स्थल: श्री राजेन्द्र भवन चेन्नई विश्व वंदनीय प्रभु श्रीमद् विजय राजेंद्र सुरीश्वरजी महाराज साहब के प्रशिष्यरत्न राष्ट्रसंत, संघ एकता शिल्पी श्रीमद् विजय जयंतसेनसुरीश्वरजी म.सा.के कृपापात्र सुशिष्यरत्न श्रुतप्रभावक मुनिप्रवर श्री डॉ. वैभवरत्नविजयजी म.सा. के प्रवचन के अंश 🪔 *विषय : सर्वश्रेष्ठ तेजोमय तप धर्म*🪔 ~ हमारे जीवन में धर्म का आकर्षण नहीं किंतु धर्म की प्रभावक्ता होनी ही चाहिए। ~ संसार के सभी व्यवहार जीव को आकर्षित करके बंधन में ले जाता है लेकिन धर्म के सभी व्यवहार और ज्ञान जीव को प्रभावक बनाकर मुक्ति की ओर ले जाता है। ~ संसार जिस पल मिट गया भीतर से उसी क्षण परमात्मा प्रकट हो गए। ~ परमात्मा यानी मोह, माया के आकर्षण का पूर्ण विनाश। ~ जब परमात्मा की प्रभावक्ता का समयक् बोध होता है तब हमारे भीतर में रहा प्रभावक् चैतन्य भी प्रकट होता ही है क्योंकि परमात्मा पारसमणी तुल्य है। ~ जिस सा...
राजस्थान पत्रिका एवं एक्ष्नोरा इंटरनेशनल के संयुक्त तत्वावधान में चल रहे हरित प्रदेश अभियान द्वारा आज रक्षाबंधन के त्योहार के साथ पर्यावरण संरक्षण एवं पेड़ों की रक्षा केसे करनी इस का संदेश पेड़ के आकार की रंगोली बनाकर एक्ष्नोरा महिला विंग की सदस्यों ने एक अभियान शुरू कर दियाl महिला विंग की महा सचिव मंजू गांधी ने कहा कि हज़ारों बहनो ने अपने भाई को राखी बांध कर एक पौधा भी दिया और उन से कहा कि जेसे भाई बहन रक्षा की प्रतिज्ञा लेते हैं, उसी प्रकार दोनों मिलकर पर्यावरण संरक्षण एवं पेड़ों की रक्षा करने का भी प्रयास करे तो हर तरफ हरियाली एवं हरा भरा वातावरण हो सकता है। इस मौके पर एक्ष्नोरा नॉर्थ सचिव फतेहराज जैन ने कहा कि रक्षाबंधन के त्योहार को पेड़ों की रक्षा करने का प्रयास सराहनीय हैl इस अभियान में हज़ारों पेड़ लगाए जाएंगे और उनकी रक्षा भईया बहना ने मिलकर करने की प्रतीक्षा ली हैl बहुत सराहनीय ह...
Sagevaani.com @Chennai। धर्म की रक्षा का पर्व है रक्षा बंधन । बुधवार साहूकार पेठ श्री एस.एस.जैन भवन के मरूधर केसरी दरबार मे महासती धर्मप्रभा ने रक्षा बंधन पर श्रध्दांलूओ और रक्षा सूत्र बांधने वाले सभी भाई बहनों को महामंगल पाठ देतें हुए कहा कि यह पर्व अकेले भाई बहन का पर्व नहीं है। रक्षा सूत्र बांधकर हम धर्म की रक्षा का,राष्ट्र की रक्षा का,समाज की रक्षा का और सब जीवों की हम रक्षा का संकल्प लेते है। तो हमारा रक्षाबंधन मनाना सार्थक हो सकता है। आज का दिन सामान्य बंधन का दिन नहीं है, प्रेम के बंधन का दिन है। यह बंधन वात्सल्य का प्रतीक है। रक्षा-बंधन अर्थात् रक्षा के लिए बंधन,जो आजीवन चलता है।उत्साह के साथ यह बंधन होकर भी हमारी मुक्ति में सहायक है। क्योंकि यह प्राणी मात्र की रक्षा के लिए संकल्पित करने वाला बंधन है। रक्षाबंधन आज एक ओपचारिकता का बंधन बनकर रह गया है । मनुष्य बाहर से मधुर और भीतर से...
