*क्रमांक — 470*
. *कर्म-दर्शन*
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*🔹किन पुद्गलों का और कितने आत्मप्रदेशों से ग्रहण ?*
*👉 विशेषावश्यक भाष्य में भी उपरोक्त कथनानुसार जीव कर्म के योग्य कार्मणवर्गणा के एक क्षेत्रावगाही पुद्गलों को सब आत्मप्रदेशों से ग्रहण करता है। वह अपने आत्मप्रदेशों से अवगाहित क्षेत्र से भिन्न क्षेत्र में अवगाढ़ पुद्गलों को कभी ग्रहण नहीं कर सकता है। कर्मप्रकृति ग्रंथ में भी इस तथ्य का पिष्ट-पेषण करता हुआ प्रमाण – दृष्टिगोचर होता है। वहाँ पर भी इसी नियम का निरूपण उपलब्ध है।*
*कुछ आचार्य आत्मा के आठ रुचक-प्रदेशों को सर्वथा अबद्ध मानते हैं। अर्थात वे आठ प्रदेश कार्मणवर्गणा के पुद्गलों द्वारा कभी आच्छादित होते ही नहीं हैं। वे सदैव उज्ज्वल रहते हैं। नन्दी सूत्र में यह लिखा है कि-*
*अक्खरस्स अणंतभागो निच्चुग्घाडिओ, …*
*इसका अर्थ हुआ कि प्रत्येक जीव का अक्षर का अनंतवाँ भाग नित्य अनावृत रहता है। यदि वह आवृत्त हो जाए, तो जीव अजीवत्व को प्राप्त हो जाता है। इन प्रदेशों को दिगम्बर आम्नाय में स्थिर-प्रदेश या अचल प्रदेश की संज्ञा से अभिहित करते हैं। धवला में लिखा है कि जीव के आठ मध्य प्रदेशों का परस्पर जो प्रदेश बन्ध होता है, वह अनादि शरीरिबन्ध कहलाता है। यह प्रयोगबन्ध न होकर स्वाभाविक बन्ध है। इसका कारण है कि धवला में अनेक प्रकार के बंधों का उल्लेख किया है जैसे आलापन, अल्लीवण, संश्लेष, शरीर और शरीरि बंध। इनमें शरीरी जीव को कहते हैं। जब पाँच शरीरों के साथ पाँच शरीरों का आपस में जो बंध है, वह शरीरबंध कहलाता है। जीवप्रदेशों का जीवप्रदेशों के साथ जो बंध है वह अनादि शरीरिबन्ध है एवं जीव प्रदेशों का पाँच शरीरों के साथ जो बंध होता है, वह सादि शरीरिबंध है।*
*क्रमशः ……….. आगे की पोस्ट से जानने का प्रयास करेंगे एक समय में गृहीत कर्मप्रदेशों का परिमाण के बारे में।*
*✒️लिखने में कुछ गलती हुई हो तो तस्स मिच्छामि दुक्कडं।*
विकास जैन।