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उपाध्याय केवल मुनि की जन्म जयंती व एक कदम श्रावक धर्म की ओर कार्यशाला रविवार को

चेन्नई : श्री एस एस जैन संघ माम्बलम के तत्वावधान व स्वर्ण सयंम आराधक श्री वीरेंद्रमुनी के सानिध्य में रविवार दिनाँक 16 जुलाई को उपाध्याय केवलमुनि की जन्म जयंती तप त्याग, नवकार जाप व दो सामायिक साधना के साथ मनायी जायेगी। सवेरे 7.30 बजे से 8.00 बजे सामूहिक प्रार्थना के पश्चात गुणानुवाद सभा का आयोजन सेवरे 8 बजे से 9 बजे तक होगा।      इसी श्रृंखला में डॉ एम उत्तमचन्द गोठी द्वारा एक कदम आगार धर्म की ओर क्लास सेवरे ठीक 10 बजे से रहेगी जिसमे श्रावक श्राविका के 14 नियम तीन मनोरथ पाँच अभिगम आदि को ग्रहण करने से किस तरह समुंद्र जितना पाप कम होकर एक बूँद के बराबर रह जाता है, इसकी विस्तार पूर्वक जानकारी दी जायेगी। यह विज्ञप्ति संघ मंत्री महेंद्र गादिया ने प्रेषित की।

परमात्मा के बनाए सिस्टम को फॉलो करेंगे तो देवगति मिलना भी तय है: प्रवीण ऋषि

टैगोर नगर के श्री लालगंगा पटवा भवन में चातुर्मासिक प्रवचन  प्रभु महावीर ऐसा सिस्टम देते हैं कि कोई उसका हिस्सा बन जाए तो सुधर ही जाता है। वो ऐसा सिस्टम बनाते हैं कि जिसकी महावीर पर श्रद्धा न हो, मोक्ष पर श्रद्धा न हो, ऐसे लोगों के भी तीन गति के दरवाजे बंद हो जाते हैं। नरक गति। तिरयंच गति। मनुष्य गति। उसकी एकमात्र गति देव गति होती है। बशर्ते उसे सिस्टम को स्वीकार करना जरूरी है। टैगोर नगर के श्री लालगंगा पटवा भवन में चल रहे चातुर्मासिक प्रवचन में उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि ने ये बातें कही। उन्होंने कहा, मुझे नहीं लगता कि यहां जो लोग बैठे हैं उनमें से एक भी व्यक्ति मोक्ष गति में जाना चाहता है।‌ सभी के सभी स्वर्गीय होना चाहते हैं। जिन्हें श्रद्धा थी नहीं, है नहीं और होगी नहीं, ऐसे सभी लोगों को अभवी जीव कहा जाता है। ऐसे लोग भी जिन शासन को फॉलो करते हैं। तीर्थंकर के प्रोटोकॉल को फॉलो करते हैं। के...

तप के बिना कर्मों की निर्जरा असम्भव है: जयतिलक मुनिजी

नार्थ टाउन में चातुर्मासार्थ विराजित गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में फरमाया कि जैन धर्म में तपस्या का महत्वपूर्ण स्थान है। तप के बिना कर्मों की निर्जरा असम्भव है। तप से मन शुद्ध, वाणी शुद्ध, काया शुद्ध होती है आत्मा को साफ करने के लिए तप है मन संयम, वाणी संयम, काया संयम के लिए तप आवश्यक है सम्पूर्ण विश्व में चारों आहार का प्याग करने वाला जैन समाज है। इस विशेषता के कारण जैन विश्व में प्रसिद्ध है और चातुर्मास काल में तपस्या की लडी लग जानी चाहिए। तप का माहौल प्याग का माहौल चातुर्मास में ही मिलते है आगमों मे भी तपस्वियों का वर्णन मिलता है । जिनेश्वरो ने तपस्या के अनेक भेद कर लिये। उनकी सामर्थ्य व शक्ति के अनुसार तप के भेद किये है एक भेद ही काफी था मगर जिनेश्वर देव ने बारह भेद कर दिये सर्वज्ञ सर्वदशी हर व्यक्ति का पराक्रम जानते थे इसलिए तप का निरुपण कर दिया। 1000 किलो का बाट भी उठाके रख देत...

