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गांधी नगर में मनाया गया 79 वा स्वतन्त्रता दिवस पर्व

श्रमण संघीय उप प्रवर्तक श्री पंकज मुनि जी म सा, ओजस्वी प्रवचनकार डॉ श्री वरुण मुनि जी म सा, मधुर वक्ता श्री रुपेश मुनि जी म सा के पावन निश्रा में शुक्रवार को 79 वें स्वतंत्रता दिवस पर्व बड़े ही उत्साह और उमंग हर्षौल्लास के साथ श्री गुजराती जैन संघ गांधीनगर के तत्वावधान में मनाया गया। इस अवसर पर दक्षिण सूर्य ओजस्वी प्रवचनकार डॉ श्री वरुण मुनि जी ने अपने संबोधन की शुरुआत में सभी श्रद्धालुओं और देशवासियों को 79 वें स्वतंत्रता दिवस पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं बधाई देते हुए कहा कि स्वतन्त्रता दिवस यह उन बहादुर स्वतन्त्रता सेनानियों की याद दिलाता है जिन्होंने अपने देश की आजादी के लिए अथाह तन मन धन से संघर्ष किया और अपने भारत देश को गुलामी की जंजीरो से आजाद कराते हुए अपने प्राणों का भी बलिदान कर दिया। उन्होंने कहा कि आज का यह पावन दिवस सभी भारतीयों में गर्व और देशभक्ति की गहरी भावना पैदा करता है। ...

श्रध्देला वाचवून ठेवले तर काही ना काही लाभ होईल!-प.पू.रमणीकमुनीजी म.सा.

जालना: श्रध्देला वाचवून ठेवावेच लागेल, त्याशिवाय आमच्याकडे दुसरा कोणताही पर्याय नाही, असे वाणीचे जादुगार श्रमण प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा. यांनी येथे बोलतांना सांगितले. ते गुरु गणेश सभा मंडपात चार्तुमासानिमित्त आयोजित विशेष प्रवचनात श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा.बोलत होते. यावेळी विचार पिठावर अन्य साध्वींची उपस्थिती होती. पुढे बोलतांना श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार, प.पू.रमणीकमुनीजी म. सा. म्हणाले की, आपण कल्लू मनाली जाते हो! यहा- वहा जाते हो! जब हम सिध्दालय में जायेंगें तभी हम कोई ना कोई ना तो काम करगें। भगवान महावीर का समोरन कोई कम नही. यही तो है संपूर्ण! सब कुछ यही पर है! बोल रहे सुधर्मा स्वामी की हमारे लिए यही नंदनवन है। आदमी कहा झुकता है! जो उससे जादा हो! धन हो, दौलत हो! इनके पासही आदमी झुकता है! महावीर को अगर बाहर से देखो गे तो, उनमे सब अवगुणही दिखेगे!लेक...

प्रसिद्धि और शरीर की विशेषता का कारण नाम कर्म: साध्वी संबोधि

शरीर और शरीर से सम्बन्धित अंग प्रत्यंग के कण-कण की रचना करने वाला नाम कर्म है। यश-अपयश, सुस्वर-दुस्वर और सौभाग्य-दुर्भाग्य भी नाम कर्म की देन है। आत्मा के अरुपी गुण को ढक कर रूपी (रूप, रस, गन्ध, स्पर्श) शरीर और उससे सम्बन्धित अंग-उपांग प्रदान करना नाम कर्म का कार्य है। जैसे चित्रकार अच्छी-बुरी विविध आकृतियाँ बनाता है, उनमें विभिन्न रंग भरता है और उन्हें सुरूप-कुरूप व सुडौल-बेडौल रूप में चित्रित करता है। इसी भाँति नाम कर्म आत्मा के अच्छे-बुरे विभिन्न रूप बना देता है। इसी कर्म के कारण एक मनुष्य काला-कलूटा या बीभत्स है तो एक सुन्दर एवं चित्ताकर्षक है। नाम कर्म दो प्रकार का है, शुभ नाम कर्म और अशुभनाम कर्म। शुभ प्रकृतियाँ पुण्य रूप है तो अशुभ प्रकृतियाँ पाप रूप हैं। नाम कर्म का स्वरूप जानकर यह भी सिद्ध हो जाता है कि शरीर और शरीर से सम्बद्ध जो भी मिला है, वह परमात्मा द्वारा नहीं अपितु नाम कर्म ...

