वेदनीय कर्म सुख-दुःख का वेदन (अनुभव) कराता है। जैसे तलवार की धार पर लगे हुए शहद को चाटने से सुख का संवेदन होता है, उसी प्रकार साता वेदनीय कर्म के उदय से साता (सुख) का अनुभव होता है। साथ ही मधुलिप्त तलवार को चाटते हुए जिह्वा के कट जाने पर दुःख का एहसास होता है, उसी भाँति असाता वेदनीय कर्म के उदय से दुःख का अनुभव होता है।
साता वेदनीय कर्म के प्रभाव से सुविधाओं की सर्वत्र अनुकूलता, सुशील परिवार और ऐसी सुखद परिस्थिति प्राप्त होती है जिसमें तनाव, भय और विपत्ति का नामोनिशान नहीं होता। असाता वेदनीय कर्म के प्रभाव से इससे विपरीत, अनिष्ट का संयोग होने से दुःख का अनुभव होता है। फलितार्थ यह है कि जो भी सुख-दुःख मिलते हैं उन्हें न कोई ईश्वर या खुदा देता है और न कोई देवशक्ति या मनुष्य देता है, यह वेदनीय कर्म का ही फल है।
प्राणियों को मारने-पीटने व सताने से या शोक-संताप पहुँचाकर दुःखी करने से असाता वेदनीय कर्म का बन्ध होता
है। संसार के समस्त जीवों पर अनुकम्पा रखने से और उन्हें दुःख, शोक व कष्ट न पहुँचाने से साता वेदनीय कर्म का बन्ध होता है।
माता-पिता व गुरू की तथा रुग्न, ग्लान और दर्दी की भावपूर्वक निःस्वार्थ सेवा करने से, उनके प्रति भक्तिभाव एवं अहोभाव रखने से उत्कृष्ट (उच्चतम) साता वेदनीय कर्म बँधता है।
जीवन में जब कभी दुःख, प्रतिकूलता या शारीरिक बीमारी आये तो उन्हें असाता वेदनीय का प्रभाव मानकर धर्म की शरण ग्रहण करना तथा उन प्रसंगों पर सावधान रहना जिससे असाता वेदनीय कर्म का बन्ध होता है। विश्व के समस्त जीवों के दुःख दूर हो, सबको शान्ति मिले, सब जीव निरामय हो, ऐसी मंगल-मैत्री का भाव रखने से मन में शान्ति, चित्त में समाधि और तन में स्वस्थता रहती है। सुख में अनासक्तता और दुःख में अनाकुलता बनाये रखना इस कर्म को जानने का सार है।