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जैन धर्म एक स्वभाविक धर्म है: जयतिलक मुनिजी

यस यस जैन संघ नार्थ टाउन में गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में फरमाया कि जैन धर्म एक स्वभाविक धर्म है जिसमे कोई आडम्बर नहीं है इसलिये जैन धर्म को प्राकृतिक धर्म भी कहा है इस धर्म का उदेश्य स्वयं सुख का भोग करना व दुसरों का कल्याण करना है, जो भी इस धर्म का पालन करेंगा उसका सदा मंगल ही होगा। जब तक जीव 18 पाप का त्याग नही करता तब तक धर्म की शुरूआत नही होती हैं । जैन धर्म मे सभी दुखों का निवारण हैl इसलिये इस धर्म को आचरण में लाना होगा। चाहे दुखों का पहाड़ भी टूट जाये लेकिन जैन धर्म मे निवारण हैं । आगे बताया चाहे जीव कितना भी धर्म करें पाप कर्मो का उदय तो आता हैं। तीर्थकंर भी पाप कर्म का मन-वचन-काया से स्थिर रहकर कर्मो को भोगते है । उदय आने से सेठ का उदाहरण देते हुए बताया सेठज़ी धर्म ध्यान बहुत करते लेकीन काम – काज नहीं करते। बैठे- 2 धन भी खत्म होने लगा, सेठानी ने कहा आप मेरे पीहर जाकर आव...

पुण्य करना सरल है, पर पाप को छोड़ना कठिन है : देवेंद्रसागरसूरि

श्री सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन जैन संघ में प्रवचन देते हुए पूज्य आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने कहा कि उत्तम आचरण अर्थात सद‌्गुण-सदाचार को ही धर्म कहा जाता है। धर्म के आचरण के द्वारा जो ऐहिक या पारलौकिक सुख की चाह करते हैं उनकी इच्छाओं की पूर्ति हो जाती है। इसी के साथ-साथ हमें यह भी जान लेना चाहिए कि दुर्गुण-दुराचारों से हमारा पतन होता है और सद‌्गुण-सदाचारों में हमारा हित है। अंत:करण में दो वृत्तियां हैं- एक मन रूप और दूसरी बुद्धि रूप। सामान्यत: मन को दुर्गुण-दुराचार स्वभाव से ही प्रिय लगते हैं। बुद्धि को ये खराब लगते हैं। इसलिए बुद्धि उसका विरोध करती है। मन और बुद्धि के झगड़े में अधिकतर मन जीत जाता है। इसलिए मन पर विवेक का नियंत्रण लगा कर उसे समझाना चाहिए। अगर मन में यह बात ठीक से बैठ जाएगी कि खराब आचरण करने में मेरा पतन है तो फिर वह ऐसा आचरण नहीं कराएगा। एक बीमार व्यक्ति को वैद्य यह कहे कि...

चेतना की शरीर को पकड़ने की आकांक्षा छूटे वह तप है कायोत्सर्ग: साध्वी नूतन प्रभाश्री

जैन साध्वी ने बताया कि कायोत्सर्गर् से समाप्त होती है मन की चंचलता Sagevaani.com @शिवपुरी। जीते जी एक तरह से मृत्यु को देखना कायोत्सर्ग है। मृत्यु में जो घटना घटित होती है वहीं ध्यान में भी घटित होती है। कायोत्सर्ग में मृत्यु के समान ही शरीर से चेतना की पकड़ छूटती है औैर चेतना तथा मन की शरीर को पकड़ने की आकांक्षा समाप्त होती है, उक्त उदगार प्रसिद्ध जैन साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने कमला भवन में आयोजित विशाल धर्मसभा में व्यक्त किए। भगवान महावीर द्वारा बताए गए 12 तपों की व्याख्या कर रही है आज उन्होंने 12 वें और अंतिम तप कायोत्सर्ग को बड़ा तप बताते हुए कहा कि इससे आप अपनी चेतना को जान सकते हैं, पहचान सकते हैं। साध्वी पूनम श्री जी ने अपने उदबोधन में कहा कि जब तक आप अपने जीवन में पाप रूपी डोरी को नहीं तोड़ोगे तब तक अपने लक्ष्य की ओर नहीं बढ़ सकते हैं। उन्होंने धर्मप्रेमियों को अपनी वाणी का सदुपयोग करन...