“लोग्गस्स” जाप से महामंगलकारी अनुष्ठान संप्पन्न

पावन सानिध्य- गुरुमॉं पु. चंद्रकलाश्रीजी, साध्वी स्नेहाश्री जी, श्रुतप्रज्ञाश्री जी! आज आकुर्डी- निगडी- प्राधिकरण जैन श्रावक संघ के प्रांगण में सामुहिक लोग्गस्स जाप का महामंगलकारी अणुष्ठान संप्पन्न हुआ! “शासनसुर्या” पु. स्नेहाश्रीजी ने यह जाप करवाया! जापके लाभार्थी परिवार थे संघ कोषाध्यक्ष नेनसुखजी मांडोत, जैन कॉन्फ़्रेंस पंचम झोन अध्यक्ष नितीनजी बेदमुथा, विजयजी ओस्तवाल, मनोज जी ओस्तवाल! बड़ी भारी संख्या मे धर्मअनुरागीयो ने इस अनुष्ठान में सहभाग लिया! उपस्थित मान्यवरों का संघाध्यक्ष सुभाषजी ललवाणी एवं उपाध्यक्षा शारदाजी चोरडीया ने स्वागत किया! कल 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस के शुभ अवसर पर विशेष प्रवचन एवं विशेष देश भक्ति की पहचान विश्वस्त मंडल के विविध प्रस्तुति द्वारा होंगी! समारोह का आयोजन ॲक्टिव ग्रुप के माध्यम से सारिका ओस्तवाल एवं ऑंचल रांका, पल्लवी नहार, आदि के अथक प्रयास से संप्पन्न हो...

मिले शाश्वत मुक्ति: डॉ श्री वरुण मुनि जी

श्री गुजराती जैन संघ गांधीनगर में चातुर्मास विराजित दक्षिण सूर्य ओजस्वी प्रवचनकार डॉ श्री वरुण मुनि जी म.सा. ने गुरुवार को धर्म सभा में प्रथम तीर्थंकर परमात्मा श्री ऋषभदेव प्रभु की स्तुति रुप भक्तामर स्तोत्र के माध्यम से कहा कि तीर्थंकर प्रभु स्वयं तीरते है और साधक भक्त आत्माओं को भी संसार रुपी सागर से तिराने वाले हैं। प्रभु की भक्ति स्तुति से जीवन में मिलने वाले अदभुत लाभों पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि जिनेश्वर भगवान की श्रद्धा पूर्वक भक्ति में करने से साधक आत्मा के पूर्व संचित कर्म अपने आप ही यों क्षण भर में नष्ट हो जाते हैं जैसे कि मयूर की ध्वनि मात्र से ही चंदन वृक्षों के ओर लिपटे हुए सर्प अपने अपने बिलों में घुस जाते हैं। भक्ति में इतनी अपार शक्ति होती है। भक्ति एक अमर गुण है। इसलिए यह गुण आत्मा को भी अमर बना देता है। मुनि श्री ने वाणी के जादूगर, श्रुताचार्य उत्तर भारतीय प्रर्व...

हमारा मोह संसार में है: प.पूज्य डॉ श्री संयमलताजी म.सा.

हमारा मोह संसार में है। मोहनीय कर्म की स्थिती में 70 क्रोडा क्रोडी सागरोपम भोगना पडेगा। बडे बडे घरों मे कुत्ते बड़ी बड़ी गाडी में घूमते है है एसी घर मे रहते है मालिक उन्हें खुद नहलाता है, भले ही माता पिता की सेवा न करता हो, परिग्रह रखोगे तो सुख सुविधाएं मिलेगी लेकिन ऐसे कुत्ते जैसा भव मिलेगा। धन मे अत्याधिक आसक्ति रखोगे तो अगले जन्म में नाग बनकर उस धन की चौकीदारी करोगे। तो ताजगी गार्डन के फूल मे है, वह गमले के फूल मे नही है तो महक गमले के फूल मे है वैसी प्लास्टिक के फूल में नही। कुछ व्यक्ति गार्डन के फूल की तरह होते है खुद भी खाते है और को भी खिलाते है, सबका ख्याल रखते है, कुछ व्यक्ति गमले के फूल समान होते है जो खुद खाते है ज्यादा से ज्यादा अपने परिवार का ध्यान रखते है, बाकी किसी के बारे में नही सोचते है। और कुछ व्यक्ति कागज के फूल के समान होते है जो न तो खुद खाते है न दुसरो को खिलाते है । द...

