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विनय ही धर्म का मुल है

प्रणाम मे अनुशासन। वात्सल्य, विनय की भावना होती है! प्रणाम करने से परिणाम अच्छे होते है! विनय ही धर्म का मुल है! “ ज्यों नमे ते सबसे हमें! ज्यों जगाये निष्टा उसकी बढ़ती है प्रतिष्ठा !साध्वी जिनाज्ञा श्री जी। शील की चुंदड सदाचार का महासागर है ! शाश्वत सुखोको प्राप्त करानेवाली है! शास्वत सुखोको प्राप्त करनेके लिए मनुष्य चारित्रवान होना चाहिए! – डॉ. राज श्री जी म.सा. आकुर्डी- निगडी- प्राधिकरण श्री संघ के प्रांगण मे चातुर्मासार्थ विराजीत महासाध्वी डॉ. राजश्री जी म.सा. आदि ठाणा 4 के निश्रा मे पर्वाधिराज पर्युषण पर्वका धर्मअनुरागीयों ने बडे उल्हास एवं उमंग के साथ सामुहिक प्रार्थना, अखंड 8 दिवसीय 24 घंटे का “नवकार महामंत्र” जाप, प्रवचन , तप आराधना आदिके माँध्यमसे स्वागत हो रहा है !आजका प्रवचन का विषय था “ चरित्रवान होता है महान”. आज के कार्यक्रम मे पुना के प्रसिध्द उद्योजक भामाशा श्रीमान रम...

वाणी संयम करने से होता शक्ति का सवर्धन: साध्वी डॉ गवेषणाश्री

Sagevaani.com /माधावरम्: भाग्य से मनुष्य के पास 3 शक्तियां है- मन, वचन और काय। इनका उपयोग कैसे करें, क्यों करें, यह विवेक पर निर्भर है। कम बोलने, मधुर-मीठा बोलने, वाणी संयम करने से शक्ति का सवर्धन होता है। ज्यादा बोलने वाला लघुता को प्राप्त करता है। इसीलिए पायल स्त्रियों के पैरों में पहना जाता है और हार गले में। मधुर स्वरों के कारण शत्रु भी अर्थात् विभीषण भी राम का बन गया और कटु वचन के कारण रावण ने अपने भाई को खो दिया। उपरोक्त विचार अष्टदिवसीय पर्यूषण महापर्व साधना शिविर के चौथे दिवस वाणी संयम का महत्व बताते हुए डा. साध्वी श्री गवेषणाश्रीजी ने आचार्य महाश्रमण तेरापंथ जैन पब्लिक स्कूल के प्रांगण में साधकों को प्रेरणा देते हुए कहे।  साध्वीश्रीजी ने आगे कहा कि भगवान महावीर ने मौन को तप माना है। भगवान महावीर का जीवन दर्शन ऊर्जा से संपन्न और जीवन बोध देनेवाला है।  साध्वी श्री मयंकप्रभाजी ने कहा...

महावीर की महिमा का गुणगान किया

आज पर्वाधिराज पर्युषण का चौथे दिन भगवान महावीर का जन्मोत्सव बडी धूमधाम से मनाया गया। पूज्यनीय गुरुभगवंतों ने जन्म वाचन का महत्व ओर भगवान महावीर की महिमा का गुणगान किया। प्रवचन का आज का विषय था ” भावना का महत्व” और ” घर एक मंदिर” पर प्रकाश डाला। पूज्यनीय महासती प्रियंकाजी महाराज साहब ने भावना का विवेचन कर कहा कि भावना ही पुन्य पाप, राग वैराग्य, सांसारिक जीवन एवं मोक्ष, आदि का कारण है, अतः हमें हमारी भावना की शुद्धता को परखते रहकर, सदा कुत्सित भावनाओ का त्याग एवं उत्तम भावना भानी चाहिए । पूज्यनीय महासती सरिताश्रीजी महाराज साहब ने घर को मंदिर बनाने की प्रेरणा देते हुए कहा कि घर केवल इंट पत्थर का घरौंदा नहीं, बल्कि खुशियां, सामर्थ्य, एकता, उच्च संस्कार और अच्छी भावनाओ से परिपूर्ण होना चाहिए। परस्पर विश्वास, सहयोग, सामंजस्य, शुद्ध विचार से सराबोर हो । घर के वरिष्ठ जनों क...

