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धर्म करने के लिए भी सकारात्मक सोच होनी चाहिए, उससे सकारात्मक परिणाम मिलेंगे: आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीजी

धर्म करने के लिए भी सकारात्मक सोच होनी चाहिए, उससे सकारात्मक परिणाम मिलेंगे: आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीजी

किलपाॅक श्वेताम्बर मूर्तिपूजक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्य केशरसूरीजी समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी ने प्रवचन में कहा जिस तरह पूरा तालाब पानी से भरा है, पूरा घर भोजन से भरा हुआ है, सामने कल्पवृक्ष है, फिर भी व्यक्ति भूखा प्यासा है।

उसी तरह धर्म की सामग्री भरपूर मिली है, गुरु का सानिध्य मिला है, फिर भी हम उसका फायदा नहीं उठा सकते। इसका प्रमुख कारण यह सोच है कि हम धर्म तो भविष्य में करेंगे। उन्होंने कहा व्यक्ति काल का विजेता बनना चाहता है। काल पर आज तक कोई विजय नहीं पा सका। मृत्यु आखिर में आत्मा व शरीर का बंधन तो तोड़ती ही है। जो व्यक्ति किसी कारण धर्म को आगे ढेलता है, वह पुण्य की लक्ष्मी को धक्का लगाता है। वर्तमान में पुण्यों का संचय करने की बहुत कुछ सामग्री हमारे पास है। उन्होंने कहा इस तिमिराच्छादित विश्व में मृत्यु अवश्यंभावी है। वह कोई भी क्षण आ सकती है। शास्त्रकार कहते हैं हम एक-एक क्षण मर रहे हैं। पल-पल यह भय रहता है कि मृत्यु आने वाली है। उन्होंने कहा हमारी आयुष्य घट रही है लेकिन पुण्य बढ़ रहा है कि घट रहा है, यह सोचना महत्वपूर्ण है। हम दिनोंदिन पुण्य को खर्च कर रहे हैं।

हम पुण्य घटाने का काम कर रहे हैं। हमारी इंद्रियां, मस्तिष्क सब अच्छे से काम कर रहे हैं। यदि हमारे आठों कर्म अच्छे हैं तो हमारे पुण्य अच्छे हैं। यदि हम पुण्य का सही इस्तेमाल करते हैं तो प्रभुभक्ति, प्रभु की अंगरचना, पूजा, जीवदया आदि करने होंगे लेकिन हमारा मन, शरीर की थोड़ी सी ही अशाता से हम धर्म में प्रमाद कर लेते हैं। धर्म करने के लिए भी सकारात्मक सोच होनी चाहिए, उससे सकारात्मक परिणाम मिलेंगे। कहते हैं जो क्रोध में खाना खाता है, वह पचता नहीं है, जल जाता है। सांसारिक सोता हुआ और संयमी जागता हुआ अच्छा लगता है, लेकिन संसारी जीव सोते-सोते भी एकेंद्रीय जीव की हिंसा करता है। एकेंद्रिय की विराधना में पंचेेंद्रीय की हिंसा भी लग सकती है। हम रात को भी जीवों की विराधना करते हुए सोते हैं। उन्होंने कहा निमित्त खराब चीज होती है। जीवन में मन भरोसा करने लायक नहीं है।

व्यक्ति ने शातावेदनीय का इन्वेस्टमेंट करते हुए तप कर रहे हैं, उनकी अनुमोदना बार-बार करनी चाहिए। उन्होंने कहा धर्म सगाई, रिश्तों से नहीं होता, धर्म श्रद्धा व सद्भाव से होता है। ज्ञानी कहते हैं तपस्वी का बहुमान नहीं करते तो सम्यक दर्शन का दोष लगता है। भद्र तप जैसे सामूहिक तप तो अनेक लोगों का तारकतत्व है। ऐसे उत्तम तत्व को हमें सेलिब्रेट करना चाहिए। जैन धर्म रात्रि भोजन, कंदमूल आदि के त्याग की प्रेरणा देता है। दुनिया में ऐसा कोई धर्म नहीं है जो ऐसी प्रेरणा देता है। जैन धर्म में हम पर्व मनाते हैं, अन्य धर्म पर्वों को त्यौहार के रूप में मनाते हैं।

उन्होंने कहा प्रभु को देखकर आनंद आता है, वह सम्यक दर्शन तो है ही, प्रभु की भक्ति करने वाले भक्तों को देखकर भी आनंद आना चाहिए। प्रवचन के दौरान भारतीय जैन संगटना के सदस्यों ने पानी की बचत के बारे में प्रस्तुति देते हुए कहा हम जैन धर्म एवं साधु संतों के माध्यम से यह बात विश्व तक ले जाना चाहते हैं। आज पूरा विश्व पानी की समस्या से जूझ रहा है, लेकिन इसकी कीमत कोई नहीं समझता। कहीं-कहीं पानी तो बहता है, लेकिन आंखों से। यह समस्या किसी एक की नहीं है। ‘पानी फाउंडेशन’ के साथ मिलकर हमने यह कदम बढ़ाया। आचार्यश्री ने इस कार्यक्रम में अनुदान देने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा हमारी शक्ति का विनियोग करना चाहिए।

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