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पति पत्नी के बीच इतनी आपसी समझ होनी चाहिए: उप प्रवर्तीनी संथारा प्रेरक महासाध्वी गौरव श्री सत्य साधना जीमा. सा.

श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ मेवाड़ उपसंघ भयंदर के तत्वाधान में श्रमण संघीय जैन दिवाकर महासती श्री कमलावती जी म. सा की सु शिष्या उप प्रवर्तीनी संथारा प्रेरक महासाध्वी गौरव श्री सत्य साधना जीमा. सा. आदी ठाना 7 का चातुर्मास अंबेश भवन में उत्साह पूर्वक चालू है। आज के प्रवचन में साध्वी जी मा.सा. ने कल के प्रवचन सुख के प्रकार को जारी रखते हुए कहा कि परसो पहला सुख *निरोगी की काया* बताया था। कल दूसरा सुख *घर में माया* के बारे में बताया था। आज उसी कड़ी में तीसरा सुख *आज्ञा कारी भार्या*पर विस्तार से समझाते हुए बताया कि घर में पति पत्नी के बीच इतनी आपसी समझ होनी चाहिए की वे एक दूसरे को समझ के साथ आगे बढ़ सके। आज्ञाकारी भार्या यानी की पत्नी का मतलब ये नही की वो गुलाम बन जाय बल्कि पति की बात को समझ कर आगे बढ़े। आज तपस्या की लड़ी में वर्षा लक्ष्मीलाल लोढ़ा के 11के पुर के पच्खान हुए। जबकि उगम ...

श्रावक का छठा गुण- पापभिरूता है: साध्वी आभा श्री जी म. सा

श्री वर्ध· स्था. जैन श्रावक संघ पनवेल कपड़ा बाजार में विराजित स्पष्टवक्ता परम पूज्या गुरुणी मैय्या साध्वी आभा श्री जी म. सा. ने सभा को सम्बोधित करते हुए कहा – श्रावक का छठा गुण- पापभिरूता है। व्यक्ति पाप करता है- पर पुण्य का फल भोगना चाहता है। 18 पाप करता है – पर 9 पुण्य कमाता ही नही है। EX- टंकी फुल हो जाती है, तो पानी भी बाहार आ जाता है- उसी तरह से व्यक्ति पाप करता रहता है – तो एक दिन तो पाय का घड़ा फूट जाता है। स्वस्थ शरीर है- दोलत शौहरत है तो ये पिछले जन्म की कमाई है। Ex-केसर बोयेंगे तो केसर मिलती है- पर अगर प्याज- बोया है तो प्याज ही आएंगे। 2 चैनल है – पाप और पुण्य ।  हम – कृते को अगर सोने की थाल में परोसा जाए तब भी वह भौंकता है। साध्वी डॉ. श्रेयांशी ने कहा – की आवाज को नहीं सुनोगे जबन्तक अन्तर आत्मा तब तक मुक्ति नहीं मिलेगी – आख है पर आँखो में ...

कर्मों को भोगे बगैर मुक्ति नहीं:  प.पू. आगमश्रीजी म.सा. 

कम्मनहल्ली जैन स्थानक में प्रवचन  श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन संघ कम्मनहल्ली में प.पू. आगमश्रीजी म.सा. ने बताया जगत जीवो को नेशनल हाईवे पर लाने वाली वाणी है। वह वाणी आप सुन रहे हो भगवन ने कहा किए हुए कर्मों को भोगे बगैर मुक्ति नहीं है। जिस भावो से आप वाणी सुन रहे हो वैसा ही हमारा भव होगा। प.पू. धैर्याश्रीजी म.सा. ने श्रावकों के गुणों के बारे में बताते हुए कहा कि लज्जा शील होवे यह अगर हमारे जीवन में है तो हमारा जीवन सफल है छोटे-छोटे दृष्टांतो को बताकर धर्म सभा को चेताया । अध्यक्ष विजयराज चुत्तर ने अभिवादन किया। मंत्री हस्तीमल बाफना ने संचालन किया।