विगई की प्रकृत्ति विकार में परिवर्तित होना हैं,

*🌧️विंशत्यधिकं शतम्* *📚📚📚श्रुतप्रसादम्🌧️* 🌧️ 4️⃣6️⃣ 🪔 छह विगई १) दूध, २) दही, ३) घी ४) तेल, ५) गोल, ६) कड़ा विगई(मिठाई) ⚡ विगई की प्रकृत्ति विकार में परिवर्तित होना हैं, 📌 उसके भक्षण से मोह का उदय होता हैं.! 📌 मोह के उदय से आत्म हित चिंतक पुरुषार्थवंत साधक भी दुष्कर्म के प्रवृत्त हो जाते है.! 🛑 *देह स्वस्थ,निरोगी* *मजबूत होते हुए भी* *स्वाद आसक्ति के कारण* *जो विगई भक्षण करता है* *उसके लिये ये निषेध कहा है.!* ✅ देह कमजोर हो तो, रोग उपचार चलता हो तो, विशिष्ट दीर्घ तप चलता हो तो, शास्त्रों में गुरु/वडिल की आज्ञा से उचित मात्रा में विगई वापरने का विधान है.! 🔴 निष्कारण विगई वापरने से परिणाम विकृत बनते है, विगई की विकृत्ति से बचने उपरोक्त कारण के सिवा विगई नही वापरनी चाहिए.! *📘श्री पंचवस्तुक ग्रंथ📘* 🌷 *तत्त्वचिंतन:* *मार्गस्थ कृपानिधि* *सूरि जयन्तसेन चरण रज* मुनि श्रीवैभवरत्नविजयजी म.सा. *🦚श्रु...

मां को दे देवत्व का स्थान देने वाली एकमात्र संस्कृति भारतीय संस्कृति है

परम पूज्य धैर्योश्रीजी म सा ने अंतगढ़ सूत्र का वाचन किया अरिस्टनेंमी भगवान के शासन के चरित्र आत्माओं का वर्णन कियाl देवकी महारानी इनके पुत्र के विलाप का रोचक घटना के माध्यम से आंखों के सामने दृश्य खड़ा कर दिया मां क्या होती हैl उसकी ममता को कोई नाप नहीं सकता मां तेरा जवाब नहीं तेरा साया ही मेरा उजाला हैl मां को दे देवत्व का स्थान देने वाली एकमात्र संस्कृति भारतीय संस्कृति हैl आज इस धरती को श्रवण कुमार की जरूरत है जिस घर में मां की सेवा होती है वही घर स्वर्ग होता हैl शासन में दो की महिमा गई है एक जननी दूसरी जन्म भूमि कहां भी है जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी। इसी विषय को लेकर सातवीं आगम श्री जी महाराज साहब ने मां की ममता के बारे में बताया जननी और जन्मभूमि इन दोनों से विराट विशाल कोई भी नहीं है साधना का पहला चरण माता-पिता की सेवा करना पर आज घर-घर में मां के हालात क्या है और मां की और आंख...

जीव और कर्म के बंध पश्चात् परिणमन का स्वरूप

*क्रमांक — 472* . *कर्म-दर्शन* 🚥🔹🚥🔹🚥🔹🚥 🔹🚥🔹🚥🔹🚥 *🔹जीव और कर्म के बंध पश्चात् परिणमन का स्वरूप* *👉 आगम ग्रंथों एवं परवर्ती विभिन्न आचार्यों द्वारा जीव और कर्म के बंध काल में, दोनों के विशिष्ट प्रकार के परिणमन को भिन्न-भिन्न उपमाओं से उपमित किया गया है।* *1. आवेष्टन – परिवेष्टन — भगवती में भगवान् महावीर कहते हैं कि जीव के एक प्रदेश को ज्ञानावरणीय आदि कर्म समूह के अनन्त-अनन्त अविभाग-प्रतिच्छेद आवृत्त करते हैं। आत्मप्रदेश के ढक्कन स्वरूप बन कर ये कर्म उसे चारों ओर से लपेटते हुए घेर लेते हैं। उत्तराध्ययन की शान्त्याचार्य वृत्ति में लिखा है कि एक-एक आत्मप्रदेश अनन्तानन्त कर्म पुगलों से आवेष्टित-परिवेष्टित हैं।* *2. जल में छिद्रित-नौकावत् — जल में अनेकानेक छिद्रों वाली नौका जब उन आश्रवद्वारों के द्वारा जल से परिपूर्ण भरती हुई जल-जलाकार हो जाती है, अर्थात् नौका जलमय हो जाती ह...