सुधरने की संभावना को स्वीकारें: उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि

श्री लाल गंगा पटवा भवन में उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि के प्रवचन रायपुर। गुड़ गोबर बन सकता है। क्या आप गोबर से गुड़ बना सकते हैं! क्या मूलभूत परिवर्तन संभव है! आपके मन में इसका जवाब होगा- नहीं। लेकिन, ऐसा नहीं है। ‌गुड़ अगर गोबर बन सकता है तो गोबर भी गुड़ बन सकता है। जरूरत है तो बस सुधरने की संभावनाओं को स्वीकार करना। टैगोर नगर के श्रीलालगंगा पटवा भवन में चल रहे चातुर्मासिक प्रवचन में उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि ने यह बातें कही। ‌ उन्होंने कहा कि बहुत सारे विचार आज भी चल रहे हैं। पहले भी चलते थे। उसमें से एक विचार था कि जो आज फीमेल है, क्या वह हर जन्म में फीमेल ही रहेगा? जो मेल है वह हर जन्म में मेल ही रहेगा क्या? कई धार्मिक किताबों में बताया गया कि पुरुष पुरुष ही रहेगा। नारी नारी ही रहेगा। कुछ मंत्रों में यह भी बताया गया कि जो व्यक्ति गंदगी के साथ मरता है वह अगले जन्म में कुत्ता बनता है। इस त...

इन्द्रियाँ पतन का माध्यम भी है और आत्मा के उत्थान का मार्ग भी है: महासाध्वी धर्मप्रभा

साहूकार पेठ में श्री पार्श्व पद्मावती एवं सिध्दी तप – एकासन व्रत के अनेक जनों ने व्रत के साथ करी साधना चैन्नई (साहूकार पेठ) इन्द्रियाँ पतन का माध्यम भी है और आत्मा के उत्थान का भी। शुक्रवार को साहूकार श्री एस,एस, भवन में साध्वी धर्मप्रभा ने श्री पार्श्व पद्मावती एवं सिध्दी तप के एकासन व्रत करने वालें तपस्वियों और श्रध्दालूओ को सम्बोधित करतें हुए कहा कि इस संसार मे बुध्दिमान और समझदार प्राणी कौई है, तो वह मनुष्य है। जिसकी स्मरण शक्ति विराट है। उसकी आत्मा मे परमात्मा निवास करतें है। लेकिन मनुष्य उस शक्ति से अनभिज्ञ है । वो मात्र सांसरिक सुख को सर्वोपरि मानकर इन्द्रियों कि पराधीनता को स्वीकार कर लेता है । इन इन्द्रियो की पराधीनता उसके लिए अधोपतन का कारण बन जाती है। जिस साधक ने सांरारिक सुख को त्याग कर इन्द्रियों और मन रूपी घोड़े को वश मे कर लिया है। वो शीघ्र ही अपने लक्ष्य को प्राप्त कर ...

श्रीमती लता पारख बनी तेरापंथ महिला मण्डल, चेन्नई की अध्यक्षा

साध्वी लावण्यश्री ने झाड़ू की तरह मिलझूल कर कार्य करने की दी प्रेरणा चेन्नई : श्री जैन श्वेतांबर तेरापंथ महिला मंडल चेन्नई का 57 वां वार्षिक अधिवेशन तेरापंथ सभा भवन, साहूकारपेट, चेन्नई में अध्यक्षा श्रीमती पुष्पा हिरण की अध्यक्षता में आयोजित हुआ। अधिवेशन से पूर्व साध्वी लावण्यश्रीजी के मुखारविंद से मंगल पाठ का श्रवण किया। साध्वीश्री ने फरमाया कि महिला मंडल में सबको साथ लेकर चलना है, शक्ति का नियोजन करना है। सभी बहनें देव, गुरु, धर्म के प्रति श्रद्धा रखें। गुरु इंगित की आराधना करें। सबके साथ सौहार्दपूर्ण व्यवहार रखें। साध्वीश्रीजी ने विशेष प्रेरणा पाथेय में फरमाया की बहनें झाड़ू की तरह एक साथ बंधकर रहे, तिनके की तरह बिखर कर ना रहे। नवनिर्वाचित अध्यक्षा के प्रति आध्यात्मिक मंगलकामना की। साध्वी श्री सिद्धांतश्री एवं साध्वी श्री दर्शितप्रभा ने सदन को संबोधित करते हुए सभी बहनों को धर्म संघ के प्...