मिश्रीमलजी म.सा. व रूपचन्दजी म.सा. की जन्म जयन्ति नार्थ टाउन में मनाई गई 

पूज्य गुरुदेव मरूधर केसरी मिश्रीमलजी म.सा. व लोकमान्य संत पूज्य गुरुदेव श्री रूपचन्दजी म.सा. की जन्म जयन्ति नार्थ टाउन में मनाई गई श्री एस.एस. जैन संघ, नार्थ टाउन द्वारा धर्म नगरी नार्थ टाउन बिन्नी मिल में पूज्य गुरुदेव मरूधर केसरी 1008 श्री मिश्रीमलजी म.सा. की 133 में जन्म जयंति व लोकमान्य संत शेरे राजस्थान, पूज्य गुरुदेव श्री रूपचन्दजी म.सा. रजत’ की 96 वीं जन्म जयन्ति दिनांक 01.09.2023, शुक्रवार को संघ भवन, नार्थ टाउन में मनाई गई। जिनशासन प्रभावक, परम पूज्य गुरुदेव श्री जयतिलकजी म.सा. ‘लघु’ तथा निश्रा प्रदाता शासन सौभाग्पविलक श्री देवेन्द्रसागरसूरिश्वरजी म. सा. का पावन सान्निध्य रहा। गुरूद्वय जन्म महोत्सव के संपूर्ण लाभार्थी श्री गुरु गणेश मरूधर केसरी रूप रजत के परम गुरूभक्त परिवार, नार्थ टाउन थे। उनके परिवार का अभिनंदन किया गया। समारोह के अध्यक्ष प्रमुख समाज सेवी, राजस...

अपेक्षा का भी अपना एक विज्ञान है: उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया

हमारे भाईन्दर में विराजीत उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया आदि ठाणा 7 साता पूर्वक विराजमान हैl वह रोज हमें प्रवचन के माध्यम से नित नयी वाणी सुनाते हैं, वह इस प्रकार हैंl बंधुओं जैसे कि क्रोध पर काबू अपेक्षा और अपेक्षा का भी अपना एक विज्ञान हैl अगर आपने ध्यान दिया हो तो देखा होगा कि यदि कोई अपरिचित व्यक्ति आपकी अपेक्षा करें तो आपको गुस्सा नहीं आता पर अगर खास परिचित आदमी आपकी अपेक्षा करें तो आप तत्काल क्रोधित हो उठते हैंl हम लोग यह अपेक्षा पाल लेते हैं कि किसी भी जगह में हमारा रिश्तेदार है जब भी हम कहीं जाएंगे तो वह हमें पूरी जगह घूमायेगाl सहयोग से तुम उनके घर चले गए घूमने तो दूर की बात वह आपके पास पूरा बेठ भी नहीं पाया क्योंकि वह अपने ऑफिस के कार्य में उलझा हुआ था उसके इस व्यवहार ने आपको दुखी और क्रोधित कर दियाl अपेक्षित अपेक्षा हमेशा गुस्से का नियमित बनते हैं, अच्छा ह...

आत्मा का मिलन वह अनंत ज्ञान का हिस्सा है: डॉ. वैभवरत्नविजयजी

     स्थल: श्री राजेन्द्र भवन चेन्नई  विश्व वंदनीय प्रभु श्रीमद् विजय राजेंद्र सुरीश्वरजी महाराज साहब के प्रशिष्यरत्न राष्ट्रसंत, उग्र विहारी श्रीमद् विजय जयंतसेनसुरीश्वरजी म.सा.के कृपापात्र सुशिष्यरत्न श्रुतप्रभावक मुनिप्रवर श्री डॉ. वैभवरत्नविजयजी म.सा. के प्रवचन के अंश    🪔 *विषय : अभिधान राजेंद्र कोष भाग 7*🪔 ~ हमारा जीवन परमात्मा के ऐश्वर्य को देखकर स्वयं के ऐश्वर्य को प्रकट करने के लिए ही है। ~ भक्त को यदि भक्ति की योग्य जानकारी (ज्ञान) और स्वयं की श्रेष्ठ योग्यता यदि है तो भक्ति का बल अवश्य भक्त को मिलता है। ~ भक्त यदि प्रभु को सम्यक् रूप से पहचानता है तो ही प्रभु को मन, वचन, काया का पूर्ण समर्पण करने के लिए पराक्रम प्रकट कर सकता है, और करता ही है। ~ आत्मा का मिलन वह अनंत ज्ञान का हिस्सा है और भीतर की यात्रा स्वयं की सम्यक् ज्ञान दशा से ही प्रारंभ होती है। ~ जब प्रभु का मिलन होता है ...