जिनवाणी श्रवण करने के लिए अति पुण्यवानी चाहिए: जयतिलक मुनिजी

नार्थ टाउन में पुज्य गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने कहा कि जिनवाणी श्रवण करने के लिए अति पुण्यवानी चाहिए। साथ में पुरुषार्थ भी चाहिए। जिनवानी अकेले नही सम्पूर्ण परिवार सहित श्रवण करनी चाहिए । यदि बच्चों को आज धर्म से नहीं जोड़ा, धर्म का मार्ग नही बताया तो पछतावा करना पड़ेगा और उसका फल यह होगा कि बच्चों को तत्वों की जानकारी नहीं होगी उन्हे चलने, फिरने उठने बैठने का सलीका नही आयेगा जिससे हमे ही दुख पड़ेगा। पानी जब जितना अधिक होता है उतना विनाश लाता है।धन विनाश लाता है सुख शान्ति नही देता है। वैसे ही भगवान कहते हैं आवश्यकता से अधिक विनाश लाता है। सुख शांति नहीं देता है संसार का त्याग नही कर सकते तो मर्यादा करो। क्योंकि विवेक के आभाव में जीव कष्ट भोगता है। जिनवाणी से मिलने वाला ज्ञान आपको और आपके परिवार को सुखी बनायेगा। जैसे बच्चों के डांट के प्रलोभन देकर स्कूल भेजते है वैसे ही बच्चों को धर्मस्थान में ...

प्रयोग के बिना योग व्यर्थ है: सत्य साधना जी

हमारे भाईन्दर में विराजीत उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना जी गुरुणी मैया साता पूर्वक विराजमान है। वह रोज हमें प्रवचन के माध्यम से नित नयी वाणी सुनाते हैं। वह इस प्रकार हैं बंधुओं जैसे किसी भी वस्तु का उपयोग दो ढंग से किया जा सकता है। सही या गलत अगर कोई भी चीज सही ढंग से उपयोग करें तो उसका पुण्य प्रबल होता है और गलत ढंग से करें तो बोलो प्रबल होते हुए भी कर्मों का बंधन होता है। कुछ लोग इतने भाग्यशाली होते हैं कि उनको वस्तु लाना तो आता पर संभालना भी नहीं आता एवं उसका प्रयोग करना भी नहीं जानते इस पृथ्वी पर कुछ लोग ऐसे होते हैं जो वस्तुओं का प्रयोग करके उसका मूल्य बढ़ाते हैं। साहित्य कोष में दो शब्द मिलते हैं योग एवं प्रयोग, प्रयोग के बिना योग व्यर्थ है। प्रयोग भी दो प्रकार का होता है सतयोग और दुष्प्रयोग, प्रयोग के सम्यक विधि के अभाव से दिव्य पदार्थ भी सम्मान बन जाता है। जय जिनेंद्र सा...

अजीव भी जीव को प्रभावित करता: जयतिलक मुनिजी

यस यस जैन संघ नार्थ टाउन में चातुर्मासार्थ विराजित गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने कहा कि आत्म बन्धुओं संसार में उत्पन्न जीवों को भव सागर से पार करने के लिए षटद्रव्य जीव अजीव धर्मास्तिकाय अधर्मस्तिकाय, पुदगलास्तीकाय, आकाशतिकाय इन षटद्रव्यों से जीव की उत्पत्ति हुई जीव अजीव दोनो का महत्व है दोनो के संयोग से संसार गतिमान है अजीव के बिना जीव अधुरा जीव के बिना अजीव अधुरा दोनों मे से एक चेतन एक जड़ है दोनो एक दूसरे को प्रभावित करते है आपस मे दोनो में आकर्षण है। जीव -अजीव से आकर्षित मोहित है इसलिए जीव का अजीव पर ममत्त्व है, राग है अजीव भी जीव को प्रभावित करता है। इस प्रभाव से किसी पर राग तो किसी पर द्वेष होता है ।आत्मा संसार में अजीव के संयोग से संसार में टिकी है आत्मा में शुभ-अशुभ का परिगमन होता है जिससे कर्मों का आगमन आत्मा में होता है। देखने से पता नही चलता कि शरीर और आत्मा धुले मिले है इस सत्य का उद्...

