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तप के बिना कर्मों की निर्जरा असम्भव है: जयतिलक मुनिजी

तप के बिना कर्मों की निर्जरा असम्भव है: जयतिलक मुनिजी

नार्थ टाउन में चातुर्मासार्थ विराजित गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में फरमाया कि जैन धर्म में तपस्या का महत्वपूर्ण स्थान है। तप के बिना कर्मों की निर्जरा असम्भव है। तप से मन शुद्ध, वाणी शुद्ध, काया शुद्ध होती है आत्मा को साफ करने के लिए तप है मन संयम, वाणी संयम, काया संयम के लिए तप आवश्यक है सम्पूर्ण विश्व में चारों आहार का प्याग करने वाला जैन समाज है।

इस विशेषता के कारण जैन विश्व में प्रसिद्ध है और चातुर्मास काल में तपस्या की लडी लग जानी चाहिए। तप का माहौल प्याग का माहौल चातुर्मास में ही मिलते है आगमों मे भी तपस्वियों का वर्णन मिलता है । जिनेश्वरो ने तपस्या के अनेक भेद कर लिये। उनकी सामर्थ्य व शक्ति के अनुसार तप के भेद किये है

एक भेद ही काफी था मगर जिनेश्वर देव ने बारह भेद कर दिये सर्वज्ञ सर्वदशी हर व्यक्ति का पराक्रम जानते थे इसलिए तप का निरुपण कर दिया। 1000 किलो का बाट भी उठाके रख देता है हर व्यक्ति का पराक्रम और पुरुषार्थ अलग है सबसे पहले तप के भेद अनशन बताया है। अनशन यानि उपवास । उपवास यानि तीन या चारों आहार का प्याग करना ।

अनशन के अन्दर जंठसहिय मंठेसिहिंय बताया है कितना ही कमजोर व्यक्ति क्यो न हो में वह गठिंसहिय का पालन कर सकता हैं जन्मे हुए बालक को भी गंठिसहिय, मुट्ठिसहियं का पंचक्खान करा सकते हो, वो भी तपस्वी बन जायेगा । जिसको जन्म से ही रूप धर्म मिल जायेगा तो आगे जाकर उत्कृष्ट तपस्वी बन जायेगा क्योंकि वह बाल्य काल से ही धर्म से जुड गया | ज्ञानी जन कहते है जो आप

नहीं कर सकते वह बच्चे कर सकते है । गर्भ के जीव को ज्ञान हो सकते है। आगमों में उल्लेख मिलता है कि अर्जुन ने सुभद्रा को चक्रव्यूह की रचना सुनाई जब वह गर्भवती थी सुभद्रा माँ जब तक ग्रहण नहीं करती है तब बच्चा भी ग्रहण नहीं करता है। सुभद्रा सो गई तो पीछे का सुन नहीं पाई तीर्थकर की माता भी जब स्वप्न देखती है तो वह भी संसार का काम छोड़ देती है।

एंकात में धर्मध्यान करती है गर्भ काल में गठिंसहिय, मंठिसिहिय तप भी कर सकती है, आहार संयम से अच्छे पदार्थों का सेवन करो। मरन शैया पर पड़ा हुआ व्यक्ति भी गठिंसहिय, मंठिसिहिय कर सकता है अन्तिम श्वास तक कर्मों की निर्जरा कर सकते है भगवती और पन्नवणा में भी उल्लेख मिलता है ।

गर्भ में ही मरकर कहाँ जा सकता है गर्भ में सुनते सुनते वह बालक ज्ञानी हो सकता है। हमारे जैनों में तपस्या का बहुत महत्व है खाते – पीते भी कर्मो की निर्जरा कर सकते है खरगोश और कछुए में कछुए के भांति भी धीरे कर्मों की निर्जरा कर सकते है। जो प्रमाद नहीं करता है वहीं मंजिल को पा सकता है। इसलिए ज्ञानीजन कहते है तपस्या करो केवल ज्ञान, केवल दर्शन के बाद भी तपस्या कर सकते हैं।

पहला पुरुषार्थ कर्मों की निर्जरा करना है। इच्छाओं का निरोध करना ही तप है प्याग से ही इच्छाओं का निरोध करो ऐसी कोई भी तपस्या नहीं जिसमे रात्रि भोजन खुला हो । गठिंसहिय मंठिसिहिय में भी रात में खाना पाप है पक्षियों की भी कितना संयम है वो रात मे दाना चुगने नहीं जाते एक जगह पर स्थिर हो जाते है आवाज नहीं करते है।

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