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कर्मो का राजा मोहनीय कर्म: साध्वी सम्बोधि

जो कर्म आत्मा को मोहित करके मूढ़ता उत्पन्न करता है वह मोहनीय कर्म है। जिस प्रकार नशीली वस्तुओं के सेवन से सोचने-विचारने की बुद्धि कुण्ठित हो जाती है, उसी प्रकार मोहनीय कर्म आत्मा की विवेक शक्ति को कुण्ठित करके उसे दुष्कृत्य में प्रवृत्त कराता है। जैसे मदिरा-पान करने वाला जहाँ-तहाँ गिर जाता है और अपना नियंत्रण खो देता है उसी भाँति आत्मा मोहनीय कर्म के कारण मूढ़ बनकर अपने हिताहित का, सत्य-असत्य का व कल्याण-अकल्याण का भान भूल जाती है। हिताहित को कदाचित् जान-समझ भी लें किन्तु मोहवश आचरण नहीं कर पाती। काम-क्रोध, मद-लोभादि अनेक प्रकार के मनोविकार इसी कर्म के आविष्कार हैं। आत्मा को संसार में रचा-पचा कर रखने वाला एवं अपने आप को बिलकुल विस्मृत कराने वाला मोहनीय कर्म है। प्रणय सम्बन्ध, एवं प्रेम-लीलाएं भी इसी कर्म के विविध नाटक हैं। यही कारण है इसे सब कर्मों का राजा कहा जाता है। तीव्र क्रोध, मान, मा...

प्रभूला जुडण्यासाठी काय कराल-प.पू.रमणीकमुनीजी म.सा.

जालना : जो शिष्य सद्गुरुंना जुडला आहे, अशा शिष्यला देवत्व आल्याशिवाय राहत नसेल परंतू देवत्व प्राप्त करणे ही गोष्ट काही सोपी नाही. भक्तीत राहून आसक्तीला कसे जवळ करता येईल, हे दोन्ही रस्ते वेगळे आहेत, असा हितोपदेश वाणीचे जादुगार श्रमण प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा. यांनी येथे बोलतांना दिला. ते गुरु गणेश सभा मंडपात चार्तुमासानिमित्त आयोजित प्रवचनात श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा.बोलत होते. यावेळी विचार पिठावर अन्य साध्वींची उपस्थिती होती. पुढे बोलतांना श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार, प.पू.रमणीकमुनीजी म. सा. म्हणाले की, परमवीर म्हणजे महावीर! परिपूर्ण आहेत ते! केवळ पूर्ण नाही तर परिपूर्ण आहेत. परिवार म्हणजे चारही बाजूंनी वार येत असतात ना! तो परिवार! तसे हे परिपूर्ण नाही. जे खरोखरच परिपूर्ण आहेत. विचार करा, चार गतीने फिरणे म्हणजे हा आपला झाला परिगृह! आप जिसको देखते नही कल...

महापुरुषों के जीवन से प्रेरणा लें- डॉ वरुण मुनि जी

श्री गुजराती जैन संघ गांधीनगर में चातुर्मास विराजित दक्षिण सूर्य ओजस्वी प्रवचनकार डॉ श्री वरुण मुनि जी म . सा. ने धर्म सभा में उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि महापुरुषों का जीवन जगत के प्राणी मात्र के लिए एक आदर्श प्रेरणा स्त्रोत होता है। उन्होंने श्रमण सूर्य मरुधर केसरी पूज्य प्रवर्तक श्री मिश्रीमल जी महाराज की 135वीं जन्म जयंती पर उनके बहुआयामी व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मरुधर केसरी श्री मिश्रीमल जी महाराज मानवता के सच्चे मसीहा थे। उनके सद्प्रेरणा में जीवदया, मानव सेवा और गौशाला, स्कूल, कालेज, आदि समाज सेवा, उत्थान में समर्पित अनेकों धार्मिक, सामाजिक, पारमार्थिक संघ संस्थाएं वर्तमान में भी अनेक स्थानों पर सुन्दर रूप से संचालित गतिमान है। लोकमान्य सन्त , वरिष्ठ प्रर्वतक श्री रुप मुनि जी महाराज की 98वीं जन्म जयंती पर उनके गुणानुवाद करते हुए कहा कि वे आध्यात्मिक ऊर...

णीकमुनीक्रोध, मान, माया, लोभ हे अठरा पाप म्हणजे कौरवांची सेना-प.पू.रमजी म.सा.

