकाएं एक जुलूस के रूप में साधना मंदिर के पास से तेरापंथ धर्मस्थल पहुंचे। इस अवसर पर मुनि डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार जी ने कहा कि ज्ञानशाला हमारे जीवन निर्माण की शाला है। जीवन में संस्कारों का जागरण अपेक्षित है। संस्कारी बच्चे समाज की नींव को मजबूत बनाते हैं। गुरुदेव तुलसी ने भावीपीढ़ी को सशक्त बनाने के लिए ज्ञानशाला का उपक्रम समाज के सामने रखा। अभिभावक अधिकाधिक संख्या में बच...

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