हमारे भाईन्दर में विराजीत उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया आदि ठाणा 7 साता पूर्वक विराजमान हैl वह रोज हमें प्रवचन के माध्यम से नित नयी वाणी सुनाते हैं, वह इस प्रकार हैंl बंधुओं जैसे कि आज मैं आपको आत्म चिंतन के लिए कुछ सूत्र दूंगा अपनी कमजोरी को पहचानने के लिए जीवन तो बंधन मुक्ति के लिए पाया था पर अब तक जीवन में कितने नए कर्म को बंद चुके हो क्या कोई सूची हैl दलदल से उभरने के लिए आए थे पर गए होते जा रहे हो और इस सत्य को सदा ख्याल में रखना कि अगर ऐसे जीवन जीते रहे तो डाल-डाल से ऊपर तो नहीं उठ पाओगेl एक दो पाव भीतर ही जाओगे मैं तो कहता हूं कि तुम संसार में रहो पति-पत्नी परिवार व्यवसाय में रहो लेकिन तुम्हारे विचार तुम्हारी भावना तुम्हारा चीज मां यह सब संसार के दलदल में नहीं रहने चाहिएl तुम्हारा मन यदि दलदल में चला गया और तुमने भलेही विवाह न किया हो धन दौलत भी ना हो तब भी ...
श्री सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन श्वेतांबर मूर्तिपूजक जैन संघ में प्रवचन देते हुए आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने कहा कि मानव का शरीर एक खेत के समान है, इसमें वह जैसा बीज बोता है, वैसी ही फसल काटता है; अर्थात् मनुष्य को जिस प्रकार की फसल की इच्छा हो, उसे उसमें वैसा ही बीज बोना चाहिए। अगर हम मानसिक दृष्टि से संसार को देखें तो हमें पता चलेगा कि कुछ लोग अच्छे बीज बोते हैं, तो कुछ लोग सड़े-गले रद्दी बीज बो देते हैं और कुछ लोग तो ऐसे हैं जो दोनों ही तरह के मिले-जुले बीज बो देते हैं। अच्छे बीज का आशय अच्छे कर्म अर्थात् पुण्य कर्म से है, सड़े-गले बीज का आशय पाप कर्म अर्थात् गन्दे कर्मों से है एवं कुछ अच्छे व कुछ बुरे अर्थात् कुछ तो पुण्य कर्म और कुछ पाप कर्म मिश्रित बीज हैं; अर्थात् मनुष्य अगर अच्छे कर्म करेगा तो वह अच्छा फल पायेगा और यदि वह बुरे कर्म करेगा तो बुरा फल पायेगा।उन्होंने आगे कहा कि जहाँ त...
Sagevaani.com @रायपुर। उपाध्याय प्रवर ने कहा कि आपके मन में सवाल आता है कि क्यों धर्म की राह पर चलने वाले को संकट का सामना करना पड़ता है? लेकिन ऐसा नहीं है कि सभी धर्म की राह पर चलने वालों को संकट झेलना पड़ता है। कई धार्मिक व्यक्ति होते हैं जिनको संकट का सामना करना ही नहीं पड़ता है। कई बार धारणा बनती है कि जो धर्म की राह पर चलता है उसे संकट झेलना ही पड़ता है। कई धर्मात्मा हैं जिनके काम सहजता से हो जाते हैं। और कई नास्तिक, जो धर्म को नहीं मानते हैं, उनके जीवन में भी संकट आते हैं। ऐसा कोई नियम नहीं है। लेकिन धर्म-अधर्म के आधार पर आप इसे आधार नहीं दे सकते। एक धार्मिक व्यक्ति की लेश्या भी कृष्ण लेश्या हो सकती है, और एक अधर्मी की लेश्या शुक्ल लेश्या हो सकती है। जीवन की समस्याओं का स्रोत लेश्या पर है। इसलिए लेश्या का गणित समझना जरुरी है। उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि रविवार को लालगंगा पटवा भवन में लेश्य...
आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने श्री सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन जैन संघ में प्रवचन के माध्यम से लोगों को संबोधित किया, उन्होंने कहा कि कर्म तो हम अपनी इच्छा के अनुसार कर सकते हैं, पर अपने कर्मों का फल भोगने के लिए हम विवश होते हैं। अगर हम बबूल के बीज बोएँगे, तो बबूल के काँटे ही हमारे हाथ लगेंगे। बबूल का पेड़ लगाकर, हम आम के मीठे फल खाने की इच्छा करें, तो वह कभी पूरी नहीं होगी। लोग जानते हैं कि किस काम का अच्छा फल मिलेगा और किसका बुरा। इसलिए हमें हमेशा ऐसे काम करने चाहिए, जिनके परिणाम अच्छे हों, जिससे हमें सुख और संतोष मिले। ऐसे काम से सदा दूर रहना चाहिए, जिसका नतीजा बुरा हो और चिंता तथा कष्ट बढ़ाने वाला हो। दुर्योधन अच्छी तरह जानता था कि पांडवों के साथ वह जो छल-कपट कर रहा है, उसका परिणाम बहुत बुरा होगा। गुरुजनों के समझाने-बुझाने का भी उस पर कोई असर नहीं हुआ। अंत में उसके दुष्ट कार्यों के फलस्व...
पर्युषण एवं वार्षिक कर्तव्य के तहत चैत्यपरिपाटी व विशाल सामूहिक रथयात्रा का हुआ आयोजन गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सुरीश्वरजी एवं आचार्यश्री युगोदयप्रभ सूरीश्वरजी म.सा. की निश्रा में चेन्नई महानगर में पहली बार 16 जैन संघों के संयुक्त तत्वावधान में रविवार को पर्युषण एवं वार्षिक कर्तव्य के तहत विशाल सामूहिक चैत्यपरिपाटी एवं रथयात्रा का आयोजन हुआ। रथयात्रा किलपाॅक स्थित नेमिनाथ ब्रीज जैन संघ से रवाना होकर रंगनाथन एवेन्यू स्थित मुनिसुव्रत स्वामी जिनालय पहुंची, जहां धर्मसभा का आयोजन हुआ। इससे पूर्व सभी 16 संघ चैत्यपरिपाटी करते हुए नेमीनाथ ब्रीज जैन संघ के प्रांगण में पहुंचे। आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी भी चतुर्विध संघ के साथ किलपाॅक मुनिसुव्रतस्वामी जिनालय से रवाना होकर अरिहंत वैकुंठ, नमिनाथ जिनालय, देवदर्शन अपार्टमेंट महावीर जिनालय आदि दर्शन, चैत्यवंदन कर नेमिनाथ ब्रीज जैन संघ पहुंचे। रथयात...
Sagevaani.com @शिवपुरी ब्यूरो। दु:ख अपना हो तो दूर किया जा सकता है, लेकिन उस दु:ख का क्या करें जो दूसरों के सुख से उत्पन्न होता है। इंसान अपने दु:ख से कम दूसरों के सुख से अधिक दुखित होता है, लेकिन जो दूसरों के दु:ख से दुखित होता है वह करूणावान होता है। जबकि ईष्यावान दूसरों के सुख से दूखी होता है उक्त प्रेरणास्पद उदगार प्रसिद्ध जैन साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने स्थानीय कमला भवन में आयोजित विशाल धर्मर्सभा में व्यक्त किए। धर्मर्सभा में साध्वी वंदनाश्री जी ने बरसा-बरसा सुख बरसा आंगन-आंगन सुख बरसा भजन का सुमधुर स्वर में गायन कर वातावरण को आध्यात्मिकता से परिपूरित कर दिया। साध्वी पूनम श्री जी ने अपने प्रवचन में कर्म का मर्म समझाया और कहा कि प्रत्येक व्यक्ति अपने साथ अपने कर्म लेकर जाता है। साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने आज अपने प्रवचन में उन पुण्यों की चर्चा की जिन्हें करने के लिए धन खर्च करने की आवश...
