*क्रमांक — 475*
. *कर्म-दर्शन*
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*🔹जीव और कर्म के बंध पश्चात् परिणमन का स्वरूप*
*7. कर्म का बंध कार्मण शरीर से — समयसार में सूक्ष्म दृष्टि से वर्णन करते हुए कहते हैं कि पहले बंधे हुए सभी कर्म, पृथ्वी के पिण्ड समान पुद्गल पिण्डवत् हैं और आत्मा कर्म और कर्मोदयज भाव से भिन्न है।*
*पुढवी पिंडसमाणा पुव्वणिबद्धा दु पच्चया तस्स ।*
*कम्मसरीरेण दु ते बद्धा सव्वेपि णाणिस्स ।।*
*यहाँ इस कथन का तात्पर्य यह है कि पुद्गल का स्वभाव और जीव का स्वभाव भिन्न है। ये सजातीय नहीं हैं। विजातीय होने के कारण कर्मप्रकृतियाँ जीव से नहीं बल्कि कार्मण शरीर से ही एक होकर पृथ्वी पिण्डवत् बंधी हुई हैं। यह आचार्य कुन्दकुन्द ने समयसार में शुद्ध निश्चय नय से कहा है।*
*उपरोक्त आगम वाणी एवं आचार्यों द्वारा प्राप्त समस्त उद्धरणों को पढ़कर हमें चार प्रकार के निरूपण प्राप्त होते हैं।*
*1. प्रथमतः यह प्रतीत होता है कि एक क्षेत्रावगाहके सिद्धांत से ये एक-दूसरे आपस में अनुप्रविष्ट हो रहे हैं जैसे अग्निलोहपिण्डवत् या अन्योन्य अनुप्रवेशवत्।*
*2. दूसरी ओर आवेष्टन आदि उपमाओं का अर्थ निकलता है कि जीव प्रदेश और कर्म पुद्गल स्कन्धों में परस्पर अन्योन्य स्पृष्ट संबंध हो जाता है। जैसे भगवई में जल में छिद्रवत् नौका, ढक्कन स्वरूप, विशेषावश्यकभाष्य के सूची कलापवत् अथवा समयसार में सेवाल आच्छादित जल आदि वर्णित हैं। ये मात्र संयुक्त समवेत संबंध हैं।*
*3. क्षीर-नीर का संबंध होने पर जब स्वलक्षणभूत दुग्धत्व गुण के द्वारा व्याप्त होने से, दूध जल से अधिक होने के कारण एक क्षेत्रावगाहरूप संयोग-संबंध हो जाता है।*
*4. दोनों में नैसर्गिक सम्बन्ध चला आ रहा है। ये दोनों परस्पर संबद्ध हैं, इसलिए इनमें अन्तः क्रिया होती है।*
*क्रमशः ……….. आगे की पोस्ट से जानने का प्रयास करेंगे जीव और कर्म के बंध पश्चात् परिणमन का स्वरूप के बारे में।*
*✒️लिखने में कुछ गलती हुई हो तो तस्स मिच्छामि दुक्कडं।*
विकास जैन।