मरुधर केसरी श्री मिश्रीमलजी म. सा. की 133 वी जन्म जयंती एवं श्रमण संघीय वरिष्ठ प्रवर्तक श्री रूपचन्दजी म. सा. रजत के 96 वी जन्म जयंती नार्थ टाउन में मनाई जाएगी चेन्नई स्थित नॉर्थटाउन में मरुधर केसरी श्री मिश्रीमलजी म. सा. के 133 वें जन्म जयंती एवं लोकमान्य संत, श्रमण संघीय वरिष्ठ प्रवर्तक श्री रूपचन्दजी म. सा. रजत के 96 वें जन्म जयंती समारोह का आयोजन 1 सितंबर को किया जाएगा। गुरुद्वय पावन जन्मोत्सव श्री जयतिलकजी म.सा. लघु एवं निश्रा प्रदाता आचार्य श्री देवेंद्रसूरिश्वरजी म.सा. की पावन निश्रा में होगा। इस महोत्सव के संपूर्ण लाभार्थी श्री गुरु गणेश मरूधर केसरी रूप रजत के परम गुरुभक्त परिवार (टावर नं 33 फ्लैट नं 102) हैं। श्री एसएस जैन संघ नार्थ टाउन ने इस समारोह को लेकर गुरुभक्तों एवं श्रावक-श्राविकाओं से निवेदन किया है कि वे गुरुद्वय पावन जन्मोत्सव में शामिल होकर उस महापुरुष को नमन व स्मरण ...
🛕 *स्थल: श्री राजेन्द्र भवन चेन्नई* 🪷 विश्व वंदनीय प्रभु श्रीमद् विजय राजेंद्र सुरीश्वरजी महाराज साहब के प्रशिष्यरत्न राष्ट्रसंत, दीक्षा दाणेश्वरी श्रीमद् विजय जयंतसेनसुरीश्वरजी म.सा.के कृपापात्र सुशिष्यरत्न श्रुतप्रभावक मुनिप्रवर श्री डॉ. वैभवरत्नविजयजी म.सा. के प्रवचन के अंश 🪔 *विषय : परम सत्वशाली ज्ञान और चारित्रधर्म*🪔 ~ प्रभु के भक्त की भक्ति धारा इतनी श्रेष्ठ और अखंड होती है कि परमात्मा के मिलन की महक हर पल होती ही है। ~ धर्म क्रिया करने के बाद भी यदि जीव आर्त और रौद्र ध्यान में लीन रहता है या आसक्त रहता है तो वह जीव मारकर निश्चित रूप से तिर्यंच या नरक में जाता है। ~ जब संसार के राग द्वेष के भावों का अंत होता है तभी धर्मध्यान प्रारंभ होता है। ~ हमारे लिए महान परमात्मा है लेकिन परमात्मा के लिए महान धर्मतीर्थ है और धर्मतीर्थ की प्राप्ति धर्मध्यान से ही होती है। ~ ज्ञान यदि सम्य...
किलपाॅक श्वेताम्बर मूर्तिपूजक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्य केशरसूरीश्वरजी के समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी म. सा. ने देवशुद्धि अधिकार की विवेचना करते हुए कहा देव, गुरु और धर्म में सबसे प्रधान गुरुतत्व है। अरिहंत परमात्मा गुरुतत्व के निर्माता है। गुरुतत्व को परमात्व तत्व बनाने का काम भी अरिहंत करते हैं। धर्म का मार्ग बताने वाले गुरु हैं। गुरु की परीक्षा शिष्य को कभी नहीं करनी चाहिए, लेकिन गुरु का आचरण, क्रिया आदि का अवलोकन अवश्य करना चाहिए। सच्चे गुरु में आत्मसंयम, सदाचार एवं सम्यक् ज्ञान का सुंदर समन्वय होता है। ज्ञानी कहते हैं यदि धर्म के विषय में हमने मार खाई तो भव-भव पछताना पड़ेगा। गुरु आत्मकल्याण का कार्य करते हैं। गुरु में विवेक, औचित्य, परकल्याण आदि की भावना होती है। परमात्मा के शासन का आयोजन अद्भुत है। इस आयोजन के तहत हमें धर्म क्रियाओं का आनंद भर...