स्वास्थ्य जांच शिविर में 381 लोगों की जांच

    जैतारण पट्टी ओसवाल संघ चेन्नई (जेपीओएस) के तत्वावधान में 25 से 31 अगस्त तक सात दिवसीय मास्टर स्वास्थ्य जांच शिविर एवं कैंसर जांच शिविर का आयोजन राजस्थान यूथ एसोसिएशन ‘काॅस्मो’ फाउंडेशन की प्रमुख ईकाई शांतिदेवी जवाहरमल चंदन डे केयर एंड डायग्नोसिस सेंटर एवं एमकेके आरवाइए कॉस्मो कैंसर डिटेक्शन सेंटर में किया गया। संघ के सदस्यों एवं उनके परिजनों के लिए आयोजित इस शिविर में कुल 381 लोगों की मास्टर स्वास्थ्य जांच और 156 महिलाओं की कैंसर जांच हुई। कैंसर जांच में अलेक्सा कैंसर केयर के चिकित्सकों का सहयोग रहा। यह शिविर ‘राजस्थान रत्न’ सुभाषचंद रांका परिवार के आर्थिक सौजन्य से आयोजित हुआ। कार्यक्रम में नवकारसी का लाभ मूलचंद पवनकुमार दर्शन सिंघवी परिवार ने लिया। संघ के स्वास्थ्य जांच शिविर के चेयरमैन निर्मल रांका ने बताया कि शिविर का मुख्य उदेश्य सदस्यों में स्वास्थ्य के प्...

धर्म करने के लिए भी सकारात्मक सोच होनी चाहिए, उससे सकारात्मक परिणाम मिलेंगे: आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीजी

किलपाॅक श्वेताम्बर मूर्तिपूजक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्य केशरसूरीजी समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी ने प्रवचन में कहा जिस तरह पूरा तालाब पानी से भरा है, पूरा घर भोजन से भरा हुआ है, सामने कल्पवृक्ष है, फिर भी व्यक्ति भूखा प्यासा है। उसी तरह धर्म की सामग्री भरपूर मिली है, गुरु का सानिध्य मिला है, फिर भी हम उसका फायदा नहीं उठा सकते। इसका प्रमुख कारण यह सोच है कि हम धर्म तो भविष्य में करेंगे। उन्होंने कहा व्यक्ति काल का विजेता बनना चाहता है। काल पर आज तक कोई विजय नहीं पा सका। मृत्यु आखिर में आत्मा व शरीर का बंधन तो तोड़ती ही है। जो व्यक्ति किसी कारण धर्म को आगे ढेलता है, वह पुण्य की लक्ष्मी को धक्का लगाता है। वर्तमान में पुण्यों का संचय करने की बहुत कुछ सामग्री हमारे पास है। उन्होंने कहा इस तिमिराच्छादित विश्व में मृत्यु अवश्यंभावी है। वह कोई भी क्षण आ सकती ...

रुचि से धार्मिक अनुष्ठान के लिए लगाये समय : जिनमणिप्रभसूरिश्वरजी

समय प्रबंधन के महत्व को समझाते हुए सामाजिक, अध्यात्म कार्यों में संयोजक करने की दी प्रेरणा Sagevaani.com @चेन्नई; श्री मुनिसुव्रत जिनकुशल जैन ट्रस्ट के तत्वावधान में श्री सुधर्मा वाटिका, गौतम किरण परिसर, वेपेरी में शासनोत्कर्ष वर्षावास में उत्तराध्यन सूत्र के सातवें अध्ययन के विवेचन में धर्मपरिषद् को सम्बोधित करते हुए गच्छाधिपति आचार्य भगवंत जिनमणिप्रभसूरीश्वर म. ने कहा कि मिथ्यात्वी का खानपान, रहनसहन सब राग द्वेष युक्त होता है, वहीं सम्यक्त्वी का खानपान, रहनसहन इत्यादि हर क्रिया यतनापूर्वक, सावधानी से होती है, धर्म में रत रहता है। कुछेक प्राणी वर्तमान में मिल रही भौतिक सुखों को देख प्रसन्न हो जाते है लेकिन यह भान भूल जाते है कि ये सुख सुविधाएं ही हमें डुबाने वाली होती है। उसी तरह हमारा भी यह छोटा सा जन्म है, कब आयुष्य पूर्ण हो जाये, हमें मालूम नहीं। अतः जो समय हमारे पास है उसका सदुपयोग कर...

