Share This Post

Featured News / ज्ञान वाणी

विचारों पर आहार का अत्यधिक प्रभाव: श्रीमद् विजय रत्नसेनसुरीश्वरजी म.सा

(no subject)

सुंदेशा मुथा जैन भवन कोंडितोप में जैनाचार्य श्रीमद् विजय रत्नसेनसुरीश्वरजी म.सा ने कहा कि:-
शरीर रूपी महल के चार स्तंभ हैं- आहार ,निद्रा ,श्रम और ब्रह्मचर्य। आहार की अनियमितता से शरीर का एक स्तंभ कमजोर हो जाता है । अत: शरीर और आत्मा के लिए हितकर भोजन ही करना चाहिए।

भूख भी एक प्रकार का रोग है । जैसे रोग होने पर दवाई की अपेक्षा रहती है , परंतु यदि कोई रोग के बिना भी दवाई लेवे, उसे मुर्ख माना जाता है वैसे ही भूख को शांत करने के लिए प्रमाण सर भोजन करना चाहिये ।


नमक और शक्कर को स्वास्थ्य का शत्रु माना है परंतु आज हमारा मन घर के सात्त्विक भोजन से संतुष्ट नहीं होता । स्वादिष्ट भोजन की चाहना में व्यक्ति अधिक प्रमाण में नमकीन और मिठाई का भोजन करता है ।रोटी के साथ नमक जरूरी है, परंतु वह प्रमाण सर होना चाहिए ।

मापसर नमक रोटी को स्वादिष्ट बनाता है । जबकि अधिक प्रमाण में नमक का प्रयोग आरोग्य को नुकसान ही पहुंचाता है। आजकल सामूहिक भोजन के प्रसंगों मे नमकीन वस्तुए खाने का शौक खूब बढ़ गया है तले हुए नमकीन पदार्थ स्वास्थ्य के लिए खूब हानिकारक है ।


हम जो आहार ग्रहण करते है, उसमें से मात्र हमारा शरीर ही नहीं बनता है | बल्कि हमारे मन के विचार भी बनते है। हमारे विचारों पर आहार का अत्याधिक प्रभाव है | अत: शारीरिक विकास , मानसिक निर्मलता और आत्मिक सौंदर्य को पाने के लिए आहार का विवेक अत्यंत अनिवार्य है। शारीरिक स्वास्थ्य की हानि की अपेक्षा विचारों का अधःपतन अत्यंत ही हानिकारक है।

इसी कारण पूर्वकालीन महापुरुषों ने आहार के विवेक पर अत्यधिक भार दिया है। सात्त्विक आहार से मन में सात्त्विक विचार पैदा होते हैं, और सात्त्विक विचारों से सदाचार का जन्म होता है | अतः विचार शुद्धि और आचार शुद्धि के लिए आहार शुद्धि पर भार देना अत्यंत आवश्यक है ।

Share This Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <s> <strike> <strong>

Skip to toolbar