*क्रमांक — 475* . *कर्म-दर्शन* 🚥🔹🚥🔹🚥🔹🚥 🔹🚥🔹🚥🔹🚥 *🔹जीव और कर्म के बंध पश्चात् परिणमन का स्वरूप* *7. कर्म का बंध कार्मण शरीर से — समयसार में सूक्ष्म दृष्टि से वर्णन करते हुए कहते हैं कि पहले बंधे हुए सभी कर्म, पृथ्वी के पिण्ड समान पुद्गल पिण्डवत् हैं और आत्मा कर्म और कर्मोदयज भाव से भिन्न है।* *पुढवी पिंडसमाणा पुव्वणिबद्धा दु पच्चया तस्स ।* *कम्मसरीरेण दु ते बद्धा सव्वेपि णाणिस्स ।।* *यहाँ इस कथन का तात्पर्य यह है कि पुद्गल का स्वभाव और जीव का स्वभाव भिन्न है। ये सजातीय नहीं हैं। विजातीय होने के कारण कर्मप्रकृतियाँ जीव से नहीं बल्कि कार्मण शरीर से ही एक होकर पृथ्वी पिण्डवत् बंधी हुई हैं। यह आचार्य कुन्दकुन्द ने समयसार में शुद्ध निश्चय नय से कहा है।* *उपरोक्त आगम वाणी एवं आचार्यों द्वारा प्राप्त समस्त उद्धरणों को पढ़कर हमें चार प्रकार के निरूपण प्राप्त होते हैं।* *1. प्रथमतः यह प्रत...
आज पर्वाधिराज पर्युषण के छठे दिन सभी जन अति उत्साह-उमंग से प्रवचन सभा में उपस्थित हुए। आज के विषय थे, “फूल और कांटे” एवं “प्याले में उबाल” । पूज्यनीय महासति प्रियंकाश्रीजी महाराज साहब ने अपने उद्बोधन में कहा कि जीवन को जीना हमारे हाथ में है । चाहे हम उसे फूलों की सुगंध से भरदें या कांटो का जाल पैदाकर खुद भी कष्ट झेलें ओर दूसरों को भी परेशानी में डालें । कभी कभी हम फूलों के मोहपाश में इतना जकड जाते हैं कि कुत्सित कांटों का ध्यान ही नहीं रहता । ईश्वर ने हमें बहुत दिया है, फूल भी तो कांटे भी । हमें अपना महत्व बनाए रखना है, हमारे कर्म सभी को सुख पहुंचाने वाले ओर हितकारी हों, मनभावन हो । पूज्यनीय महासती सरिताश्रीजी महाराज साहब ने “प्याले में उबाल” (क्रोधी स्वभाव) पर बडी अनुकरणीय समझाइश दी । क्रोध की अवस्था में हम अपना संतुलन खोकर दूसरों के साथ ही खुद का ज्याद...