यस यस जैन संघ नार्थ टाउन में चातुर्मासार्थ विराजित गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने कहा कि आत्म बन्धुओं संसार में उत्पन्न जीवों को भव सागर से पार करने के लिए षटद्रव्य जीव अजीव धर्मास्तिकाय अधर्मस्तिकाय, पुदगलास्तीकाय, आकाशतिकाय इन षटद्रव्यों से जीव की उत्पत्ति हुई जीव अजीव दोनो का महत्व है दोनो के संयोग से संसार गतिमान है अजीव के बिना जीव अधुरा जीव के बिना अजीव अधुरा दोनों मे से एक चेतन एक जड़ है दोनो एक दूसरे को प्रभावित करते है आपस मे दोनो में आकर्षण है। जीव -अजीव से आकर्षित मोहित है इसलिए जीव का अजीव पर ममत्त्व है, राग है अजीव भी जीव को प्रभावित करता है। इस प्रभाव से किसी पर राग तो किसी पर द्वेष होता है ।आत्मा संसार में अजीव के संयोग से संसार में टिकी है आत्मा में शुभ-अशुभ का परिगमन होता है जिससे कर्मों का आगमन आत्मा में होता है।
देखने से पता नही चलता कि शरीर और आत्मा धुले मिले है इस सत्य का उद्घाटन जिनेश्वर भगवन्त की वाणी ने किया कि शरीर आत्मा से भिन्न है पर सामान्य व्यक्ति समझता है कि शरीर आत्मा एक ही है ऐसा समझने वाला मिथ्यात्वी है। श्रावक दर्शन मानता है कि न आत्मा है न नरक है न मोक्ष है न पुर्नजन्म है जो दिखता है उसे ही चार्वाक दर्शन मानता है चार्वाक दर्शन के अनुसार शरीर पंचं भूतो से शरीर बना है अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश पांचों तत्वों से शरीर की उत्पादित मानी है जब शरीर नष्ट होता है तो ये पंच भूत इन पंच भूतो में विलीन हो जाते हैं।
इसका कथन है कि एक ही जन्म है ये बार बार नही मिलता इसलिए जो भोगना है एक बार में भोग लो अच्छे बुरे का विचार मत करो किसी को पीडा देने पर दण्ड नही मिलता है। यदि चावक दर्शन को मानने वाले से पूछा जाये कि किये कर्मौ का दण्ड कौन भोगेगा इस शरीर में चेतना कहाँ से आयी। जैसे सुखी इमली और गीली इमली एक समान दिखाई देती है पर धूप में सुखाने पर बीज अलग और ऊपर का दल अलग दिखाई पड़ता है। जैसे गीला नारियल सुखा नारियल जैसे तिल मे तेल, दूध में मिला पानी मे सब अलग है पर दिखाई नहीं देते हैं। क्योंकि घुल मिल गये हैं।
एकमेक होने से आत्मा और शरीर भी अलग नहीं दिखता है दूध से पानी अलग करने से कुछ प्रयोग करने पड़ते है जैसे हम दूध और पानी को अलग -2 कर देता है। एक समान दिखने वाले अलग -2 हो गया वैसे ही आत्मा और शरीर भी अलग-अलग होते है। इस तथ्य को समयकत्वी ही जान सकते है यथार्थ को बता सकते है, चेतना और जड़ अलग है जिसमें वर्ण, गंध, रस स्पर्श है वह शरीर है पुदगल है पुद्गल सड़त, गलन, विध्वंस को प्राप्त करता है पर आत्मा में ये वर्ण नही है सड़त गलन नही है इसलिए आत्मा चेतन है।
साधना से शरीर व आत्मा का भेद ज्ञान मिलता है। चक्षुओं से होने वाले ज्ञान की मर्यादा है किन्तु आत्म ज्ञान की प्राप्ति होने पर इन्द्रियो की आवश्यकता नही होती जब तक आत्म ज्ञान हो तब तक प्रभु की वाणी पर श्रद्ध करनी चाहिए तब तक ही सत्य जान पायेंगे। अध्यक्ष अशोक कोठारी ने संचालन करते हुए दैनिक कार्यक्रमों की जानकारी दी।