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ईश्वर ने हमें इंसान तो बना दिया लेकिन इंसानियत हमें अब तक समझ न आई: उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि

टैगोर नगर के श्री लालगंगा पटवा भवन में चातुर्मासिक प्रवचन रायपुर। सौभाग्य से ईश्वर ने हमें इंसान तो बना दिया, लेकिन इंसानियत अब तक नहीं आ पाई है। यदि सारे इंसानों में इंसानियत आ गई होती तो आज दुनिया का नजारा कुछ और ही होता। विडंबना है कि आज पोषक शोषक बन गए हैं। तारक मारक बन गए हैं। टैगोर नगर के श्री लालगंगा पटवा भवन में चल रहे चातुर्मासिक प्रवचन में उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि ने ये बातें कही। उन्होंने कहा कि रक्षक भक्षक बन गए हैं। अब भटकाव का युग चल रहा है। कोई क्रियाकर्म में तो कोई परंपराओं के नाम पर भटक रहा है। लोगों को भटका भी रहा है। हम सब सौभाग्यशाली हैं कि आज हमें महावीर स्वामी की वाणी सुनने मिल रही है। महावीर स्वामी की वाणी के कारण अब उबड़-खाबड़ मार्ग खत्म होकर राजमार्ग बन गया है। चितंन करें कि संसार सागर के किनारे पर पहुंचने के पूर्व हमने कितनी लंबी यात्रा तय कर ली है। आज हम सबको जर...

आत्मा निज स्वरूप को भूल गयी है: गुरुदेव जयतिलक मुनिजी

यस यस जैन संघ नार्थ टाउन में चातुर्मासार्थ विराजित गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने बताया कि जिनवाणी कहती है:- आत्मा निज स्वरूप को भूल गयी है। अनादिकाल से आत्मा संसार में भ्रमण कर रही है संसार को ही अपना मान बैठी भगवान कहते हैं संसार आपका घर नही है ईंट पत्थर का मकान आपका घर नहीं है। यदि ये घर आपका होता तो इसे छोड़ कर जाना नही पड़ता है। अनन्त भवो तक आप कितने ही मकान, घर, झोपड़ो में रह चुके हो, बना चुके हो, पर वो घर कभी आपके नहीं हुए । भगवान कहते है ये चिन्तन करो कि आपका घर वास्तव में कौन सा है, आपको कहाँ जाना है, इसलिए सम्यक् ज्ञान के प्रकाश में अपने घर को जानने की कोशिश करो अपनी आत्मा की शक्ति को जानो। सम्यक्त्व प्रकाश वास्तविक प्रकाश है इसी प्रकाश में आप यर्थाथ को, सत्य को जान सकते हो। सभी गुरु, तीर्थकर हमें निज घर की स्मृति दिलाते है। आत्मा को जगाने का ज्ञान देते है। आत्मा को जगाने के लिए प्रयास आव...

धर्म उत्कृष्ट मंगल है: साध्वी मानवी श्री जी

आगरा में वर्षावास साध्वी मानवी श्री जी म० ने अपने प्रवचन मे फरमाया धम्मो मंगल मुक्किट्ठे । धर्म उत्कृष्ट मंगल है। धर्म की आराधना सम्यग् दर्शन, सम्यग् जान और सम्यगू चारित्र से की जा सकती है। सम्यग् दर्शन उसकी नीवं है पाया है। जिस मकान की नीव मजबूत होती है उसको गिरने का डर नही रहता है।  यदि नींव ही कमजोर हो तो मकान भी कमजोर ही है। इसी तरह सम्यग् दर्शन अगर शुद्ध रहता है। इसी रहा तो धर्म की आराधना भी शुद्ध रूपसे की जा सकेगी।

धर्म के कार्य में संलग्न रहने वाले को जागृत रहना अच्छा लगता है: दर्शन मुनिजी मासा

सौभाग्य प्रकाश संयम सवर्णोत्सव चातुर्मास खाचरोद पुज्य की दर्शन मुनिजी मासा जीव 9 प्रकार से दर्शनावर्णीय कर्म भोगता है। 1 निद्रा- 2 निद्रा-निद्रा 3 प्रचला -बैठे-२ नींद लेना। जो पाप की क्रिया में संलग्न रहता है उनका सोना अच्छा है , धर्म के कार्य में संलग्न रहता है उसका जागृत रहना अच्छा ! जयंती श्राविका ने भगवान से प्रश्न किया ? *जीव क्यों किस कारण से भारी होता है किस कारण हल्का होता है?* जो 18 पाप का सेवन करता है वह जीव भारी हो जाता है जी 18 पाप स्थान से छुटजाता है, निवृत्त हो जाते है तो जीव हलका हो जाता है।  जीव को संथारे के पहले 18 पाप का त्याग कराया जाता है दर्शनावर्णीय कर्म उदय होता है तो नींद आती है। त्याग का अनुमोदन करता है जीव कर्म की *निर्जरा* करता है और पाप का अनुमोदन करना की कर्म का *बंधन* कराता है। *अनुमोदन* करके कर्म बांध लेते हैं। हम पाप में घुमते रहते है सलग्नन रहते है, अपने 18...

