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संयम अगीकार करो व्रत धारण करो: जयतिलक मुनिजी

संयम अगीकार करो व्रत धारण करो: जयतिलक मुनिजी

नार्थ टाउन में चातुर्मासार्थ विराजित गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने कहा कि यदि मुक्ति चाहिए तो संयम अंगीकार करना आवश्यक है अव्याबाध सुख के लिए संसार से निवृत होना आवश्यक है। यदि जीव अपनी इच्छा से संसार छोडे तो सम्मान होता है । एक दिन मृत्यु होने पर संसार स्वयं छूट जाता है बेटे बेटी पत्नी आदि के साथ मोह होने पर भी उन्हें छोड़ कर जाना ही पड़ता है मृत्यु होने पर सब छूट ही जाता है जैसे शरीर व आत्मा अलग -2 है वैसे ही भगवान कहते है संसार की प्रत्येक वस्तु आप से भिन्न है।

वस्तुओं पर आपका राग होने पर मन में आमोद- प्रमोद झलकता है, प्रसन्नता होती है परन्तु भगवान कहते है कि प्रत्येक संयोग एक दिन वियोग में बदलता ही है । इष्ट वस्तु का वियोग होने पर जीव को भयंकर पीड़ा होती है। इसलिए यह समझना आवश्यक है कि शरीर तो क्या शरीर के बाल भी हमारे नही है उस संसार में राई जितनी वस्तु भी हमारी नही है। बाल, नाखून ये तो शरीर का कचरा है फिर भी उसको सजाने के लिए आप कितना ही धन खर्च कर देते हो। जो वस्तु आपको इष्ट नही है, प्रिय नहीं है, उसके प्रति द्वेष होता है ऐसी टूट जाये खो जाये तो प्रसन्नता होती है। भगवान कहते है संयोग वियोग ही संसार है और ये राग द्वेष ही संसार परिभ्रमण का कारण बनता है। जिनेश्वर कहते है पुद्गल का कितना ही सार संभाल करो पर उसका स्वभाव तो सड़न, गलन, विध्वंस है इसलिए वह अवश्य ही नष्ट होगी।

जिनवाणी सुनकर जीवन में बदलाव लाना आवश्यक है। मात्र चार्तुमास के दो महीने होते ही सब धर्म ध्यान छूट जाता है। ये दो महीने आपका त्याग दखाता है। इतनी जिनवाणी सुनने के बाद भी आपकी आसक्ति नही छूटी तो कैसे आपको मुक्ति मिलेगी। इसलिए जमीकन्द आदि का त्याग मात्र दो महीने के लिए नहीं जीवन भर के लिए करो तभी आसक्ति देगी आपके भीतर धर्म का प्रवेश होगा तभी कर्म की निर्जरा होगी। व्रतों का पालन करने का जो दिखावा करते है तो सम्यक्त्वी नहीं है जब तक आपकी इच्छा अर्न्तमन से समाप्त नहीं होती तब तक व्रत का पालन करने का अभ्यास करो क्योकि व्रत- पचवखाण दुखो से मुक्ति दिलाने के लिए है कर्म निर्जरा के लिए है दिखाने के लिए नही । त्याग‌ करना है मनपसन्द वस्तुओं का त्याग करो क्योंकि उससे कर्म निजरा होती है। क्योंकि आसक्ति संसार में रोकती है। आसक्ति टूटने पर ही वैराग्य उत्पन्न होता है। सच्चा वैरागी बहलाने-फुसलाने से भी डिगता नही ।

श्रेणिक राजा का बेटा भी अपने पिता की आज्ञा पा कर ही अभयकुमार से दोस्ती करता है क्योंकि यदि संगत गलत हो जीवन पर बुरे प्रभाव पड़ते है। श्रेषिक राजा के बेटे आर्द्रकुमार को अभय कुमार ने भेंट में पूजनी (छह काय की रक्षक) भेजी जिसे देख आर्द्रकुमार को जातिस्मरण ज्ञान हुआ और वैराग्य उत्पन्न हो गया इसलिए दोस्ती सोच समझ कर करनी चाहिए जिसके मन में सच्ची विरक्ति है उसे संसार में कोई रोक नही सकता। जिसके मन में सच्ची विरक्ति नही उसके व्रत पालन में दृढता नहीं आती। व्रत धारण करते समय मर्यादा, आगार का ध्यान रखना चाहिए जिससे वे स्मरण में रहे। धन डूब गया तो चलेगा क्योंकि उससे दुर्गति नही मिलती परन्तु व्रत का स्मरण नही रखा व्रत टूट गया तो नरक आदि दुर्गति मिलती है।

व्रत आत्मा का रक्षा कवच है अत: उसका पालन मजबूती से करना चाहिए क्योंकि बुलेट प्रूफ जैकेट पहनने पर भी गोली लग सकती है लेकिन व्रत प्रत्याखान आपकी, आत्मा को कर्म बन्धन से बचा कर मुक्ति की ओर ले जाते है। मरण के दुख से बचाने के लिए भगवान ने व्रत प्रत्याखान का निरूपण किया इसलिए दुखो से बचना है तो संयम अंगीकार करो। परम पूज्य गुरुदेव श्री जयतिलक मुनि जी म.सा के मुखारविंद से श्रीमान सज्जनराज सुषमा जी डागा, नॉर्थ टाऊन वालों ने शील व्रत आजीवन ब्रह्मचारी के आज पच्छखान ग्रहण किये।

उनका सम्मान एस एस जैन संघ, नॉर्थ टाऊन की ओर से कार्याध्यक्ष पदम खीचा व महिला मण्डल अध्यक्षा ललिता सबदडा ने साल, माला व स्मृति चिन्ह देकर किया।

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