जालना : क्रोध, मान, माया लोभ हे अठरा पाप म्हणजे कौरवांची सेना आहे. आपण बर्‍याचदा म्हणतो की, मला क्रोध येतच नाही. पण समोरचा तसा वागतो म्हणून… हे मोहनिया कर्माचा खेळ आहे. ही मोहनिया कर्माची ही औलाद आहे, असा हितोपदेश वाणीचे जादुगार श्रमण प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा. यांनी येथे बोलतांना दिला. ते गुरु गणेश सभा मंडपात चार्तुमासानिमित्त आयोजित प्रवचनात श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा.बोलत होते. यावेळी विचार पिठावर अन्य साध्वींची उपस्थिती होती. पुढे बोलतांना श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार, प.पू.रमणीकमुनीजी म. सा. म्हणाले की, आत्माचे स्वभावीक गुण कोणता असेल तर तो म्हणजे क्षमा! माफ करणे म्हणजे किसी का दिल भर गया तो मेरी तो सब भडास निकाल गयी! कोई सुनेवालाही नही मिला था! डॉक्टरकडे आपण का जातो? तर तो आपल्याला ठिक करेल म्हणून. तोच जर बिमार पडत असेल तर त्याच्याकडे कोण जाईल....

साधना से सिद्धि की प्राप्ति- डॉ श्री वरुण मुनि जी

श्री गुजराती जैन संघ गांधीनगर में चातुर्मास विराजित श्रमण संघीय उप प्रवर्तक श्री पंकज मुनि जी महाराज, दक्षिण सूर्य ओजस्वी प्रवचनकार डॉ श्री वरुण मुनि जी म. सा. एवं मधुर वक्ता श्री रुपेश मुनि जी म सा के पावन सानिध्य में शनिवार को धर्म सभा में आज सुरक्षा कवच मंत्र विधान रुप महा मंगलकारी कल्याणकारी और सर्व सिद्धि समृद्धिदायक आनंदकारी श्री पैसठिया छंद जाप अनुष्ठान का विशाल भव्य कार्यक्रम सैकड़ों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में आयोजित किया गया। परम पूज्य गुरुदेव के मार्गदर्शन में सभी श्रद्धालुओं ने सामूहिक रूप से तीर्थंकर भगवान की स्तुति उर्जा मय भक्ति भाव से ओतप्रोत होकर बड़े ही श्रद्धा भक्ति आनंद से सराबोर होकर इस मंत्र जाप अनुष्ठान संपन्न किया। इस अवसर पर डॉ श्री वरुण मुनि जी ने पैसठिया मंत्र जाप अनुष्ठान की विधिवत साधना संपन्न कराते हुए इसके विशिष्ट साधना फल के बारे में सारगर्भित प्रकाश डाला। र...

अणुव्रत से होता हित अहित का ज्ञान – साध्वी उदितयशा

 नशा मुक्त रहने का संकल्प स्वीकार कर श्रावक समाज ने दी रक्षाबंधन की भेंट  अणुव्रत समिति द्वारा नशा मुक्ति कार्यशाला का हुआ आयोजन चेन्नई : अणुव्रत विश्व भारती सोसायटी के तत्वावधान में अणुव्रत समिति, चेन्नई की आयोजना में नशा मुक्ति अभियान ‘एलीवेट एक्सपीरियंस द रियल हाइ’ कार्यशाला का आयोजन अणुव्रत अनुशास्ता, युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमणजी की विदुषी सुशिष्या साध्वी श्री उदितयशाजी ठाणा 4 के पावन सान्निध्य में तेरापंथ भवन, साहुकारपेट, चेन्नई में समायोजित हुई।  साध्वी श्री उदितयशाजी ने कहा कि नशे का सबसे बड़ा परिणाम है, व्यक्ति स्वयं का भान भूल जाता है। उसके कारण वह अपने माता-पिता, परिजनों का सम्मान नहीं करता, अपने संस्कारों से च्युत हो जाता है। गुरुदेव तुलसी ने आज से 75 वर्ष पूर्व ही भांप लिया था, कि समाज में नशे की कुरीतियों घर कर सकती है, इसलिए उन्होंने हमें अणुव्रत रूपी महान अवद...

