मनुष्य जन्म के इस छोटे समय को कल्याण, उर्धारोहण के लिए बताया पर्याप्त Sagevaani.com @चेन्नई; श्री मुनिसुव्रत जिनकुशल जैन ट्रस्ट के तत्वावधान में श्री सुधर्मा वाटिका, गौतम किरण परिसर, वेपेरी में शासनोत्कर्ष वर्षावास में उत्तराध्यन सूत्र के सातवें अध्ययन के विवेचन में धर्मपरिषद् को सम्बोधित करते हुए गच्छाधिपति आचार्य भगवंत जिनमणिप्रभसूरीश्वर म. ने कहा कि हम सौभाग्यशाली है कि हमें इस मनुष्य जन्म में समय मिला। अन्य पर्यायों, गतियों में जहां पर 10 हजार वर्ष से तो आयुष्य प्रारम्भ होता है, अधिक तो हमारी गणना के विषय से बहुत लम्बा होता है। फिर भी जो हमारा यह मनुष्य भव का छोटा सा 70-80 वर्षों का समय भी महत्वपूर्ण है। हम जो अल्प समय में कर सकते है, वह कार्य वे कर नहीं सकते। हमारे इस अल्पायुष्य के आगे उनका बड़ा आयुष्य फिका है। मनुष्य जन्म का यह समय कल्याण के लिए पर्याप्त है, उर्धारोहण के लिए पर्याप्त...
🛕 *स्थल: श्री राजेन्द्र भवन चेन्नई* 🪷 *विश्व वंदनीय प्रभु श्रीमद् विजय राजेंद्र सुरीश्वरजी महाराज साहब के प्रशिष्यरत्न राष्ट्रसंत, दीक्षा दाणेश्वरी श्रीमद् विजय जयंतसेनसुरीश्वरजी म.सा.के कृपापात्र सुशिष्यरत्न श्रुतप्रभावक मुनिप्रवर श्री डॉ. वैभवरत्नविजयजी म.सा.* के प्रवचन के अंश 🪔 *विषय : *🪔 ~ जो साधक ने धर्म किया है उसके जीवन में कर्मों का क्षय होता ही है। ~ जब तक स्वभाव का मूलभूत परिवर्तन नहीं तब तक धर्मी जीव को भी समाधि दुर्लभ। ~ यदि ज्ञान दशा बलवान है तो कठिन से कठिन कर्मों का क्षय होता ही है। ~ ज्ञानी भगवंत ने ज्ञान दशा की साधना से ही अनंत कर्मों का क्षय किया था तो हमारे जीवन में भी ज्ञान दशा से 100% कर्मों का क्षय होता ही है। ~ यदि साधक का सम्यक् दर्शन सक्रिय है तो वह और असमाधि में जा ही नहीं सकता। ~ हमें अन्य जीवों के दुखों को देखकर चिंता होती है लेकिन हमरे आत्मा कर्मों, दु...
यस यस जैन संघ नार्थ टाउन में चातुर्मासार्थ विराजित गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में फरमाया कि आत्म बंधुओ, कर्म सिद्धान्त का निरुपण जैन धर्म जैसा किया गया है वैसा अन्य कही देखने को नहीं मिलता। जो भी जीव पाता है वो कर्म के आधार पर ही पाता है यदि जीव अच्छे कर्म करता है तो उसे किसी प्रकार का भय नही रहता। वो जीव इस भव और पर भव दोनो में सुख समृद्धि सहज रूप से प्राप्त कर लेता है। जब पाप कर्म या अन्तराय कर्म का उदय होता है तो लाभ भी हानि में परिवर्तित हो जाता है। जीव दाने दाने को मोहताज हो जाता है इसलिए हर धर्म, हर दर्शन में उत्तम कर्म करने का निर्देश दिया गया है। कर्मों को भोगे बिना किसी भी जीव को चाहे चक्रवर्ती, वासुदेव या तीर्थकर हो छुटकारा नही मिलता। ये जानते हुए भी व्यक्ति कर्म करते हुए चिन्तन नही करता । यदि चिन्तन कर प्रवृत्ति करो तो कर्म बन्ध कम से कम होता है। भगवान तो कहते है कि ...