लौकोत्तर और लौकिक पर्वों को बताते हुए रक्षाबंधन पर्व मनाने को किया रेखांकित Sagevaani.com @चेन्नई; श्री मुनिसुव्रत जिनकुशल जैन ट्रस्ट के तत्वावधान में श्री सुधर्मा वाटिका, गौतम किरण परिसर, वेपेरी में शासनोत्कर्ष वर्षावास में रक्षाबंधन पर्व पर धर्मपरिषद् को सम्बोधित करते हुए गच्छाधिपति आचार्य भगवंत जिनमणिप्रभसूरीश्वर म. ने कहा कि रक्षाबंधन का पर्व प्रेम, पवित्रता, सुरक्षा का पर्व है। नर और नारी की पवित्रता के सम्बन्धों को स्थापित करने वाला पर्व है। राखी के कच्चे धागें में के बदले बहन उपहार, भेट की नहीं चाहती, रुपये, पैसे की परम्परा वर्तमान में चल रही है। अपितु बहन तो चाहती है कि भाई से सुरक्षा। इस दुनिया में अनेकों रिश्ते है। भाई बहन की जोड़ी अद्भुत होती है। यह जोड़ी पवित्र प्रेम की निशानी है। स्वाभाविक रूप से आज के दिन भाई और बहन दोनों को एक दूसरे की याद आती है। ◆ मुझे वहीं जलाएं जो राम हो व...
श्री सुमतिवल्लभ जैन संघ नोर्थटाउन में आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने रक्षावन्धन पर्व का आध्यात्मिक महत्व समझाते हुए कहा कि भारत वर्ष में प्राचीन काल से ही पर्वों का विशेष महत्व रहा है। आधुनिक प्रगति में जहां हमारा देश नई बुलंदियों को छू रहा है वही अपनी प्राचीन मान्यताओं को भी बड़ी सहजता से संजोए हुए हैं। श्रावणी पर्व पर मंत्रों से अभिमंत्रित किया जाने वाला कलावा मात्र तीन धागों का समूह ही नहीं है अपितु इस में आत्मरक्षा, धर्मरक्षा और राष्ट्ररक्षा के तीनों सूत्र संकल्पबद्ध होते हैं। प्राचीन मान्यताओं से इस पर्व को मानने वाले श्रद्धालू इस दिन भारत की महान परंपराओं का स्मरण करते हुए संकल्प करते हैं जिसे हेमाद्रि संकल्प अर्थात् हिमालय जैसा महान संकल्प का नाम दिया हुआ है। जिसमें सर्वप्रथम मनुष्य को नाना प्रकार के पाप, दुराचरण और समाज विरुद्ध कर्मों से दूर रहने तथा उनके प्रायश्चित् की बात कही...
गुरूभगवंतो की जन्मोत्सव के तृतीय दिवस पर 1500 जरूरतमंद भाई बहनों को अलग -अलग जगह पर और भोजन एवं वस्त्र प्रदान कियें गयें। Sagevaan.com @Chennai। मन पर विजय प्राप्त करने वाला मनुष्य जगत को जीत सकता है।मंगलवार साहूकार पेठ जैन भवन मे गुरूद्वय जन्मजयंती कार्यक्रम तृतीय दिवस महासती धर्मप्रभा ने श्रद्धालुओं को धर्म उपदेश प्रदान करतें हुए कहा कि जिसने मन को जीत लिया तो उसे सब कुछ मिल जाएगा। हमारा मन काबू मे नहीं हुआ तो हमारे जीवन मे कभी भी सुख नहीं आने वालें है। मन वश मे होने पर ही हमारे सारे दुखः खत्म हो सकते है। और हम जीवन में सुखो प्राप्त कर सकते है। लेकिन हमारे मन की गति सूर्य की किरणों से कहि लाख गुणा तीव्र है, जो हमारे मन को स्थिर नहीं होने देती है। अगर हम अभ्यास करे तो हम इस मन को शांत सकतें है, बस जरूरत है हमे इस मन पर अंकुश और वश करने की, नहीं तो यह हमारा मन हमारे जीवन का पतन करने मे ज्य...