अच्छे कार्यकी अनुमोदना करते रहो!- साध्वी स्नेहाश्री जी म.सा.

आकुर्डी निगडी प्राधिकरण जैन श्रावक संघ के प्रांगण में महाराष्ट्र सौरभ पु. चंद्रकलाश्री जी आदि ठाणा 3 का चातुर्मास अग्रेसर है! जिनवाणीका रसपान धर्म अनुरागी कर रहे हैं! अपने मधुर वाणी द्वारा शासन सुर्या पु. स्नेहाश्रीजी ने बताया, अनुमोदना का भाव का अर्थ है किसी और के अच्छे कार्यों या तपस्या की प्रशंसा करना और उसमें खुशी महसूस करना। इसे अनुमोदन, समर्थन या सहमति के रूप में भी समझा जा सकता है। अनुमोदन का अर्थ: अनुमोदना का शाब्दिक अर्थ है “अनुमोदन करना” या “सहमति देना”। यह किसी और के अच्छे कार्य, तपस्या, या धार्मिक क्रियाकलापों को देखकर प्रसन्न होना और उसमें शामिल होने की इच्छा रखना है। यह एक सकारात्मक भावना है जो दूसरों के धार्मिक या नैतिक कार्यों के प्रति सम्मान और प्रशंसा व्यक्त करती है। अनुमोदन का महत्व: अनुमोदना दूसरों को प्रेरित करती है और उन्हें अपने धार्मिक या नैत...

संधीचं सोनं करा-प.पू.रमणीकमुनीजी म.सा.

जालना : मोहनिय कर्मातून बाहेर कसे पडावे. आपलं भाग्य आहे की, आपल्याला या दरबारात प्रभू महावीरांची गाथा आपल्याला श्रवण करण्याची संधी प्राप्त झाली आहे. या संधीचं आपण सोनं केलं पाहिजे, असा हितोपदेश वाणीचे जादुगार श्रमण प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा. यांनी येथे बोलतांना दिला. ते गुरु गणेश सभा मंडपात चार्तुमासानिमित्त आयोजित विशेष प्रवचनात श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा.बोलत होते. यावेळी विचार पिठावर अन्य साध्वींची उपस्थिती होती. पुढे बोलतांना श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार, प.पू.रमणीकमुनीजी म. सा. म्हणाले की, आपण या गुरुंच्या दरबारात आहोत, अंगणात आहोत. या अंगणाची शोभा कधी वाढेल? आपण जेव्हा प्रभूंचे नाम घ्याल, त्यांचे गुणगाण गाल तेव्हाच तेही आपल्या पावन होतील, तेही आपल्या इच्छा, मनोकामना पूर्ण करतील. आपल्याला ही संधी मिळाली आहे, असे समजा आणि या संधींचे सोनं करा, असे सांगू...

योगी बनू शकत नाही पण सहयोगी तर बना!-प.पू.रमणीकमुनीजी म.सा.

जालना : योगी बनू शकत नाही पण सहयोगी तर बना. असा हितोपदेश देतांनाच ते म्हणाले की, आपलं घर आहे ना, ते सुमेधापरवत असलं तरी प्रभू महावीरांना कधीच विसरु नका, असे वाणीचे जादुगार श्रमण प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा. यांनी येथे बोलतांना सांगितले. ते गुरु गणेश सभा मंडपात चार्तुमासानिमित्त आयोजित विशेष प्रवचनात श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा.बोलत होते. यावेळी विचार पिठावर अन्य साध्वींची उपस्थिती होती. पुढे बोलतांना श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार, प.पू.रमणीकमुनीजी म. सा. म्हणाले की, प्रभू महावीरांप्रमाणे आनंद दायी जीवन जगायला शिका. भगवान मेरे है, असं प्रत्येकाला वाटायला हवे. आयना तो साफ किया तो मै नजर आया, जब मैने खुद्द को साफ किया तो तू नजर आयां! सांगायचं तात्पर्य हे जोपर्यंत मै हा जाणार नाही. तोपर्यंत आपण तरी कसे सुधरु, तुही मेरा सबकुछ है । योगी (अरिहंत), उपयोगी और सहयोगी! य...