नोर्थटाउन बिन्नी में तपस्या की पूर्णाहुति निमित्त मोक्षदंड पूजा का आयोजन श्री सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन जैन श्वेतांबर मूर्तिपूजक संघ में आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी की निश्रा में मंगलवार को मोक्षदंड तप के आराधको द्वारा तप की पूर्णाहुति निमित्त मोक्ष दंड की पूजा की गई। सुबह सबसे पहले आचार्य श्री का मोक्ष दंड पूजा के लाभार्थी परिवार शिल्पा तरुण कुमारजी वेदमेहता के निवास स्थान पर पगलिया हुआ, मंगलाचरण व आशीर्वाद प्रदान करने के पश्चात लाभार्थी परिवार के निवासस्थान से बाजे गाजे के साथ सभी तपस्वी ने संघ भवन के लिये प्रस्थान किया, जहां पर मोक्ष दंड पूजा का आयोजन हुआ, चातुर्मास के दौरान आचार्य श्री के सान्निध्य में सवासो आराधको द्वारा एक दिन छोड़कर 22 उपवास की आराधना की गई, जो 44 वें दिन मंगलवार को पूर्ण हुई। आचार्य श्री ने धर्मोपदेश देते हुए कहा कि आदमी की जब बारात निकलती है तो नाते-रिश्तेदार आगे-आग...
शिक्षक दिवस पर शिक्षकों का किया गया सम्मान Sagevaani.com @शिवपुरी। जिस शिक्षा के साथ संस्कार नहीं वह जीवन में प्रकाश की ज्योति नहीं जगा सकती। जीवन को आनंद पूर्ण नहीं बना सकती। संस्कार रहित शिक्षा का कोई मूल्य नहींं हैं। उक्त उद्गार प्रसिद्ध जैन साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने स्थानीय कमला भवन में आयोजित शिक्षक सम्मान समारोह में व्यक्त किये। समारोह साध्वी रमणीक कुंवरजी की प्रेरणा से आयोजित इस समारोह में शिक्षकों का सम्मान किया गया। धर्म सभा में साध्वी पूनम श्री जी ने बताया कि त्याग में ही सच्चा सुख है। उन्होंने कहा कि धनवान बनने की बजाय आप धर्मवान बनने को प्राथमिकता दें। साध्वी वन्दना श्री जी ने प्रारम्भ में सुमधुर स्वर मेंं भजन का गायन किया। इसके बाद साध्वी नूतन प्रभा श्री जी ने कहा कि आज पूर्व राष्ट्रपति राधाकृष्णन जी का जन्म दिवस है जो कि देश भर में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। उ...
किलपाॅक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्य केशरसूरीजी के समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी ने देव- गुरु- धर्म अधिकार की विवेचना करते हुए कहा इस जगत में व्यक्ति के पास सारी वस्तुएं नाशवंत है। हमें नाशवंत से शाश्वत पाना है। संसार भ्रमण से मुक्ति की प्राप्ति शाश्वत है। हम धर्मक्रिया में बालक जैसे है क्योंकि अविधि, अज्ञान, आशातना हमारे अंदर हैं। इसलिए हमें धर्म गुरू की निश्रा में करना चाहिए। हम देव और गुरु की भक्ति इसलिए करते हैं क्योंकि इन तत्त्वों में धर्म रहा हुआ है। देव में धर्म, गुण, पुण्य रहा हुआ है। वहीं, गुरु में सदाचार, वैराग्य, परोपकार का धर्म रहा हुआ है। देव, गुरु में धर्म आटोमेटिक आ जाता है। हम देव, गुरु के प्रभाव से ही धर्म कर रहे हैं, ऐसा अहोभाव देव, गुरु के प्रति होना चाहिए। गुरु की निश्रा में किया हुआ धर्म संसार को घटाएगा। ज्ञानी कहते हैं छःकाय की वि...
