*क्रमांक — 474* . *कर्म-दर्शन* 🚥🔹🚥🔹🚥🔹🚥 🔹🚥🔹🚥🔹🚥 *🔹जीव और कर्म के बंध पश्चात् परिणमन का स्वरूप* *5. 5. अन्योन्य-अनुप्रवेश — पूज्यपाद के अनुसार आत्मा के प्रदेश और कर्म पुद्गल स्कन्धों का परस्पर अनुप्रवेश हो जाता है।* *6. नैसर्गिक सम्बन्ध — योगसार में अमितगति लिखते हैं कि न कर्म जीव के गुणों का घात करता है और न जीव कर्म के गुणों का घात करता है।* *न कर्म हन्ति जीवस्य न जीवः कर्मणो गुणान् ।* *वध्य-घातकभावोऽस्ति, नान्योऽन्यं जीवकर्मणोः ।।* *दोनों स्वतन्त्र हैं तथापि यह ध्यान में रखना है कि संसारी जीव स्वरूपतः चेतन होते हुए भी पुद्गल या शरीर से सर्वथा भिन्न नहीं है। इन दोनों में नैसर्गिक सम्बन्ध चला आ रहा है। ये दोनों परस्पर संबद्ध हैं, इसलिए इनमें अन्तः क्रिया होती है और एक-दूसरे को प्रभावित भी करते रहते हैं। लेकिन जीव एवं कर्म पुद्गल का आपस में वध्यघातक भाव नहीं है।* *क्रमशः ...
आज पर्वाधिराज पर्युषण का पंचम दिवस बडे उत्साह ओर उमंग से मनाया गया । गुरुभगवंतों का आज का विषय था “कर्म का सिद्धांत” ओर “महामंत्र नवकार का महात्म्य” । पूज्यनीय महासति प्रियंकाश्रीजी महाराज साहब ने कर्म बंध की विवेचना की । संसार में सुख-दुख, हानी लाभ, जीवन मरण, दरिद्रता संपन्नता, रुग्णता स्वास्थ्य, बुद्धिमत्ता अबुद्धिमत्ता, आदि आदि वैभिन्य स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं । इन सभी प्रकार के वैषम्य का मूल कारण कर्म ही है । कर्म से ही मनुष्य सुख-दुख पाता है । इसलिए कहा गया है कि अपने द्वारा किये गऐ कर्म का भुगतान स्वयं को ही जन्म जन्मांतर तक करना पडता है । जैन सिद्धांत के अनुसार बांधे गए कर्मो की निर्जरा तप-त्याग और आचरण की शुद्धता के द्वारा, कुछ हद तक उनसे मुक्ति भी पा सकते हैं । महामंत्र नवकार का महात्म्य बताते हुए पूज्यनीय महासती सरिताश्रीजी महाराज साहब ने फरमाया कि जैन...