हर पल परमात्मा के अनंत उपकारों का स्मरण करो: साध्वी नूतन प्रभाश्री जी

साध्वी जी ने बताया- बहुमूल्य जीवन हमें परमात्मा की अनुकम्पा से मिला है शिवपुरी। पोषद भवन में पांच जैन साध्वियों के चातुर्मास के कारण जिन वाणी की वर्षा हो रही है। आज महावीर दरबार में जैन साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने परमात्मा के हम पर अनंत उपकारों की याद दिलाई और कहा कि प्रतिदिन सुबह उठकर सबसे पहले परमात्मा को जीवन देने के लिए धन्यवाद देना चाहिए। उनकी बात को आगे बढ़ाते हुए साध्वी वंदनाश्री जी ने भजन प्रस्तुत किया कि तूने मेरे प्रभु जी सब कुछ दिया है, तेरा शुक्रिया, तेरा शुक्रिया…। धर्मसभा में साध्वी जयश्री जी ने शास्त्र वाचन करते हुए भगवान महावीर के आदर्शों और सिद्धांतों को बताते हुए कहा कि आध्यात्मिकता की यात्रा में व्यक्ति का निर्माण होना चाहिए और यही निर्माण एक दिन निर्वाण की ओर ले जाएगा। साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने भगवान के उपकारों का स्मरण करते हुए बताया कि यह बहुमूल्य मानव जीवन हम...

शांति चाहिए तो अशांति से बचीये: उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना जी

हमारे भाईन्दर में विराजीत उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना जी गुरुणी मैया एवं आदि जाना 7 साता पूर्वक विराजमान है। वह रोज हमें प्रवचन के माध्यम से नित नयी वाणी सुनाते हैं। वह इस प्रकार हैं बंधुओं जैसे शांति चाहिए तो अशांति से बचीये। अगर आप वाकई में प्रसन्नता और शांति पाना चाहते हैं तो मन को बदले मन की दिशा और परिणामों को बदले जीवन में जो मिले उसे प्रेम से स्वीकार करें। एक व्यक्ति मिठाई की दुकान पर गया और पूछा तुम्हारे यहां सबसे अच्छी मिठाई कौन सी है। हलवाई ने अपने यहां की हर मिठाई को एक दूसरे से अच्छा बताया उसने कहा मैं तो यह जानता हूं कि कौन सी मिठाई सबसे अच्छी है। महाशय मेरी दुकान की हर मिठाई सबसे अच्छी है हलवाई ने कहा जिंदगी भी एक दुकान की तरह है जिसकी हर चीज अच्छी है जो भी जैसा मिल रहा है। उससे कैसा गिला किसी शिकायत तुम दुखी हो क्योंकि तुम जो चाहते हो पसंद करते हो, वह तुम्हें नह...

जब तक इंसान को बोलने की कला ना आए तब तक इंसान दुनिया में स्थापित नहीं हो सकता: उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना जी

हमारे भाईन्दर में विराजीत उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना जी गुरुणी मैया साता पूर्वक विराजमान है। वह रोज हमें प्रवचन के माध्यम से नित नयी वाणी सुनाते हैं। वह इस प्रकार हैं बंधुओं जैसे कि आज आचार्य सम्राट श्रीआनंद ऋषि जी महाराज साहब के जीवन चरित्र के बारे में बताया। उनकी पुण्यतिथि के उपलक्ष में 50 बैले एवं तेले की तपस्या हुई। मैं सभी का सम्मान किया गया और प्रश्न मंच भी रखा गया उसमें सो लेडीस ने पार्टिसिपेट किया एवं धर्म ज्ञान की गंगा बह रही है हमारे गुरु णीजी के आशीर्वाद से इंसान की जिंदगी में लोकप्रियता पाने का रिश्तो को बनाने का समाज के नवनिर्माण का अगर कोई आधार है तो वह इंसान का जवाब ही है। जब तक इंसान को बोलने की कला ना आए तब तक इंसान दुनिया में स्थापित नहीं हो सकता। तैरने की कला सिख कर डूबता हुआ तो बच सकता है खाना बनाना सीख कर कुकिग से बच सकता है पर बोलने की कला सीख पूरी दुनिय...

भोजन को जहर या अमृत तुल्य बनाना हमारे हाथ में : साध्वी नूतन प्रभाश्री जी

साध्वी जयश्री जी ने बताया कि ज्ञान प्राप्त करने के लिए कुछ विशिष्ट गुणों का होना आवश्यक शिवपुरी। मनुष्य पंचेंद्रिय जीव है। हम हिंसा से कितना भी बचें, लेकिन भोजन बनाने के लिए एकेन्द्रिय जीवों की हिंसा होती ही है। क्योंकि पानी, हवा, अग्रि, वनस्पति सभी एकेन्द्रिय जीव हैं। लेकिन हिंसा से बने भोजन को अमृत बनाना हमारे हाथ में है। हम चाहें तो भोजन को जहर भी बना सकते हैं। उक्त उद्गार प्रसिद्ध जैन साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने पोषद भवन में आयोजित धर्मसभा में व्यक्त किए। धर्मसभा में साध्वी जयश्री जी ने बताया कि ज्ञान प्राप्त करने के लिए विनम्रता, सरलता, सज्जनता और निष्कपटता होना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने यह भी बताया कि किन-किन व्यक्तियों को दीक्षा नहीं दी जा सकती। साध्वी वंदनाश्री जी ने सभा के शुभारंभ में सुंदर भजन का गायन कर माहौल को धर्म रस से सराबोर कर दिया। धर्मसभा में साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने...