विशिष्ट ज्ञान से पाप विरक्ति

*🌧️विंशत्यधिकं शतम्* *📚📚📚श्रुतप्रसादम्🌧️* 🌧️ 4️⃣5️⃣ 🪔 सत्संग से धर्म श्रवण.. धर्म श्रवण से तत्त्वज्ञान.. तत्त्वज्ञान से विशिष्ट ज्ञान.. विशिष्ट ज्ञान से पाप विरक्ति.. ⚪ पाप विरक्ति से संयम.. संयम से आश्रव का संवर.. ⚪ संवर से तप तप से कर्म निर्जरा निर्जरासे कर्मरहित स्थिति निष्कर्मी अवस्था से मोक्षप्रप्ति.. 💐 अतः सत्संग ही सर्व कल्याण का सर्व रिद्धि सिद्धि का सर्व साधना आराधना का शाश्वत परमानंद का मूल हैं.! *📚श्री भगवतीजी आगम📚* 🌷 *तत्त्वचिंतन:* *मार्गस्थ कृपानिधि* *सूरि जयन्तसेन चरण रज* मुनि श्रीवैभवरत्नविजयजी म.सा. *🦚श्रुतार्थ वर्षावास 2024🦚* श्रीमुनिसुव्रतस्वामी नवग्रह जैनसंघ @ कोंडीतोप, चेन्नई महानगर

पर्युषण पर्वों के तीसरे दिन

आज परम श्रद्धेय उप प्रवर्तक पूज्य गुरुदेव श्री पीयूष मुनि जी महाराज आदि ठाणा एवं प्रतिभा पुंज गुरूणी श्री अनीता जी महाराज आदि ठाणा के पावन सान्निध्य में पर्युषण पर्वों के तीसरे दिन प्रवचन श्रवण करते हुए श्रावक श्राविकाएं। आज सुश्रावक श्री सतीश कुमार जैन कसूर वालों का व्रतों की अठाई तप करने पर श्री संघ जालंधर द्वारा तपाभिनंदन करते हुए एस एस जैन सभा रजि जालंधर प्रधान श्री सतपाल जैन, पूर्व प्रधान श्री विमल प्रकाश जैन, महामंत्री श्री उष्ण जैन, मंत्री मुस्कान जैन, धार्मिक कमेटी चेयरमैन श्री अमित जैन, हस्पताल कमेटी चेयरमैन श्री नरेंद्र जैन। सभी तपस्वियों का हार्दिक सुख साता पूछते हुए उनके तप का अनुमोदन करते हैं।

जीने की कला का नाम ही जीवन है: साध्वी डॉ चन्द्र प्रभा जी

वीरपत्ता की पावन भूमि आमेट के जैन स्थानक मे पर्व पर्युषण के तीसरे दिन साध्वी डॉ चन्द्र प्रभा जी म. सा ने कहा जीवन को कैसे जिया जाएl जीने की कला का नाम ही जीवन है। एक ऐसी कला जिसमें सौंदर्य हो, शांति हो, सत्य हो, शिवत्व हो- कला मनोभावों की मार्मिक अभिव्यक्ति होती है। हम कला को न जीवन से विलग कर सकते है और न उसको जीवन के शाश्वत मूल्यों से निरपेक्ष ही कर सकते हैजीवन बड़ा अमूल्य है। इसमें संसार का सौंदर्य भरा हुआ है, पर उसका आनंद तभी मिल सकता है जब जीवन जीने की कला को समझें। अध्यात्म जीवन जीने की कला सिखाता है, यह एक दिव्य विधा है। यह मनुष्य को हर दुख, कष्ट, विपत्ति और चिंता से छुटकारा दिलाकर आनंद से सराबोर करता है। भारत भूमि के समृद्ध होने में ही भारतवासियों की भी सुख-शांति है, क्योंकि जिस व्यक्ति के माता-पिता दुखी हों उसका जीवन सुखी कैसे हो सकता है। मां-पिता के आशीर्वाद और उनकी दुआओं से ही ज...

