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जिनवाणी श्रवण करने के लिए अति पुण्यवानी चाहिए: जयतिलक मुनिजी

जिनवाणी श्रवण करने के लिए अति पुण्यवानी चाहिए: जयतिलक मुनिजी

नार्थ टाउन में पुज्य गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने कहा कि जिनवाणी श्रवण करने के लिए अति पुण्यवानी चाहिए। साथ में पुरुषार्थ भी चाहिए। जिनवानी अकेले नही सम्पूर्ण परिवार सहित श्रवण करनी चाहिए । यदि बच्चों को आज धर्म से नहीं जोड़ा, धर्म का मार्ग नही बताया तो पछतावा करना पड़ेगा और उसका फल यह होगा कि बच्चों को तत्वों की जानकारी नहीं होगी उन्हे चलने, फिरने उठने बैठने का सलीका नही आयेगा जिससे हमे ही दुख पड़ेगा।

पानी जब जितना अधिक होता है उतना विनाश लाता है।धन विनाश लाता है सुख शान्ति नही देता है। वैसे ही भगवान कहते हैं आवश्यकता से अधिक विनाश लाता है। सुख शांति नहीं देता है संसार का त्याग नही कर सकते तो मर्यादा करो। क्योंकि विवेक के आभाव में जीव कष्ट भोगता है। जिनवाणी से मिलने वाला ज्ञान आपको और आपके परिवार को सुखी बनायेगा।

जैसे बच्चों के डांट के प्रलोभन देकर स्कूल भेजते है वैसे ही बच्चों को धर्मस्थान में भी लाने की आदत डालनी चाहिए। जिससे वह धर्मस्थान में होने वाले धार्मिक क्रिया कलाप सिखेगा और अपना व आपका दोनो का जीवन सुखी बनायेगा। यदि धर्म स्थान मे आने की आदत नहीं डाली तो वह बड़ा होकर वह बुरी आदतों से जुड जायेगा। जो माता-पिता बच्चों को धर्म से नही जोडते स्वंय बच्चों के सबसे बड़े शत्रु है।

ज्ञानी जन कहते हैं कि पहले बच्चों को धर्म से जोडो फिर संसार से जोड़ो। जिनवानी सुनने से ही संसार का स्वरूप, आत्मा का स्वरूप समझ आता है संसार के विज्ञान का ज्ञान होता है। जिनवाणी जागृत करती है धर्म करने की प्रेरणा देती है। संसार छोड़ने योग्य है ये ज्ञान करती है। आत्मा को धर्म से जोड़ने वाली जिनवाणी है फिर आत्मा को एक न एक दिन सद्‌गति अवश्य प्राप्त होती है।

सम्यक ज्ञान से ही शरीर व आत्मा का भेद पता चलता है। संसार में रहने के लिए शरीर एक आलम्बन है। शरीर को कितने ही प्रयत्न कर लो सुखी नहीं बन सकता। न ये हमें सुख दे सकता है। सारे पाप शरीर के लिए किये जाते है आत्मा के लिए पाप करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। फिर भी मानव शरीर की सेवा करते थकता नहीं। पर दूसरो की सेवा एक दिन भी नहीं कर सकता।

ज्ञानी जन कहते है स्वयं की सेवा से कर्मबन्ध होता है दूसरों की सेवा से साता वेदनीय कर्म कटता है साता मिलती है। शरीर धर्म ध्यान करने का मात्र साधन है इसलिए सार संभाल आत्मा की करो शरीर की नहीं।

होटल का खाना दूसरो को खिला के पैसा कमाने का साधन है पर शरीर के लिए अच्छा नही होटल का अर्थ हो सके तो टलो। भूख लगने पर ही भोजन करना चाहिए अन्यथा शरीर के लिए हानिकारक हो जाता है। कितना ही अच्छे से अच्छा भोजन करने पर भी शरीर में रोग आ जाते है रोगो का कारण भी भोजन ही है यदि वही भोजन विवेक पूर्वक खाया जाये। धर्म ध्यान के लिए, संयम की रक्षा के

लिए भोजन किया जाये तो कर्म निर्जरा का कारण बन जाता है। इसलिए शरीर की नहीं आत्मा की सार संभाल करो ऐसा ज्ञानी जन कहते है। तीन रत्न सम्यग दर्शन, ज्ञान, चारित्र को यदि पाना है तो पांच महाव्रत अहिंसा, सत्य, आचोर्य आदि धारण करो। आत्मा को जानो क्योंकि मोल शरीर का नही आत्मा का है।

वृक्ष जैसे लकड़ी, फनीचर, कोयला, राख बनता है, और फिर वृक्ष बनता है वैसे ही शरीर भी आत्मा का पर्याय है। शरीर मरता है आत्मा नही आत्मा तो शाश्वत है। शरीर के मोह में रहने वाला संसार से मुक्त नही हो सकता है।

शरीर छूटने पर सबसे रिश्ते छूट जाते है। शरीर को नष्ट किया जा सकता है पर आत्मा को नहीं इसलिए स्वआत्मा पर दया करो क्योंकि आत्मा ही अपनी है। आत्मा को मुक्ति दिलाने के लिए जिनवाणी का श्रवण करो। सचिव ललित बेताला ने बताया कि यहां पर हर रोज बाहर बजार से भी अनेक श्रावक श्राविकाएं प्रवचन सुनने आते हैं।

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