लक्ष्मी चंचल होती हे उससे मन चंचल हो जाता है: सत्य साधना जीमा. सा.

  श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ मेवाड़ उपसंघ भयंदर के तत्वाधान में श्रमण संघीय जैन दिवाकर महासती श्री कमलावती जी म. सा की सु शिष्या उप प्रवर्तीनी संथारा प्रेरक महासाध्वी गौरव श्री सत्य साधना जीमा. सा. आदी ठाना 7 का चातुर्मास अंबेश भवन में उत्साह पूर्वक चालू है। आज के प्रवचन में साध्वी जी मा.सा. ने कल के प्रवचन सुख के प्रकार को जारी रखते हुए कहा कि कल पहला सुख *निरोगी की काया* बताया था आज दूसरा सुख *घर में माया* के बारे में विस्तार से समझाते हुए बताया कि घर परिवार दुकान फेक्ट्री ये सभी माया की गिनती में आते हैं। इसमें से एक भी चीज साथ में नही जाती मगर ये एक प्रकार का नशा है जब तक सांस है तब तक ये नशा रहता हैं। कमाओ मगर एक लिमिट में यानी हर चीज में मर्यादा होनी चाहिए। मर्यादा से ही जीवन सफल होता है। लक्ष्मी चंचल होती हे उससे मन चंचल हो जाता है। उसके आगमन यानी आ *गमन , गमन यानी ...

परिस्थितियाँ चाहे कितनी ही विपरीत हो जाऐं, पर एक ना एक दिन सब ठीक हो जाएगा

एक हवाई जहाज आसमान की ऊंचाइयों में उड रहा था कि अचानक अपना संतुलन खोकर इधर उधर लहराने लगा। सभी यात्री अपनी मृत्यु को समीप जान डर के मारे चीखने चिल्लाने लगे। सिवाय एक बच्ची के जो मुस्कुराते हुए चुपचाप खिलोने से खेल रही थी। कुछ देर बाद हवाई जहाज सकुशल, सुरक्षित उतरा और यात्रियों ने राहत की साँस ली। एक यात्री ने उत्सुकतावश उस बच्ची से पूछा- “बेटा हम सभी डर के मारे काँप रहे थे पर तुमको डर नहीं लग रहा था.. ऐसा क्यों ?*** *🟣”बच्ची ने जवाब दिया- “क्योंकि इस प्लेन के पायलट मेरे पापा हैं.. मैं जानती थी कि वो मुझे कुछ नहीं होने देंगे”** *🟤 ठीक इसी तरह का विश्वास हमे अपने गुरु पर होना चाहिये.*.* *🔵”परिस्थितियाँ चाहे कितनी ही विपरीत हो जाऐं, पर एक ना एक दिन सब ठीक हो जाएगा क्योंकि परमात्मा हमें कुछ नहीं होने देंगे “*       संकलन *नवकार मिडीया*

हर व्यक्ति खास है पर हर कोई श्रेष्ठ नहीं जो इस बात को समझ ले, वही महान है: प्रवीण ऋषि

टैगोर नगर के श्री लाल गंगा पटवा भवन में उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि के प्रवचन महावीर में ऐसा क्या है जो दूसरों के पास नहीं है। श्रेष्ठ उसे ही चुना जाता है जो श्रेष्ठतम होता है। एक नेचुरल इमोशन है। कोई बाप अपनी बेटी को ऐसे घर में देना पसंद नहीं करता है जो उसके घर से कमजोर हो। हमेशा बाप अपनी बेटी के लिए ऐसा घर खोजता है जो अपने से बढ़िया हो। हम उसी का साथ पसंद करते हैं जो हमसे बढ़िया हो। तुम्हें ऐसा श्रेष्ठतम क्या मिला जो कहीं और नहीं मिला। मेरे इस एक सवाल में आपके कई सवालों के जवाब हैं। जम्बू कुमार ने जब दीक्षा ली, भगवान महावीर स्वामी उस वक्त धरती पर नहीं थे। इस धरती पर परमात्मा का क्या है! अच्छा होता जो पूछने वालों ने ये पूछा होता कि सुधर्मा स्वामी में क्या नजर आया जो तुमने वहां दीक्षा ली। सवाल जम्बू कुमार का है लेकिन पूछा जा रहा है सुधर्मा स्वामी के बारे में, वो इसलिए क्योंकि सुधर्मा स्वामी ...

