(no subject)
बस मे चाहे कितने ही यात्री क्यो न हो यदि उसे चलाने वाला ड्रायवर न हो तो बस आगे नही बढ़ सकती हैं, उसी तरह शरीर रुपी बस में इन्द्रियाँ यात्री हैं, जबकि आत्मा ड्रायवर है, जैसे ड्रायवर के बिना बस किसी काम की नही हैं वैसे ही आत्मा के बिना शरीर भी कोई काम का नहीं ।
फिर भी शरीर को संभालने के लिए हम सारे प्रयत्न करते है , परंतु आत्मा को संभालना भूल जाते है। शरीर के सुख साधनों को संग्रह करने के लिए हम पूरा दिन बिता देते है और भूल जाते है की ये सारे सुख के साधनों को छोड़कर हमे परलोक में चले जाना है, संग्रह किया एक भी साधन साथ में नही चलेगा , परंतु इनके संग्रह में किया हुआ पाप “आत्मा” के साथ अवश्य ही चलेगा।
टैक्स की चोरी मे पकडे जाने पर हम रिश्वत देकर उस अफसर (अधिकारी) को खरीद सकते है, परंतु किये हुए पापों की सजा देनेवाली कर्मसत्ता को रिश्वत से नहीं खरीद सकते।
अपने जीवन के साथ देह व आत्मा का साह अस्तित्व है। आत्मा के आधार पर ही हमारे जीवन का मुलभुत अस्तित्व होने पर भी हम आत्मा को भूल जाते है और नाशवंत शरीर के सौन्दर्य का ज्ञान न हो तब तक देह के क्षणिक सौंदर्य के पीछे कोई पागल बने तो यह उसकी अज्ञानता है, परंतु आत्मा के शाश्वत सौंदर्य और शरीर के क्षणिक सौंदर्य की जानने समझने के बाद भी हमारी दौड यदि उन्हीं क्षण सुंदर और नाशवंत पदार्थो के प्रति रहे , तो इसमें हमारी बुद्धिमत्ता नही है।
तप से कठिन कर्मो का भी नाश होता है, कागज को फाडने मे कोई विशेष मेहनत नही करनी पडती । सत की कच्ची रस्सी को तोडने अल्प प्रयत्न करना पडता है। वृक्ष को तोडने के लिए कुल्हाडी के अनेक प्रहार करने पडते है, और पर्वत को फोडने के लिए भयंकर विस्फोटक की जरूरत पडती है |
तप से कठिन कर्मों का भी नाश हो जाता है अतः यथाशक्ति तपधर्म की आराधना करनी चाहिए । परंतु तप करने की हमारी शक्ति मर्यादित है । तप कराने का सुकृत ज्यादा कर सकते है परंतु उसकी भी एक सीमा है।जबकि अनुमोदना का क्षेत्र सबसे बड़ा है । जगत में होने वाले सारे सुकृतों में हम अनुमोदना के द्वारा भागीदारी कर सकते है ।
तप की अनुमोदना से हमारे जीवन में रही स्वाद की गुलामी और अंतरायों का नाश होता है ।आज यदि हमे तप करने की शक्ति न हो तो भी अनुमोदना करके उस तप की शक्ति प्राप्त कर सकते है अतः अनुमोदना के अवसर में हमें अधिक प्रयत्न करना चाहिए।