धर्म का स्थान कठिन अवश्य होता है लेकिन उसका परिणाम अच्छा आता है: गच्छाधिपति उदयप्रभसूरिजी

किलपाॅक श्वेताम्बर मूर्तिपूजक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्यश्री केशरसूरीश्वरजी महाराज के समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी म.सा. ने प्रवचन में कहा नीम का पेड़ घी, दूध, शेलड़ी रस से सींचो, फिर भी कभी मधुरता नहीं देता। लहसुन पर कर्पूर का छंटकाव कभी सुगंध नहीं देता। वैसे ही कुगुरु के पास उपासना कैसी भी करो, उसका कोई प्रभाव नहीं होता। ज्ञानी कहते हैं यदि आप धर्म का उपयोग नीजि सुखों के लिए करो, वह समझ में आता है। लेकिन अधर्म का उपयोग धर्म के लिए करो तो वह दुष्परिणाम देता है। ऐसा करने वाले लोग जो छाप छोड़ते हैं, वह थोड़े दिन अच्छा लगेगा। उसकी प्रतिक्रिया उनके खुद के ऊपर होती है क्योंकि धर्म के नाम से मैली विद्याओं का प्रयोग, वशीकरण इत्यादि कुगुरु के लक्षण है। आखिरकार इन मैली विद्याओं की विशेषकर मृत्यु के समय उसकी पीड़ा अवश्य होती है। धर्म के विषय में चारित्रिक आत्म...

व्यक्ति की प्रतिष्ठा उसके कार्यों से बनती है, जो प्रदर्शित किया जाए उससे नहीं : देवेंद्रसागरसूरि

श्री सुमतिवल्लभ जैन संघ बिन्नी में आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने धर्म प्रवचन देते हुए कहा कि प्रशंसा की चाहत सांसारिक कष्टों का मूल है। इसकी चरम स्थिति आत्ममुग्धता गंभीर मानसिक विकृति है, जिसका उपचार जरूरी है। इसीलिए प्रतिफल की इच्छा रखे बिना अपने कर्तव्य में चित्त लगाएं। चित्त कार्य पर रहेगा तो नाम की इच्छा ही न रहेगी। चित्त कार्य पर रहे या प्रतिफल पर, यह चयन अहम है क्योंकि दोनों की विपरीत परिणतियां हैं। मोटे तौर पर मनुष्यों के दो प्रकार हैं- कार्य करने वाले और श्रेय बटोरने वाले। पहली श्रेणी में सीमित व्यक्ति हैं, पर वे कर्मठ, अपेक्षाकृत संतुष्ट, आत्मवश्विासी और भवष्यि के प्रति आश्वस्त हैं। अधिसंख्य दूसरी श्रेणी में हैं। वे भीतर से क्षीण और भविष्य के प्रति आशंकित रहते हैं। आचार्य श्री ने आगे कहा कि कि प्रशंसा की इच्छाएं मनुष्य को अनिवार्यतः दुर्गति की ओर ले जाती हैं। व्यक्ति की प्रतिष...

नार्थ टाउन में रक्षाबंधन मनाया गया 

रक्षाबंधन पर प्रवचन देते हुए नार्थ टाउन में गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने बताया कि धर्म रक्षित रक्षितः धर्म ही ऐसा एक साधन है जो सम्पूर्ण जीवों की रक्षा है करते हुए अभयदान दे सकता है यदि संसार से धर्म को दूर कर दिया जाये तो संसार से शान्ती, निर्भयता, समृद्धि चली जायेगी। धर्म निशस्त्र है फिर भी धर्म कहता है स्वयं भी सुरक्षित रहो और दूसरों की भी रक्षा करो। जो आत्मा अधर्म की ओर कदम बढ़ाती है वे स्वयं भी भयभीत रहती है और दूसरों को भी त्रस्त करती है जो धर्म को धर्म के सिद्धान्त को जीवन में धारण कर लेता है उसका मरन भी सुखद हो जाता है जन्म मरण के परिभ्रमण से मुक्ति दिलाने में धर्म ही सक्षम है। नरक में धर्म न होने के नाते नारकी प्रतिपल भयभीत रहते है। एक नारकी दूसरे नारकी को कष्ट देने के लिए मारकाट करते रहते हैं नरक में अत्यन्त वेदना पाते है और वेदना से बचने के लिए वे निरन्तर भागो – 2 कहते रहते है।...

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