आत्मा की शुद्धि का पर्व है पर्युषण: धर्मवीर जैन

Sagevaani.com /रायकोट (भल्ला) एस एस जैन सभा रायकोट के प्रमुख मार्ग दर्शक धर्मवीर जैन ने कहा कि आत्मा की शुद्धि का पर्व है पर्युषण। सम्पूर्ण जैन जगत मे यह आठ दिन का पर्व विशेष महत्व रखता है।यह पर्व हमे प्रेरणा देता है कि अपनी आत्मा मे रह रहे विकारो को दुर कर आत्म शुद्धि करे। उन्होंने कहा कि जगह-जगह साधु साध्वीया की कृपा से इन दिनो धर्म की प्रभावण विशेष रूप से होती है। यह पर्व हमे संदेशा देता है कि हम सोचे हम कहा से आए है,और हमारा क्या लक्ष्य है। हम स्वय अपने बारे मे सोचे।हर व्यक्ति जितना दुसरो के बारे मे जानने की कोशिश करता है अपने बारे मे नही जो अपने भीतर झाँककर अपने अवगुण दुर करेगा तभी महान बन सकता है,तो आये हम भी अपने बारे मे चिंतन करे। धर्मवीर जैन ने कहा कि जप तप द्वारा इन पर्व का लाभ ले। उन बुराईयो को छोडे जिनसे हमारी आत्मा का अहित होता है। इससे ही मैत्री भाव बनेगा पर्युषण की मधुर बेला...

समता, सहिष्णुता को चरम शिखर तक पहुँचायें- वह सामायिक : साध्वी डॉ गवेषणाश्री

Sagevaani.com /माधावरम्: युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण की विदुषी सुशिष्या साध्वी श्री डॉ गवेषणाश्रीजी के सान्निध्य में अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद के तत्वावधान में तेयुप चेन्नई द्वारा ‘अभिनव सामायिक’ कार्यक्रम आचार्य महाश्रमण तेरापंथ जैन पब्लिक स्कूल, माधावरम्, चेन्नई में आयोजन हुआ।  डॉ साध्वी गवेषणाश्रीजी ने कहा कि समता एक मौलिक तथ्य है, इसका प्रतिपक्षी है ममता। समता और ममता दो शब्दों से सारा संसार बंधा हुआ है। सारी समस्याएं और समाधान इसके साथ जुडे हुए है। जिसमें समता का विकास हो, सहिष्णुता चरम शिखर तक पहुंचे, वहीं सामायिक है। सामायिक प्रदर्शन नहीं आत्मदर्शन है, अभिव्यक्ति नहीं अनुभूति है।  सामायिक का महत्व बताते हुए डॉ साध्वी गवेषणाश्रीजी ने कहा कि भगवान महावीर समता के साधक थे। उन्होंने सिर्फ सिद्धांत दिये ही नहीं, अपितु उसको अपने जीवन में भी अपनायें। अनेकों संघर्ष और ताप...

तपस्या जीवन की सारी समस्या दुर कर देती है

तपस्या जीवन की सारी समस्या दुर कर देती है ! मोक्ष मार्ग की सफ़र मोक्ष यान में करनी चाहिए! दान, धर्म, तप आराधना कर पाप कर्म का बोझ हल्का करना चाहिये! तपके तोरण सजाने चाहिए! तपस्या रुपी चाबीसे मुक्ति के / मोक्ष के द्वार खुल सकते है – डॉ. राज श्री जी। T- Tempreture – क्रोध को ख़त्म करना है! Tolerance- स्थिरता आना चाहिए! A- Ability योग्यता / क्षमता। Alert – सावधानी बरतनी है! P- purity पवित्रता/ उज्वलता। . Politeness-विनम्रता A- Activness कार्यतप्तरता Acceptance- स्वीकार S- Self Cintrol- आत्म नियंत्रण। Sacrifice- त्याग Y- Yes – स्विक्रुति A-Angerless क्रोध विरहीत Achievement- प्राप्ति( मुक्ति की प्राप्ति करना)। डॉ. मेघाश्री जी। कर्म निर्जरा के लिए तप होना ज़रूरी है! त्याग तपस्या करो भाव मनमे धरो – साध्वी ज़िनाज्ञाश्री –  आकुर्डी- निगडी- प्राधिकरण श्री संघ के ...

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