बिजी रहे पर इजी भी रहे: उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना जी

हमारे भाईन्दर में विराजीत उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना जी गुरुणी मैया एवं 7 थाणा आदि साता पूर्वक विराजमान है। वह रोज हमें प्रवचन के माध्यम से नित नयी वाणी सुनाते हैं वह इस प्रकार हैं। बंधुओं जैसे बिजी रहे पर इजी भी रहे पहला प्रिंसिपल पहला उसूल है हम अपने आप से सहजता से पूछे एवं स्वयं से पूछे कि हम कितने इजी हैं बिजी तो है लेकिन इजी कितने हैं। क्या सुबह उठकर माता-पिता को प्रणाम करने की आदत है अगर नहीं तो आप अन इजी है इजी आदमी तो जट से झुक जाएगा। जल्दी से सहज एवं सरल भी हो जाएगा अगर आपके घर पर कोई मेहमान आए उनको देखकर आपके मन में अति प्रसन्नता आती है या फिर परेशान हो जाते हो अगर आप में प्रसन्नता आती हैं तो इंजीनेस और खेद होता है और अगर प्रसन्न नहीं रहते हो तो ईजिनेस। जीवन में यह सदा याद रखना चाहिए की प्रकृति परिवर्तनशील है। सब कुछ बदलता रहता है जब परिणाम दोनों में से आना चाहिए तो...

भगवान महावीर की वाणी सभी जीवों के लिए कल्याणकारी है: गुरुदेव जयतिलक मुनिजी

यस जैन संघ नार्थ टाउन में चातुर्मासार्थ विराजित गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में फरमाया कि भगवान महावीर की वाणी सभी जीवों के लिए कल्याणकारी है। जिनवाणी कहती है सावध्य प्रवृतियों का जीवन पर्यन्त के लिए त्याग करो। जो ऐसे करता है वह मन-वचन, काया से किसी को कष्ट नहीं देता। जिनवाणी को दिव्य रूप कहा है क्योंकि ये सबका कल्याण कराती है, धर्म का मार्ग प्रशस्त कराती है, जीव जब तक अपनी शक्ति को नहीं पहचान लेता तब तक वह अष्ट कर्मो से मुक्त नही हो सकता। संसार की सभी वस्तुएँ विनाश को प्राप्त होगी पर आत्मा को कोइ‌ भी शक्ति छिन्न भिन्न नहीं कर सकती। आत्मा मे अनन्त शक्ति है पर कर्मो का आवरण आत्मा को कमजोर करता है भगवान कहते हैं कर्मों के आवरण को हटाने का पुरुषार्थ करो। सांसारिक व्यक्ति कर्म को आत्मा सें ज्यादा शक्तिशाली मानती है, और कर्मों के आगे घुटने टेक देती है। पर भगवान कहते हैं कर्मों से डरो मत कर्...

बीज होते हैं वैसा ही फल मिलता है: उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना जी

हमारे भाईन्दर में विराजीत उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना जी गुरुणी मैया साता पूर्वक विराजमान है वह रोज हमें प्रवचन के माध्यम से नित नयी वाणी सुनाते हैं। वह वाणी इस प्रकार हैं। बंधुओं जैसे कि इंसान की सोच इंसान की शांति समृद्धि और आनंद की आत्मा है। आजह मैं दुनिया का इतना सुंदर और स्वर्ग नुमा जो स्वरूप दिखाई दे रहा है। इसके पीछे भी इंसान की महान सोच काहीं कमाल है सोचो अगर इंसान के पास सोचना होती तो क्या होता मगर सोच इतनी है कि इंसान की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती है। इंसान में सोचने की ताकत है इसलिए इंसान, इंसान है अगर इंसान सोच को सुंदर बनाने की कला सीख ले तो वह दिन दूर नहीं जब स्वर्ग धरती पर होगा और सातों सुख उसके मुट्ठी में होगा यह ब्रह्मांड और कुछ नहीं अनुगूंज मात्र है या हर चीज लौटकर आती है जैसा हम बीज होते हैं वैसा ही फल मिलता है। अगर हम खुश रहने के बारे में सोचें तो खुशियां...

