आज पर्वाधिराज पर्युषण के छठे दिन सभी जन अति उत्साह-उमंग से प्रवचन सभा में उपस्थित हुए। आज के विषय थे, “फूल और कांटे” एवं “प्याले में उबाल” ।
पूज्यनीय महासति प्रियंकाश्रीजी महाराज साहब ने अपने उद्बोधन में कहा कि जीवन को जीना हमारे हाथ में है । चाहे हम उसे फूलों की सुगंध से भरदें या कांटो का जाल पैदाकर खुद भी कष्ट झेलें ओर दूसरों को भी परेशानी में डालें ।
कभी कभी हम फूलों के मोहपाश में इतना जकड जाते हैं कि कुत्सित कांटों का ध्यान ही नहीं रहता ।
ईश्वर ने हमें बहुत दिया है, फूल भी तो कांटे भी । हमें अपना महत्व बनाए रखना है, हमारे कर्म सभी को सुख पहुंचाने वाले ओर हितकारी हों, मनभावन हो ।
पूज्यनीय महासती सरिताश्रीजी महाराज साहब ने “प्याले में उबाल” (क्रोधी स्वभाव) पर बडी अनुकरणीय समझाइश दी । क्रोध की अवस्था में हम अपना संतुलन खोकर दूसरों के साथ ही खुद का ज्यादा नुकसान कर लेते हैं । मस्तिष्क में उपजे विकारों से ग्रस्त होकर शरीर को अशांत कर बैठते हैं । क्रोध संतापयुक्त विकलता की दशा है । हमें क्रोध जैसी नकारात्मक गतिविधियों से बचना है । दिमाग रूपी प्याले लें उठा तूफान, सुक्रत्यौं को तहस नहस कर देता है और जब शांत होकर हम फिर से विचार करते हैं तो हमें अपने किये पर पश्चाताप होता है और इस पश्चाताप को सही दिशा देकर हम अपने मन में उपजे विकारों पर चिंतन और आत्मावलोकन कर गलतियों के लिए क्षमाभाव ज्ञापित कर आत्मिक शांति पा सकते हैं । अपना हर दिन सुक्रत्य के लिये हो, उसमें वैमनस्य और क्रोध के लिए कोई स्थान न हो ।
सादर जय जिनेन्द्र