स्वाध्याय भवन में श्रावण शुक्ल पक्खी पर्व तप-त्याग पूर्वक मनाया

चेन्नई के बेसिन वाटर वर्क्स स्ट्रीट साहूकारपेट में स्थित स्वाध्याय भवन में श्रावण शुक्ल पक्खी पर्व जप-तप- त्याग पूर्वक मनाया गया | श्रद्धालुओं द्वारा आलोयणा का पाठ किया गया | पक्खी पाक्षिक पर्व पर स्वाध्यायी बन्धुवरों श्री प्रकाशचन्दजी ओस्तवाल,श्री भवरलालजी लोढा,कांतिलालजी तातेड़, सुमेरचंदजी बागमार, नवरतनमलजी बागमार ने चार प्रहर के पौषध व आर वीरेन्द्रजी कांकरिया, लीलमचन्दजी बागमार,बाबू धनपतराजजी सुराणा,विकास जी बम्ब, पंकजजी सुराणा,ने रात्रिकालीन संवर की साधना की | इस प्रसंग पर स्वाध्यायी श्री बादलचन्दजी बागमार ने देवसीय व नवरतनमलजी बागमार, भवरलालजी लोढा ने रायसी प्रतिक्रमण करवाया | पौषध व संवर साधना करने वालों के संग श्री उम्मेदराजजी ज्ञानचन्दजी बागमार आर नरेन्द्रजी कांकरिया नवरतनमलजी चोरडिया,दीपकजी श्रीश्रीमाल इंदरचंदजी कर्णावट, अशोकजी रांका,गौतमचन्दजी मुणोत,ने सायंकालीन प्रतिक्रमण करते हु...

रक्षाबंधन रिश्तों को जोडऩे का पर्व: साध्वी स्नेहाश्री जी म. सा.

रक्षाबंधन पर विशेष प्रवचन आकुर्डी स्थानक भवन में आयोजन ! रक्षाबंधन प्रेम का पर्व है। प्रेम न हो तो जीवन नीरस हो जाता है और प्रेम हो तो मरुस्थल भी मरुधान बन जाता है। उन्होंने कहा कि राम के समय मर्यादा का मार्ग था, कृष्ण के समय कर्मयोग की प्रेरणा थी, महावीर के समय अहिंसा उपयोगी थी, पर आज के समय में इंसान की हर समस्या का समाधान एकमात्र प्रेम के मार्ग से संभव है। उन्होंने कहा कि अब हर परिवार, समाज और देशों के बीच प्रेम की आवश्यकता है। प्रेम तो उस सूई की तरह है जो टूट चुके रिश्तों को सांधने का काम करती है। जिस घर में प्रेम और मौहब्बत है वहाँ लक्ष्मी तो छोड़ो महावीर और महादेव भी आने के लिए मजबूर हो जाते हैं। रक्षाबंधन पर आयोजित विशेष प्रवचन-सत्संग में श्रद्धालुओं को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि प्रेम से बढ़कर न तो कोई धर्म है न कोई पुण्य। प्रेम में प्रणाम भी है, प्रसाद भी है और आशीर्वाद भी। ...

उपप्रवर्तिनी प. पु. चंदनबालाजी के पावन सानिध्य मे अर्चना जी राजेंद्रजी लुणावत की मासखमण आराधना

चिंचवड गाँव मे चातुर्मासार्थ विराजीत उपप्रवर्तिनी पु चंदनबालाजी म.सा. पु. पदमावतीजी म.सा. आदि ठाणा 7 के पावन सानिध्य मे सुश्राविका अर्चनाजी राजेंन्द्रजी लुणावत ने 30 उपवास कर मासखमण तप का लाभ लिया! गत अनेक वर्षो से अर्चनाजी की मासखमण करने की मनिषा इस वर्ष देव गुरुधर्म के क्रुपा से पुरी हुई! इस अवसर पर अर्चनाजी को श्री संघ, जैन कॉन्फ़्रेंस, विविध महिला मंडल द्वारा सम्मानित किया गया! सन्मान करते हुये चिंचवड संघकेअध्यक्ष अशोकजी बागमार, कार्याध्यक्ष राजेंन्द्र जी जैन, पुर्वाध्यक्ष दिलीपजी नहार, सुभाषजी शिंगवी, दिलीपजी चोरडीया, अशोकजी बाफणा, मंडलेचा जी, भंडारी जी राजेंन्द्र जी लुणावत आदि पदाधिकारी गण, जैन कॉन्फ़्रेंस एवं स्वानंद महिला मंडल के और से आकुर्डी- निगडी- प्राधिकरण श्री संघ के अध्यक्ष सुभाषजी ललवाणी। प्रा प्रकाशजी एवं सुरेखाजी कटारिया, मनोज जी सोलंकी, सुभाषजी सुराणा, पीएम जैन आदि!