संयम अगीकार करो व्रत धारण करो: जयतिलक मुनिजी

नार्थ टाउन में चातुर्मासार्थ विराजित गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने कहा कि यदि मुक्ति चाहिए तो संयम अंगीकार करना आवश्यक है अव्याबाध सुख के लिए संसार से निवृत होना आवश्यक है। यदि जीव अपनी इच्छा से संसार छोडे तो सम्मान होता है । एक दिन मृत्यु होने पर संसार स्वयं छूट जाता है बेटे बेटी पत्नी आदि के साथ मोह होने पर भी उन्हें छोड़ कर जाना ही पड़ता है मृत्यु होने पर सब छूट ही जाता है जैसे शरीर व आत्मा अलग -2 है वैसे ही भगवान कहते है संसार की प्रत्येक वस्तु आप से भिन्न है। वस्तुओं पर आपका राग होने पर मन में आमोद- प्रमोद झलकता है, प्रसन्नता होती है परन्तु भगवान कहते है कि प्रत्येक संयोग एक दिन वियोग में बदलता ही है । इष्ट वस्तु का वियोग होने पर जीव को भयंकर पीड़ा होती है। इसलिए यह समझना आवश्यक है कि शरीर तो क्या शरीर के बाल भी हमारे नही है उस संसार में राई जितनी वस्तु भी हमारी नही है। बाल, नाखून ये तो शरीर ...

प्रवृत्ति, रुचि, स्वभाव समान नहीं होता: आगमश्रीजी मासा

कम्मनहल्ली जैन स्थानक में प्रवचन  श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन संघ कम्मनहल्ली में प.पू. आगमश्रीजी म.सा. ने बताया हर एक व्यक्ति की प्रवृत्ति, रुचि, स्वभाव समान नहीं होता । सामान्य प्रकार से तीन प्रकार के व्यक्ति होते हैं, सत्वगुणी, रजोगुणी, तमोगुणी इसकी परिभाषा बताई। व्यक्ति के अनुरूप जो सत्कार कर सकता है वह स्वयं के जीवन में गुणों को पा लेता है। केशीश्रमण और गौतम स्वामी के बारे में बताया। प.पू. धैर्याश्रीजी म.सा. ने श्रावकों के गुणों के बारे में बताया श्रावक के घट में दया चाहिए। दुखी जीवो के सेवा में सदा तत्पर रहें। विक्रमादित्य के जीवन की घटना का उल्लेख किया । धर्म रूचि अंगार का दृष्टांत बताया। अहमदनगर से संपतलाल प्रशांतजी बाफना सपरिवार, बार्शी से राहुल सुराणा सपरिवार, यशवंतपुर मंत्री रमेश बोहरा मंत्री रोशन बाफना राममुर्तिनगर संघ एवं मंत्री रिकब मेहता, कमल बाफना, अनिल बाफना गणमान्य मौजूद र...

वह दु:ख सदा स्वीकार, जिसके पिछे धर्म हो : गच्छाधिपति जिनमणिप्रभसूरिश्वरजी

★ कर्तव्य बोध का पाठ पढ़ाते हुए घर में मर्यादा की बताई महत्ता चेन्नई : श्री मुनिसुव्रत जिनकुशल जैन ट्रस्ट के तत्वावधान में श्री सुधर्मा वाटिका, गौतम किरण परिसर, वेपेरी में शासनोत्कर्ष वर्षावास में धर्मपरिषद् को संबोधित करते हुए गच्छाधिपति आचार्य भगवंत जिनमणिप्रभसूरीश्वर म. ने उत्तराध्यन सूत्र के प्रथम अध्ययन के दूसरी गाथा में परिषह का विश्लेषण करते हुए कहा कि यह भाव दशा बहुत महत्वपूर्ण है कि दूसरों को सुख देने के लिए मैं दु:ख उठा सकता हूँ, उसमें मुझे किसी भी प्रकार की समस्या नहीं है, वह धर्म है। जीवन में वह दु:ख सदा स्वीकार करना, जिस दु:ख के पिछे धर्म हो। वह दु:ख सदा स्वीकार करना, जिसके पिछे पाप न हो और वह दु:ख भी सदा स्वीकार करना, जिसका परिणाम आत्म कल्याण हो। उस दु:ख को स्वीकार करने में सदा सदा प्रसन्नता का अनुभव करना। वह दु:ख स्वीकार करने योग्य नहीं है, वह सुख भी स्वीकार करने योग्य नहीं ह...

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