हमारे भाईन्दर में विराजीत उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया आदि ठाणा 7 साता पूर्वक विराजमान हैl वह रोज हमें प्रवचन के माध्यम से नित नयी वाणी सुनाते हैं, वह इस प्रकार हैंl बंधुओं जैसे कि प्रणाम का अच्छा परिणाम याद रखिए अपने और से दूसरों के प्रति विनृमहोना उनको भी अपने प्रति विनम्र में होने का रास्ता खोलना हैl बड़े बुजुर्ग हो तो भाव चाहे बराबर का है तो हाथ मिला ले अपरिचित है तो दूर से ही सही खड़े-खड़े हाथ जोड़ लेl अगर बड़े बुजुर्ग हैं तो पाव छुकर बाद में बात कीजिएगा इसमें शर्म मत रखिएगाl आजकल लोगों को वहां झुक कर प्रणाम करने में शर्म आती हैl जाती आपकी कोई भी हो गोत्र आपका कोई भी हो लेकिन भीतर से सारे लोग शर्मा जी बन गए हैंl सब शर्माते हैं बड़ों के पास में काहे की शर्म भाई गुटखा खाते समय शर्म नहीं आतीl उल्टे सीधे काम करने समय शर्म नहीं आती और बड़ों के पास होते हैं समय आपक...
श्री सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन श्वेतांबर मूर्तिपूजक जैन संघ में आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने प्रवचन देते हुए कहा कि हर व्यक्ति को किसी न किसी चीज से डर जरूर लगता है. कई बार ये डर होता है फेल होने के डर. हम में से कई लोग ऐसे होते हैं जिन्हें किसी भी कार्य में फेल होने का डर सताता है. ऐसा डर होना स्वभाविक होता है. लेकिन कभी-कभी ये डर आपके ऊपर इतना हावी हो जाता है कि आप किसी काम को करना ही पसंद नहीं करते. आप फेल होने के डर से वो काम करते ही नहीं है. इससे हम कहीं न कहीं, कई ऐसे अवसरों को छोड़ देते हैं, जो हमारे लिए बहुत उपयोगी साबित हो सकते हैं. अगर आप चाहते हैं कि आप अपने फेल होने के डर से बाहर निकलें तो सबसे जरूरी है कि आप अपने आपको ये समझाएं कि किसी भी कार्य में फेल होना, आपको कुछ नया सीखने का मौका देता है. फेल होने के कुछ नया सीखने के अवसर के रूप में देखें. एक बार जब आप ये समझ लेंगे तो आपक...
जैन धर्म इसलिए पिछड रहा है क्योंकि भगवान महावीर के कथन को उनके अनुुयायियों ने अपने आचरण मेें नहीं उतारा। साध्बी पूनम श्रीजी ने बताया कि भगवान ने दिया था एकता का संदेश और हम श्वेताम्बर, दिगम्बर, तेरापंथी, पोरवाल, ओसवाल के नाम पर एक दूसरे से लड रहे हैं। शिवपुरी। भगवान महावीर की जय जयकार करने वालों ने उनके आचरण, उपदेशों, और संदेशों को अपने जीवन में नहीं उतारा। उन्होंने भगवान को तो माना लेकिन उनकी नहीं मानी। भगवान महावीर ने एकता का संदेश दिया लेकिन हम उनके संदेश की भावना को समझने में भूल कर गये। कभी अपने-अपने गुरु, कभी अपने-अपने संप्रदाय और कभी अपनेे-अपने गच्छ के नाम पर एक दूसरे से लडने और झगडने लगेे। इसी कारण से जैन धर्म पिछडा है औेर लगातार पिछडता जा रहा है। उक्त हृदय स्पर्शी उदगार तपस्वी रत्न साध्बी पूनम श्रीजी ने कमला भवन मेें आयोजित विशाल धर्म सभा में व्यक्त किए। साध्बी नूतन प्रभा श्रीजी न...