रेल अधिकारी को रक्षा सूत्र बांध अणुव्रत का दिया संदेश 

चेन्नई : अणुव्रत समिति द्वारा मानव में मानवता के विकास की तर्ज पर समिति शिष्टमंडल दक्षिण रेलवे कार्यालय में कार्यरत अधिकारीयों से मिला।  अध्यक्षा श्रीमती सुभद्रा लुणावत के नेतृत्व में एक शिष्टमंडल ने चेन्नई सेंट्रल के पास अवस्थित रेलवे कार्यालय में गया। मुख्य ट्रांसर्पोटेशन प्लानिंग मैनेजर श्री एस बालाजी अरुणकुमार से शिष्टाचार भेंट की। अध्यक्षा ने अधिकारी को राखी बांध कर उनके प्रति शुभकामना सम्प्रेषित कर अणुव्रत आंदोलन के बारे में सामान्य जानकारी प्रदान की गई। एस बालाजी ने बताया कि मुझे अपनी प्रशासनिक सेवा में विभिन्न स्थानों पर आचार्य श्री तुलसी, आचार्य श्री महाप्रज्ञ और आचार्य श्री महाश्रमण से रूबरू होने का मौका मिला। आपका जैन आचार्य होते हुए भी अणुव्रत के द्वारा जो पथप्रदर्शन दिया जा रहा है, वह समाज, राष्ट्रीय और विश्व की अनेकानेक समस्याओं को रोकने, मिटाने का अचूक असाम्प्रदायिक आंदोलन ह...

जीव को अनुकूल प्रतिकूल सुख दुख काअनुभव का कारण वेदनीय कर्म

वेदनीय कर्म सुख-दुःख का वेदन (अनुभव) कराता है। जैसे तलवार की धार पर लगे हुए शहद को चाटने से सुख का संवेदन होता है, उसी प्रकार साता वेदनीय कर्म के उदय से साता (सुख) का अनुभव होता है। साथ ही मधुलिप्त तलवार को चाटते हुए जिह्वा के कट जाने पर दुःख का एहसास होता है, उसी भाँति असाता वेदनीय कर्म के उदय से दुःख का अनुभव होता है। साता वेदनीय कर्म के प्रभाव से सुविधाओं की सर्वत्र अनुकूलता, सुशील परिवार और ऐसी सुखद परिस्थिति प्राप्त होती है जिसमें तनाव, भय और विपत्ति का नामोनिशान नहीं होता। असाता वेदनीय कर्म के प्रभाव से इससे विपरीत, अनिष्ट का संयोग होने से दुःख का अनुभव होता है। फलितार्थ यह है कि जो भी सुख-दुःख मिलते हैं उन्हें न कोई ईश्वर या खुदा देता है और न कोई देवशक्ति या मनुष्य देता है, यह वेदनीय कर्म का ही फल है। प्राणियों को मारने-पीटने व सताने से या शोक-संताप पहुँचाकर दुःखी करने से असाता वेदन...

बर्‍याचदा आम्हाला खूप खबरही सहन होत नाही-प.पू.रमणीकमुनीजी म.सा.

जालना : आत्मा हाच परमात्मा आहे, पण हे लक्षात कोण घेतो. त्यासाठी संकल्प करावा, परंतू आम्हाला तर संसाराशिवाय काहीही लागत नाही, असा हितोपदेश वाणीचे जादुगार श्रमण प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा. यांनी येथे बोलतांना दिला. ते गुरु गणेश सभा मंडपात चार्तुमासानिमित्त आयोजित प्रवचनात श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा.बोलत होते. यावेळी विचार पिठावर अन्य साध्वींची उपस्थिती होती. पुढे बोलतांना श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार, प.पू.रमणीकमुनीजी म. सा. म्हणाले की, आपण डॉक्टर, इंजिनिअर, वकील काहीही बनू शकतो. परमात्मा तर आम्ही केवळ तसे बनू पाहतो, परंतू त्यासाठी त्याग करण्याची आमची इच्छा आहे का, असे सांगून ते म्हणाले की, एक गाव होते आणि त्या गावात दोन मिठाचे पुतळे होते. त्यांनी विचार केला की, आपल्याला ह्या समुद्र हा मोजयाचा आहे, त्यासाठी आपल्याला त्यात डुबकी लावावी लागेल. असा त्यांनी विचार...

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