Sagevaani.com @चेन्नई। दान धर्म का अंग है। सोमवार साहूकार पेठ एस.एस.जैन भवन मे महासती धर्मप्रभा ने श्रध्दांलूओ को संबोधित करतें हुए कहा कि दान अगर उचित स्थान पर उचित व्यक्ति को दान हम करते है तो वो दान हमे संसार से तिराने का बिजारोण करता है । दान करते समय हमारी भावना कैसी वो हमारे महत्व रखती है। भावना हमारी शुध्द नहीं है तो दान का फल हमे नहीं मिलने वाला है।दान देने से हममें परिग्रह करने की प्रवृत्ति नहीं आती। मन में उदारता का भाव रहता और हमारे विचारों में शुद्धता आती है। और हमारे मे मोह और लालच नहीं रहता।दान करने से हम न सिर्फ दूसरों का भला करते हैं,बल्कि हम अपने व्यक्तित्व को भी निखारते हैं। जब हम दान बिना किसी स्वार्थ के करते हैं तो उस सुख का अनुभव हमें आत्म संतुष्टि प्रदान करता है और वो दान सुपात्र दान बन जाता। साध्वी स्नेहप्रभा ने कहा कि संसार ऐसे दरिद्र इंसान भी है जिसके पास कुछ भी नह...
समझ का प्रयोग, सामग्री का उपयोग और समय को सार्थक करने की दी प्रेरणा Sagevaani.Com @चेन्नई; श्री मुनिसुव्रत जिनकुशल जैन ट्रस्ट के तत्वावधान में श्री सुधर्मा वाटिका, गौतम किरण परिसर, वेपेरी में शासनोत्कर्ष वर्षावास में उत्तराध्यन सूत्र के सातवें अध्ययन के विवेचन में धर्मपरिषद् को सम्बोधित करते हुए गच्छाधिपति आचार्य भगवंत जिनमणिप्रभसूरीश्वर म. ने कहा कि बाजार में जाने पर हर मजबूत और टिकाऊ वस्तुएं खरीदते हैं। चिन्तन करें हमारे इस शरीर कोई भरोसा नहीं है, कभी भी, कही पर भी आयुष्य पूर्ण हो सकता है, बिमारी आये या न आयें, सम्पन्न हो सकता है। हम कषाय, अहंकार, क्रोध, मान, माया, लोभ के समय भी यही विचार रहता है कि मैं टिकूंगा, सौ साल तक जिऊँगा, परन्तु कभी भी हम संसार से विदा हो सकते है। ◆ टाइम इज नॉट मनी, टाइम इज लाइफ गुरुवर ने आगे फरमाया कि यह सातवाँ अध्याय हमें प्रेरणा देता है कि हम भाग्यशाली है। सबस...
श्री सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन जैन श्वेतांबर मूर्तिपूजक संघ में आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरीश्वरजी ने प्रवचन देते हुए कहा कि दुनिया जिस रूप में है, उसे उसी रूप में देखें और सच का दामन कभी न छोड़ें। हालात कैसे भी हों, आपका नजरिया हमेंशा पॉजिटिव होना चाहिए। एक स्वस्थ और शुद्ध मन सुख-शांति और आनंद का जरिया है। सच्ची प्रगति चाहिए तो लक्ष्य के प्रति सचेत रहें और लगातार आध्यात्मिक प्रयास करते रहें। भविष्य की चुनौतियों के बारे में अच्छे से सोचकर नए टारगेट बनाएं। हमें अपना चरित्र अच्छा बनाना है और धार्मिक नहीं, आध्यात्मिक बनना है। अध्यात्म ही मानव कल्याण का आधार है। ज्ञान हो या विज्ञान, अध्यात्म में ही इनका मूल है। आज की पीढ़ी में संवेदनशीलता की कमी है। तकनीकी शिक्षा पर जोर देने से भौतिक विकास तो हुआ, लेकिन इसे समग्र विकास नहीं कहा जा सकता है। समाज तब समृद्ध होगा, जब उसकी सिंचाई संस्कारों से होगी। इसमे...