     जो काम करना है वह इसी भव में कर लो: आगमश्रीजी म.सा.

श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन संघ कम्मनहल्ली में प.पू. आगमश्रीजी म.सा. ने बताया, हे भक्त तुझे जो काम करना है वह इसी भव में कर लो। इस जीवन में करने जैसे पांच कार्य हैं। (1) एक जो करना है वह आज ही कर लो कल पर मत डालो (2) जो भी करना है वह अच्छा ही करना है (3) कार्य करने के लिए देर करना नहीं (4) जो भी करना है वह जीते जी ही कर लो (5) जो भी कार्य हाथ में लिया है उसे तुरंत पूरा कर लो। इसी में ही मानव भव की सार्थकता है। केशी श्रमण तथा गौतम स्वामी के माध्यम से बताया गया।साथ ही वेश की वफादारी हो तो वह कभी भी भावों से चुकता नहीं है। टीना हेमंत कोठारी के दस के पूर का अध्यक्ष विजयराज चुत्तर ने स्वागत किया। संचालन मंत्री हस्तीमल बाफना ने किया।

तप से ही विकारों को शान्त किया जा सकता है: जयतिलक मुनिजी

नार्थ टाउन में चातुर्मासार्थ विराजित गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में फरमाया कि आत्म बन्धुओ आत्मा में अनन्त बल है उसी प्रकार पुद्‌गल में भी अनन्त बल है । दोनों का सदुपयोग किया जाये तो ये बल सार्थक होता है। दस बल प्राण है और उनका सदुपयोग करने के लिए तप आवश्यक है यदि तप नही जाये तो इन्द्रियों के दस बल प्राण में विकार उत्पन्न हो जाते है। तप से ही विकारों को शान्त किया जा सकता है। मक्खन को जैसे तपा कर घी बना दिया जाता। यदि नही तपाया तो उसमें कीड़े उत्पन्न हो जाते। वैसे ही यदि तप से शरीर को नही तपाया तो बल प्राणों में विकार उत्पन्न हो जाते है। जैसे -2 तप बढ़ता मन शान्त होता जाता है। शरीर क्षीण हो जाता है, ईन्द्रयाँ भी क्षीण हो जाती है। इन्द्रियों के क्षीष होने से उनमें विकार भी नही उत्पन्न होते है। तपस्या है तो ब्रह्मचर्य व्रत भी पालन किया जा सकता है। इसलिए जिनेश्वर भगवान ने विगय दूध, दही, घी...

मन को कैसे जीतें: साध्वी सोनाक्षी

मन और चित्त- मन और चित्त में अन्तर है। चित्त का सम्बन्ध हमारी चेतना से है । चित्त ज्ञान तंत्र है और मन क्रिया तंत्र है चेत्त स्वामी है और मन उसका सेवक मन बहुत चंचल पवन से भी तेज गतिशील एवं विद्युत से भी तीव्र है। तो अपने मन को अपने वश में रखो अवश्य की आत्मा का कल्याण होंगा। मधुर भाषिणी साध्वी मानवी जी म. की सुशिष्या साध्वी सोनाक्षी

मनुष्य माया से दूर होने पर अपनी आत्मा को मोक्षगामी बना सकता है: साध्वी धर्मप्रभा

Sagevaani.com @चैन्नई। माया से दूर रहने पर आत्मा मोक्षगामी बन सकती है। मंगलवार साहूकार पेठ के मरूधर केसरी दरबार मे विशाल धर्मसभा में साध्वी धर्मप्रभा ने श्रध्दालूओं को संबोधित करते हुए कहा कि संसार का दूसरा नाम ही माया है। वस्तुत: यह माया इस जीव को हर रोज नाच- नचाती है, और मानव आत्मबोध की ओर जाता नहीं, हमेशा क्षणभंगुर संसार में माया के रत मे लगा रहता हैं। जब तक मनुष्य माया मे लगा रहेगा तो संसार मे अनंत बार माँ कि गृभ में आयेगा। मनुष्य छल- कपट और रिश्वत देकर दूसरों कि नजरों मे धूल झोंक सकता है,लेकिन परमात्मा की नजरों मे नही,इस संसार मे कौनसा प्राणी क्या कर रहा,यह सब ईश्वर जानता है। मनुष्य भगवान को धोका नही दे सकता है। क्योंकि ईश्वर कि एक नही लाखों आंखें है। भगवान के दरबार में सबका खाता है। मनुष्य ने माया का विर्जन कर दिया तो निग्रंथ बन सकता है। माया व्यापक अविद्या है, जिसमें सभी जीव फंसे हु...

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