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त यानि तत्काल प यानि पवित्र, जिसका सेवन करने से तत्काल आत्मा पवित्र बनती है: गुरुदेव जयतिलक मुनिजी

त यानि तत्काल प यानि पवित्र, जिसका सेवन करने से तत्काल आत्मा पवित्र बनती है: गुरुदेव जयतिलक मुनिजी

नार्थ टाउन में पुज्य गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में फरमाया कि आत्म बन्धुओ तप स्वरूप का निरुपण करते हुए बताया, त यानि तत्काल प यानि पवित्र, जिसका सेवन करने से तत्काल आत्मा पवित्र बनती है। नव तत्वों में संवर और निर्जरा दोनो बड़े महत्वपूर्व है जिसे मोक्ष जाना है। उसे सवंर, निर्जरी को धारणा होगा।

उत्तराध्ययन में एक उदाहरण है कि तालाब में कई छिद्रों से पानी आ रहा है तालाब कि सफाई के लिए सभी छिंद्रो को बन्द करके पानी उलीछ कर बाहर निकालना होगा और फिर सूर्य के ताप से तालाब को सुखा कर साफ किया जा सकता है। वैसे ही आत्मा के आस्त्रव छिद्रो को बन्द कर सचित कर्मो की निर्जरा करनी होगी और तप द्वारा आत्मा को पवित्र करना होगा । चार्तुमास यानि वर्षाकाल तपस्या का काल है। भगवान कहते है साधु के समान गृहस्थ को भी गमनागमन न करके घर या उपासरे में रहते हुए ज्यादा से ज्यादा तपस्या करनी चाहिए।

तपस्या करने वाले को आहार बनाने व करने की आवश्यकता नही होती शरीर की साज-सज्जा, स्नान भी करने की जरूरत नही। तपस्वी को धर्म ध्यान का ही एक मात्र कार्य रहता है। चार्तुमास काल तप द्वारा आठ कर्मों की निर्जरा करने का उत्तम काल है। जिनेश्वर भगवान ने कर्म निर्जरा के लिए 12 प्रकार के तप बताये है इनमे उत्तम अनशन यानि उपवास बताया है उपवास का अर्थ है अपनी आत्मा के समीप वास करना।

परन्तु आज वर्तमान में व्यक्ति के आत्मा से भी ज्यादा सेलफोन के समीप रहता है। प्रत्येक क्षण फोन हाथ में रहता है। आत्मा हमारे शरीर मे ही है। कहने को हम हर पल आत्मा के साथ रहते है पर आत्म चिन्तन करने वाला ही वास्तव में आत्मा के साथ रहता है और जो आत्म चिन्तन करता है वो तपस्या में अग्रसर होता है। शरीर ही आठ कर्मो का बन्धन कराने वाला है। इसलिए भगवान कहते है शरीर का त्याग करो ।

शरीर का त्याग करने से आठ कर्मों की निर्जरा होती है। तप से घाति -अघाति दोनो कर्मों का क्षय होता है। तप के माध्यम से उदय में आने वाले कर्मों की भी निर्जरा होती है। कर्मों की निर्जरा से तपस्वी को साता मिलती है वह निरोगी रहता है उसके उसका शरीर हल्का फुल्का रहता है। ज्ञानीजन कहते हैं कि चारो आहार का त्याग करने वाला नही जबकि बल्कि चारों समय आहार करने वाला जल्दी मरता है। हमारा मुहँ है बिना बिजली के 24 घंटे चलता रहता है फिर भी थकता नहीं। शरीर बुद्धि सभी अंग थक जाते है पर मुंह खाने से नहीं थकता ।

अनशन करने वाला अमर हो जाता है कर्मों के बन्धन से मुक्त हो सिद्धालय में वास करता है जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है। जो चारो टाइम खाते है वे कर्म बन्धन कर के चारों गतियों में भटकते हैं। आज डॉक्टर भी कहते है कि फास्टिंग करो क्योंकि फास्टिंग से शरीर स्वस्थ रहता है। तपस्वी की अनुमोदना करने वाला अनुमोदना में तपस्या लेने वालो सौ गुणा कर्मों की निर्जरा करता है। इसलिए भगवान चातुर्मास काल को तपस्या का काल कहा है। तपस्या करो। कर्म निर्जरा करो।

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