यस यस जैन संघ नार्थ टाउन में चातुर्मासार्थ विराजित गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में फरमाया कि जैन धर्म में छोटी और बड़ी सभी क्रियाओं का महत्वपूर्ण स्थान है। जितना ज्यादा आप जैन धर्म को आचरन में लाओगे उतना ज्यादा सुखी होते जाओगे । क्योंकि जैन धर्म में ही ये निर्देश दिया गया है किसी भी जीव को मन, वचन और काया से कष्ट नहीं देना। जैन धर्म कहता है कि पल पल आप दूसरों को कष्ट नहीं दो, यदि आप किसी के लिए बाधा उत्पन्न नहीं करते तो आप के जीवन में भी बाधा नही आयेगी। जैन धर्म का अनुसरण करने से आप इस भव में भी सुखी होगे और परभव में भी सुखी होगे। अन्य धर्मो में विवेक शून्यता होने के कारण पापों के त्याग का निर्देश नहीं हैं परन्तु जैन धर्म में पापो के त्याग के साथ पाप त्याग की विधि व प्रत्याख्यान भी बताये गये है। जैन धर्म कहता है कि संसारी जीव मर्यादा कर के कम से कम पाप करते है। जीव को बड़े पाप तो स्मृति...
ईर्ष्या एक ऐसा शब्द है जो मानव के खुद के जीवन को तो तहस-नहस करता है औरों के जीवन में भी खलबली मचाता है। यदि आप किसी को सुख या खुशी नहीं दे सकते तो कम से कम दूसरों के सुख और खुशी देखकर जलिए मत। उपरोक्त बातें आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने सुमतिवल्लभ जैन संघ में प्रवचन देते हुए कही। वे आगे बोले कि यदि आपको खुश नहीं होना है न सही मत होइए खुश, किन्तु किसी की खुशियों को देखकर अपने आपको ईर्ष्या की आग में ना जलाएं। अक्सर समाज में देखा जाता है कि कोई आगे बढ़ रहा है, किसी की उन्नति हो रही है, नाम हो रहा है किसी का अच्छा हो रहा है तो अधिकांश लोग ऐसे देखने को मिलेंगे जो पहले यह सोचेंगे, कैसे आगे बढ़ते लोगों की राह का रोड़ा बना जाए। उनको कैसे नीचा दिखाया जाए। कैसे समाज में उनकी मजाक बने और कैसे उनकी खुशियां छीनी जाए। बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो किसी को आगे बढ़ता देख किसी की उन्नति होते देख आनंद का ...
साध्वी पूनमश्री जी ने बताया- धर्म पगड़ी नहीं जिसे मंदिर में पहन लो और दुकान में उतार दो शिवपुरी। पोषद भवन में प्रसिद्ध जैन साध्वी नूतन प्रभाश्री जी और साध्वी पूनमश्री जी अपने प्रवचनों में जीवन में धर्म की उपयोगिता को उदाहरणों सहित स्पष्ट कर रही हैं। साध्वी पूनमश्री जी बताती हैं कि धर्म से विमुख होना इंसान के दुख का एक मात्र कारण है। वहीं साध्वी नूतन प्रभाश्री जी कहती हैं कि धर्म एक मात्र शरण हैं जिसने धर्म की शरण स्वीकार कर ली उसे और किसी शरण की आवश्यकता नहीं है। साध्वी वंदनाश्री जी ने सुमधुर स्वर का गायन किया कि जगत में चिंता मिटी उसकी जिसने धर्म की शरण स्वीकार की…। साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने कहा कि दुख का एक मात्र कारण यह है कि हम सिर्फ शरीर और संसार में उलझे रहते हैं। यह बात ध्यान में नहीं रहती कि संसार के सारे संबंध तब तक हैं जब तक आत्मा इस शरीर के साथ है। आत्मा के अलग होते ही क...