प्रभु की भक्ति निष्काम भाव से करें: डॉ वरुण मुनि जी।

श्री गुजराती जैन संघ गांधीनगर में चातुर्मास विराजित दक्षिण सूर्य ओजस्वी प्रवचनकार डॉ श्री वरुण मुनि जी ने बुधवार को धर्म सभा में उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि प्रभु की भक्ति निष्काम भाव से करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जो मनुष्य शरीर प्राप्त करके भी प्रभु की भक्ति धर्म की आराधना नहीं करते हैं। वे मनुष्य होकर भी पशु समान है। जिसके द्वारा भजन किया जाए और अपने मन को प्रभु मय बना लिया जाए उसे भक्ति कहते है। भक्ता के हृदय में ईश्वर का वास ऐसे ही समझो जैसे की फूल में सुगंध। मुनिश्री ने भक्तामर स्तोत्र के माध्यम से विवेचना करते हुए कहा कि प्रभु की भक्ति ऐसे लगन, समर्पण भावों के साथ अत्यंत श्रद्धा भावों के साथ होनी चाहिए जैसे मानतुंग आचार्य जी ने प्रथम तीर्थंकर परमात्मा भगवान श्री ऋषभदेव की स्तुति की थी। जो उन्हें भक्त अमर बना दिया। भक्ति के मार्ग में सर्वप्रथम बालक के समान सरल हृदय...

अनित्य भावना – धनप्राप्तीचा मार्ग आणि मनाचा बदल

प्रवचन – 13.08.2025 – प पू श्री मुकेश मुनीजी म सा – (बिबवेवाडी जैन स्थानक) भगवंत महावीर स्वामींनी सांगितलेल्या 12 भावनांपैकी पहिली भावना म्हणजे अनित्य भावना. ‘अनित्य’ म्हणजे न टिकणारे, क्षणभंगुर. या जगात काहीही कायमचे नाही – शरीर, संपत्ती, मान, पद, नाती, सुख-दुःख… हे सारे बदलणारे आहे. या भावनेचे चिंतन केल्याने आपण बाह्य वस्तूंवर अनावश्यक मोह ठेवत नाही आणि जीवनाचा खरा उद्देश ओळखतो. धन ही जीवनाची आवश्यकता आहे, पण त्याची प्राप्ती सत्मार्गाने झाली पाहिजे. • सत्मार्गाने मिळालेल्या धनाचे परिणाम: मनात समाधान, शांतता, सत्प्रवृत्तीला चालना, समाजाचा विश्वास. • दुर्मार्गाने मिळालेल्या धनाचे परिणाम: भीती, असुरक्षितता, अपराधीपणा, सतत गुप्ततेची गरज, समाजात अविश्वास. उदाहरण : एक व्यापारी प्रामाणिकपणे व्यापार करून धन मिळवतो. थोडे उशिरा का होईना, पण त्याला समाजात सन्मान मिळतो, मनाला शांती मिळते...

आध्यात्मिक प्रक्रिया है प्रतिक्रमण : मुनि डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार

आचार्य महाश्रमण के प्रबुद्ध सुशिष्य मुनि डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार जी, मुनि रमेश कुमार जी , मुनि पद्म कुमार एवं मुनि रत्न कुमार के पावन सान्निध्य में तेरापंथ धर्मस्थल में आयोजित आगम आधारित प्रवचनमाला में बुधवार को मुनि डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार ने कहा कि जैन धर्म में प्रतिक्रमण एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक प्रक्रिया है, जिसका अर्थ है अपनी गलतियों को स्वीकार करना, पश्चाताप करना और भविष्य में उन गलतियों को न दोहराने का संकल्प लेना। यह आत्मा को कर्मों के बंधन से मुक्त करने और आध्यात्मिक शुद्धि प्राप्त करने का एक तरीका है। इसलिए भावपूर्वक प्रतिक्रमण करके अपनी आत्मा को विशुद्ध बनाएं। मुनिश्री ने श्रावक-श्राविकाओं को भादवा महीने एवं पर्युषण महापर्व के दौरान अधिकाधिक तपस्या करने की भी प्रेरणा दी। मुनि रमेश कुमार ने उपस्थित जनमेदिनी को फरमाया – नमि राजर्षि एक ऐसे संत थे, जो अध्यात्म के उच्च शिखर पर आरोहण ...

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