श्री सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन श्वेतांबर मूर्तिपूजक जैन संघ में आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने प्रवचन देते हुए कहा कि हर व्यक्ति को किसी न किसी चीज से डर जरूर लगता है. कई बार ये डर होता है फेल होने के डर. हम में से कई लोग ऐसे होते हैं जिन्हें किसी भी कार्य में फेल होने का डर सताता है.
ऐसा डर होना स्वभाविक होता है. लेकिन कभी-कभी ये डर आपके ऊपर इतना हावी हो जाता है कि आप किसी काम को करना ही पसंद नहीं करते. आप फेल होने के डर से वो काम करते ही नहीं है. इससे हम कहीं न कहीं, कई ऐसे अवसरों को छोड़ देते हैं, जो हमारे लिए बहुत उपयोगी साबित हो सकते हैं. अगर आप चाहते हैं कि आप अपने फेल होने के डर से बाहर निकलें तो सबसे जरूरी है कि आप अपने आपको ये समझाएं कि किसी भी कार्य में फेल होना, आपको कुछ नया सीखने का मौका देता है. फेल होने के कुछ नया सीखने के अवसर के रूप में देखें. एक बार जब आप ये समझ लेंगे तो आपको फेल होने से डर कम लगेगा. कई बार जब किसी काम का रिजल्ट हमारे मनमुताबिक नहीं आता है तो हम इतने निराश हो जाते हैं कि उस काम को दोबारा करने का विचार भी अपने मन में नहीं लाते. यह एक बड़ी वजह है कि हमारे मन में फेल होने का डर बढ़ता जाता है. लेकिन इस डर से बाहर निकलने के लिए आपको अपनी अप्रोच को चेंज करना पड़ेगा.
अगर आपको किसी काम में असफलता मिलती है तो उस काम को दोबारा नहीं करने का मन बनाने की बजाय आपको ये सोचना चाहिए कि आप कैसे इस काम को दोबारा कर सकते हैं कि आप इसमें सफल हों. ऐसा करने से धीरे-धीरे आपके मन से फेल होने का डर निकलता जाएगा. अंत में आचार्य श्री ने कहा कि फेल होने के बाद हम सबसे पहले जो करते हैं, वो है खुद को दोष देना. फेल होने के डर को खत्म करने के लिए आपको सबसे पहले काम में असफल होने के लिए खुद को दोष देना बंद करना होगा. खुद को दोष देने की बजाय अगर आप उन कारणों के बारे में सोचेंगे, जिसकी वजह से आपको असफलता मिली है तो आप उस काम को बेहतर तरीके से करने का मन बना पाएंगे और उसमें सफलता जरूर पाएंगे.