नीमचौक स्थानक पर गुरुदेव अरुणमुनि मसा ने प्रवचन में कहा कि व्यक्ति के चारों और सुख के साधन बिखरे हों, जब मनुष्य के भीतर त्याग की भावना बहुत मुश्किल से आती है। कुछ विरले हलुकर्मी ही संसार में रहते हुए भी संसार से विरक्त रहने का साहस करते हैं। गौतम स्वामी ने प्रभु महावीर से प्रश्न पूछा की व्यक्ति अपने जीवन में अनेक कष्टों को प्राप्त करता है इसका क्या कारण है। प्रभु ने कहा कि जिस व्यक्ति के अंदर अहंकार की भावना रहती है वह हमेशा परेशानियों और दुःखों से घिरा रहता है। गुरुदेव ने कहा कि अहंकारी व्यक्ति इस संसार में कभी यश प्राप्त नहीं कर सकता और ना ही सुखी रह सकता है।
*पूज्य प्रवर्तक श्री प्रकाश मुनि जी* महारासा तिर्थकर भगवान की पहली वाणी *आचारांग सूत्र* के रूप में हुई, इस में सबसे पहले जीव की चर्चा की गई। आत्मा हे वह माने वह धर्म में आगे बढ़ता है। जीव है तो, संसार है – जीव तत्व है ” 6, *पृथ्वीकाय, अपकाय, तेउकाय, वायुकाय , वनस्पति काय, त्रस काय , यह *धर्म का मूल तत्व है।* हम सब जीव है जीवत्व पर श्रद्धा, समझा, आस्था है वह जीव धर्म करने में समर्थ होता है। *धर्म अपने लिये करता है।* धर्म भेद को समझाया जा सकता है। *अणगार धर्म*- जो किसी का मालिक नहीं – लड़ते काय के लिये 3 चीज के लिये *जर जोरु -जमीन* के लिये । धरती अखण्ड कुवारी , वो हसति है कि असंख्य मनुष्य पैदा हुए मैं आज तक कुंवारी हुँ । चक्रवर्ती चले गये , संसार जब आँख खुली तब तक । 🔰आपका चिंतन घर बनाने में *पूज्य वीर रत्न विजय जी महारासा* का चिंतन मंदिर स्थान बनाये, वचन पुण्याई का उपयोग समा...