*क्रमांक — 475* . *कर्म-दर्शन* 🚥🔹🚥🔹🚥🔹🚥 🔹🚥🔹🚥🔹🚥 *🔹जीव और कर्म के बंध पश्चात् परिणमन का स्वरूप* *7. कर्म का बंध कार्मण शरीर से — समयसार में सूक्ष्म दृष्टि से वर्णन करते हुए कहते हैं कि पहले बंधे हुए सभी कर्म, पृथ्वी के पिण्ड समान पुद्गल पिण्डवत् हैं और आत्मा कर्म और कर्मोदयज भाव से भिन्न है।* *पुढवी पिंडसमाणा पुव्वणिबद्धा दु पच्चया तस्स ।* *कम्मसरीरेण दु ते बद्धा सव्वेपि णाणिस्स ।।* *यहाँ...