किलपाॅक श्वेताम्बर मूर्तिपूजक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्य केशरसूरी समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी ने प्रवचन में कहा कि जब व्यक्ति योग की साधना करता हैं, तब वह तरोताजा महसूस करता है। योग की साधना द्वारा व्यक्ति की शक्ति का विकास होता है। इसलिए ज्ञानी कहते हैं योग की साधना करने वाला 84 करोड़ पूर्व वर्ष तक साधना करे, तो भी थकान नहीं होती। भोगवाद में संसारी व्यक्ति का अंतिम छोर अवश्य होता है, वह अनेकविध भोग उपभोग के बाद थकान महसूस करता ही है, भोग और योग में यही फर्क है। योग साधना से शरीर में स्फूर्ति, आत्मा के अंदर कर्मों के क्षय की प्रक्रिया और छःकाय जीवों की रक्षा का कार्य शुरू हो जाता है।
भोग के अंदर शुरू में पूर्णिमा जैसी अनुभूति होती है और आगे जाकर अमावस्या के जैसी परिस्थिति होने लगती है। उन्होंने कहा दुःख से डरना कायरता है। जो सुख दुःखों के आधार पर बनते हैं और जो सुख दुःख में परिवर्तित होते हैं, यदि डरना ही है तो उन सुखों से डरें। उन्होंने कहा जो फूल दुर्गंधी पदार्थ पर रहे हुए हैं, वे वास्तव में फूल नहीं है। वैसे ही जो सुख दुःख की ओर ले जाए, वह सुख नहीं है। भोग उपभोग में थकान, श्रम, तनाव होता ही है, वहीं, योग से चित्त में जो प्रसन्नता होती है, वह प्रफुल्लित कर देती है।
उन्होंने कहा कोई प्रभु का वचन आगम के बिना का नहीं होता, कोई क्रिया योग से बाहर नहीं होती, प्रवचन देने में भी योग छुपा हुआ होता है, कोई भाव मैत्री से बाहर नहीं होता, जयणा बिना कोई धर्म नहीं होता, कोई भी श्रमण महाव्रत के बिना का नहीं होता।
उन्होंने कहा गलत चीजों का सही उपयोग करोगे तो समकिती कहलाओगे, वहीं सही चीजों का गलत प्रयोग करोगे तो मिथ्यात्वी कहलाओगे। जगत में कोई वस्तु खराब नहीं है, इसका इस्तेमाल किस प्रकार करते हैं, वह महत्वपूर्ण है। परमात्मा की मैत्री, क्षमा, करुणा और प्रमोद गुण की ऊर्जा ही थी कि उन्होंने चंडकौशिक को अंतर्मुहूर्त में तार दिया। हमें चिंतन जरूर करना चाहिए, चिंतन बिना तत्व नहीं मिल सकता। अपने दुःखों का निवारण करना कर्तव्य हो सकता है जबकि दूसरों के दुःखों का निवारण करना करुणा भाव है। हमारे पास जब दुःख आते हैं, तभी यह पता चलता है कि दूसरों का दुःख क्या होगा? परमात्मा को उनके गुणों के दर्शन से पूजा जाता है। गुण दिखते नहीं है, व्यक्ति दिखता है, गुण तो अनुभूति में लाने का विषय है।