सौभाग्य प्रकाश संयम सवर्णोत्सव चातुर्मास खाचरोद पुज्य की दर्शन मुनिजी मासा जीव 9 प्रकार से दर्शनावर्णीय कर्म भोगता है। 1 निद्रा- 2 निद्रा-निद्रा 3 प्रचला -बैठे-२ नींद लेना। जो पाप की क्रिया में संलग्न रहता है उनका सोना अच्छा है , धर्म के कार्य में संलग्न रहता है उसका जागृत रहना अच्छा ! जयंती श्राविका ने भगवान से प्रश्न किया ? *जीव क्यों किस कारण से भारी होता है किस कारण हल्का होता है?* जो 18 पाप का सेवन करता है वह जीव भारी हो जाता है जी 18 पाप स्थान से छुटजाता है, निवृत्त हो जाते है तो जीव हलका हो जाता है। जीव को संथारे के पहले 18 पाप का त्याग कराया जाता है दर्शनावर्णीय कर्म उदय होता है तो नींद आती है। त्याग का अनुमोदन करता है जीव कर्म की *निर्जरा* करता है और पाप का अनुमोदन करना की कर्म का *बंधन* कराता है। *अनुमोदन* करके कर्म बांध लेते हैं। हम पाप में घुमते रहते है सलग्नन रहते है, अपने 18...