सुख आंतरिक प्रसन्नता, उल्लासता है : जिनमणिप्रभ सूरिश्वरजी

चेन्नई : श्री मुनिसुव्रत जिनकुशल जैन ट्रस्ट के तत्वावधान में श्री सुधर्मा वाटिका, गौतम किरण परिसर, वेपेरी में शासनोत्कर्ष वर्षावास में धर्मपरिषद् को संबोधित करते हुए गच्छाधिपति आचार्य भगवंत जिनमणिप्रभसूरीश्वर म. ने उत्तराध्यन सूत्र के प्रथम अध्ययन के दूसरी गाथा में परिषह का विशलेषण करते हुए कहा कि दो शब्दों का उल्लेख होता है- उपसर्ग और परिषह। किसी औरों के द्वारा दिया गया दु:ख उपसर्ग है और स्वयं के द्वारा स्वयं को दु:ख रुपी क्रिया में तपाना परिषह है। साधक अपनी साधना से दु:खों को आंमत्रित कर सहन करता है, दूसरे सामान्य व्यक्ति के लिए दु:ख हो सकता है लेकिन साधक के लिए वह भी सुखानुभूति करवाता है। बाहरी वातावरण, द्रव्य, पदार्थ के आधार पर सुख की अलग परिभाषा हो सकती है। वह साधु के पेरामीटर के अनुसार 22 प्रकार के परिषह सहन करता है और आत्मोन्नति के अनुसार वे उसे सुख अनुभव करते है, प्रसन्नता की सात्व...

मनुष्य में ही अपार क्षमताएं है कि वह जो चाहे वह बन सकता है: सत्य साधना जी गुरुणी मैया

हमारे भाईन्दर में विराजीत उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना जी गुरुणी मैया साता पूर्वक विराजमान है। वह रोज हमें प्रवचन के माध्यम से नित नयी वाणी सुनाते हैं वह इस प्रकार हैं। बंधुओं जैसे कि इस संसार का सर्वश्रेष्ठ प्राणी मनुष्य है उसकी श्रेष्ठा एवं महत्ता का कारण उसकी स्वतंत्रता है। पशु पक्षी पेड़ पौधे तो स्वतंत्रता है क्योंकि उन्हें अपनी चेतना का बोध नही है ।  सिर्फ मनुष्य में ही अपार क्षमताएं है कि वह जो चाहे वह बन सकता है। मनुष्य जन्म तो मंदिर की सीडी की भाती है । जो दोनो दिशाओं में गति करता है। सिढी का प्रयोजन इतना ही है जो हम मंदिर पहुंच जाए द्वार पर ही बैठे ना रहे। मनुष्य का परम सौभाग्य है कि वह परमात्मा पद की साधना को प्राप्त कर सकता है जीवन में ऐसा होता है कि बहुमूल्य चीजों को पाने के लिए श्रमकरते हैं।  भव भ्रमण करते हैं इसलिए मनुष्य को चाहिए कि धर्म आराधना करें अपना जीवन सफल...

धर्म की शरण ग्रहण करो: आगमश्रीजी म.सा

श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन संघ कम्मनहल्ली में प.पू. आगमश्रीजी म.सा. ने बताया कि जहां समझ है वहां शांति है, सुख है, वही समाधि है। जीवन जीने की कला हो तो कभी भी वियोग से दुखी नहीं होगा।आज का मानव परिस्थिति जन्म दुख से 80% घिरा हुआ है दुखों से मुक्त होने के लिए धर्म की शरण ग्रहण करो। प.पू. धैर्याश्रीजी म.सा. ने बताया सूदक्षता, बुद्धिमान श्रावक वे होते हैं जो वस्तुस्थिति को जान लेते हैं। जिससे अन्य को भी हानि नहीं होती और स्वयं भी सुखी रहते हैं।अध्यक्ष विजयराज चुत्तर ने अभिवादन किया। मंत्री हस्तीमल बाफना ने संचालन किया।

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