जब गरीब परिवारों के बच्चों के चेहरे पर मुस्कान आए और हमारा मन प्रफुल्लित हो उठे तो इससे बढ़कर कोई खुशी नहीं होती। ऐसी खुशी की अनुभूति करना अपनेआप में एक मिसाल है। राजस्थान कॉस्मो क्लब (आरसीसी) फाउंडेशन द्वारा संचालित स्माइल स्टोर की नुंगम्बाक्कम् शाखा में शहर से 100 किलोमीटर दूर, जहां बच्चे अभावों का जीवन व्यतीत करते हैं, उन बच्चों ने शहर में आकर स्माइल स्टोर से खरीददारी के अनुभव का अहसास किया और उनके चेहरों पर मुस्कान देखने लायक थी। आरसीसी फाउंडेशन के सचिव राहुल बोहरा ने बताया कि कुछ दिनों पूर्व चैंगलपट्टू जिले के दूरदराज कप्पाटु कुंद्रम गांव से ईरूलर कम्युनिटी के 108 बच्चों को चेन्नई में लाकर उन्हें स्माइल स्टोर में खरीददारी का अनुभव कराया। ये बच्चे चट्टानों और पेड़ों से गिरे क्षेत्र में निवास करते हैं। उस क्षेत्र में कई गांव बिजली से वंचित है। 20 और 40 रुपए में पांच-पांच कपड़े खरीदकर बच...
किलपाॅक श्वेताम्बर मूर्तिपूजक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्य केशरसूरी समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी ने प्रवचन में कहा कि जब व्यक्ति योग की साधना करता हैं, तब वह तरोताजा महसूस करता है। योग की साधना द्वारा व्यक्ति की शक्ति का विकास होता है। इसलिए ज्ञानी कहते हैं योग की साधना करने वाला 84 करोड़ पूर्व वर्ष तक साधना करे, तो भी थकान नहीं होती। भोगवाद में संसारी व्यक्ति का अंतिम छोर अवश्य होता है, वह अनेकविध भोग उपभोग के बाद थकान महसूस करता ही है, भोग और योग में यही फर्क है। योग साधना से शरीर में स्फूर्ति, आत्मा के अंदर कर्मों के क्षय की प्रक्रिया और छःकाय जीवों की रक्षा का कार्य शुरू हो जाता है। भोग के अंदर शुरू में पूर्णिमा जैसी अनुभूति होती है और आगे जाकर अमावस्या के जैसी परिस्थिति होने लगती है। उन्होंने कहा दुःख से डरना कायरता है। जो सुख दुःखों के आधार पर बनत...
नवकार कलश अनुष्ठान से जुड़ रहे विदेश में बसे जैन परिवार Sagevaani.com @रायपुर। धर्मसभा को संबोधित करते हुए उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि ने कहा कि लेश्या शब्द कई लोगों ने सुना है, लेकिन बहुत कम लोगों ने इसे समझा है। कई लोग इसे औरा (aura) कहते हैं, लेकिन दोनों में बहुत अंतर है। औरा (aura) रंग है, लेकिन लेश्या गंध है, रंग है, भाव है, स्पर्श है और रस भी है। आप किसी की औरा बदल नहीं सकते हैं, लेकिन लेश्या बदल सकते हैं। कषाय और योग से जब आत्मा रंग जाती है, तब उसके मन, वचन और काया से जो बाहर जाता है, और जो अंदर आता है, ये दोनों काम लेश्या में चलते हैं। कषाय और योग आत्मा का स्वाभाव नहीं है, लेकिन आत्मा का जो ज्ञान है, श्रद्धा, भावना, चरित्र हैं, इन तीनो के आधार पर कषाय के योग बनते हैं। लेश्या तरंग भी है और कण भी है। उक्ताशय की जानकारी रायपुर श्रमण संघ के अध्यक्ष ललित पटवा ने दी। शनिवार को प्रवीण ऋषि ने...