*क्रमांक — 470* . *कर्म-दर्शन* 🚥🔹🚥🔹🚥🔹🚥 🔹🚥🔹🚥🔹🚥 *🔹किन पुद्गलों का और कितने आत्मप्रदेशों से ग्रहण ?* *👉 विशेषावश्यक भाष्य में भी उपरोक्त कथनानुसार जीव कर्म के योग्य कार्मणवर्गणा के एक क्षेत्रावगाही पुद्गलों को सब आत्मप्रदेशों से ग्रहण करता है। वह अपने आत्मप्रदेशों से अवगाहित क्षेत्र से भिन्न क्षेत्र में अवगाढ़ पुद्गलों को कभी ग्रहण नहीं कर सकता है। कर्मप्रकृति ग्रंथ में भी इस तथ्य का पिष्ट-पेषण...