पूज्य गुरुदेव मरूधर केसरी मिश्रीमलजी म.सा. व लोकमान्य संत पूज्य गुरुदेव श्री रूपचन्दजी म.सा. की जन्म जयन्ति के उपलक्ष्य में श्री एस.एस. जैन संघ, नार्थ टाउन द्वारा एन्टोरवा के करीब 200 कर्मचारियों को जे अमरचंद विजयराज कोठारी परिवार, टी नगर वालों के सहयोग से नये कपड़े बांटे गए। एन्टोरवा के उपाध्यक्ष अजीत लोढा तथा संघ के अध्यक्ष अशोक एम. कोठारी, मंत्री ललित बेताला, सहमंत्री प्रमोद ललवाणी, कोषाध्यक्ष राजमल सिसोदिया, महेश भंसाली, ज्ञानचंद कोठारी, भीमराज डुंगरवाल, बंशीलाल डोसी, सुरेश बैद एवं अनेक पदाधिकारीयों ने जरूरतमंदों को वस्त्र प्रदान किया । प्रवचन में गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने फरमाया कि जीव जैसी जैसी याचना करता है कृल्प- वृक्ष उनकी इच्छा की पूर्ति करता है यह सांसारिक है लेकिन धर्म की आराधन करने से सभी प्रकार की लोकिक व लौकोतर सभी प्रकार की बाधाओ को दुर करता है। धर्म का पालन व आचरण करने वाला...
92वीं पुण्यतिथि पर हुए विशेष कार्यक्रम किलपाॅक श्वेताम्बर मूर्तिपूजक जैन संघ के तत्वावधान व गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी की निश्रा में योगनिष्ठ आचार्य केशरसूरीश्वरजी की 92वीं पुण्यतिथि पर गुणानुवाद के कार्यक्रम आयोजित हुए। इस मौके पर सामूहिक सामायिक, गुरु पूजन, संघ पूजन आदि आयोजित हुए। आचार्य केशरसूरीश्वरजी के जीवन चरित्र का वर्णन करते हुए आचार्यश्री उदयप्रभसूरीश्वरजी ने कहा अभिव्यक्ति से महत्वपूर्ण अनुभव होता है और अनुभव से महत्वपूर्ण उदाहरण होता है। जिनशासन में अनेक योगी पुरुष हुए अवतरित हुए हैं, जिनमें से एक आचार्य केशरसूरीश्वरजी थे। जिस काल में क्रिया, ज्ञान की महत्ता थी, ऐसे काल में एक महापुरुष ने जन्म लेकर योग, ध्यान की रुचि के अभाव को दूर किया। जिनशासन में योग शब्द का अर्थ है आत्मा को परमात्मा से जोड़ना। मन- वचन- काया के संयोजन को ऐसी क्रिया में जोड़ना, जिससे जल्दी मोक्ष...
स्थल: श्री राजेन्द्र भवन चेन्नई विश्व हितेषी प्रभु श्रीमद् विजय राजेंद्र सुरीश्वरजी महाराज साहब के प्रशिष्यरत्न राष्ट्रसंत, युग प्रभावक श्रीमद् विजय जयंतसेनसुरीश्वरजी म.सा.के कृपापात्र सुशिष्यरत्न श्रुतप्रभावक मुनिप्रवर श्री डॉ. वैभवरत्नविजयजी म.सा. के प्रवचन के अंश 🪔 *विषय : ज्ञान का सागर श्री अभिधान राजेंद्र कोष*🪔 ~ समाधि भाव को पाने के लिए समाधि को सम्यक् रूप से समझ कर उससे मुक्त होने का मार्ग निश्चित करना और उस मार्ग पर प्रबल उत्साह से चलना ही चाहिए। ~ समाधि भाव को पाने का सर्वश्रेष्ठ रास्ता यह है कि विचार स्वभाव का मूलभूत परिवर्तन। ~ धर्मी जीव का हर पल एक ही कर्तव्य है जो सत्य, श्रेष्ठ, सुंदर है उससे ही जुड़ना होता है। ~ दुख के समय साधक समता रखता ही है लेकिन सुख के समय में भी समता, सहायता, स्नेहभाव, साक्षीभाव, श्रेष्टरूप से धारण करता ही है। ~ यह शरीर की मृत्यु होने से पहले दूर...