यस यस जैन संघ नार्थ टाउन में चातुर्मासार्थ विराजित गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में फरमाया कि आत्म बंधुओ, कर्म सिद्धान्त का निरुपण जैन धर्म जैसा किया गया है वैसा अन्य कही देखने को नहीं मिलता। जो भी जीव पाता है वो कर्म के आधार पर ही पाता है यदि जीव अच्छे कर्म करता है तो उसे किसी प्रकार का भय नही रहता। वो जीव इस भव और पर भव दोनो में सुख समृद्धि सहज रूप से प्राप्त कर लेता है। जब पाप कर्म या अन्तराय कर्म का उदय होता है तो लाभ भी हानि में परिवर्तित हो जाता है। जीव दाने दाने को मोहताज हो जाता है इसलिए हर धर्म, हर दर्शन में उत्तम कर्म करने का निर्देश दिया गया है।
कर्मों को भोगे बिना किसी भी जीव को चाहे चक्रवर्ती, वासुदेव या तीर्थकर हो छुटकारा नही मिलता। ये जानते हुए भी व्यक्ति कर्म करते हुए चिन्तन नही करता । यदि चिन्तन कर प्रवृत्ति करो तो कर्म बन्ध कम से कम होता है। भगवान तो कहते है कि शुभ -अशुभ दोनो कर्म का बंध ही मत करो क्योकि बीज है तो अंकुरित हो वृक्ष बनेगा इसलिए कर्म बधन से मुक्त हो जाओ और बांधे, कर्मो को जड से नष्ट कर दो। परन्तु इस बात का चिन्तन मनन नही करने से जीव के निरन्तर कर्म बंध होता रहता है। मेडिटेशन (ध्यान) जो भी कार्य करो उसके पहले दो बार चिन्तन करो। करने से पहले कार्य का अवलोकन कर लिया। चिंतन मनन कर मथंन कर लिया और फिर कार्य करने से अनेक प्रकार के पाप से बच सकते है।
संयम लेने के बावजूद भी बंधे कर्म उदय में आ जाते है। इसका सबसे बडा उदाहरण स्वयं भगवान महावीर के भव है। हम साधारण मानव एक नवकारसी, एक सामायिक से अपने कर्म क्षय होने का सोचते है। इतनी बार सुनने पढ़ने के बाद भी ज्ञान याद नही रहता दूसरों को शिक्षा बड़ी -2 दे देते है परन्तु स्वयं उस शिक्षा का अनुसरण नही करता दूसरों के तप त्याग धर्म मे अन्तराय डाल देते है और पाप कार्य में बढ़ चढ़ के सहयोग देते है। भगवान कहते है एक पल का भरोसा नहीं इसलिए अच्छी भावना तुरन्त पूरी करो। ज्ञानी जन कहते है धर्म कार्य को आगे मत धकेलो क्योकि बाद में मौका नही मिलेगा धर्म छूट जायेगा। कर्मो को सही ढंग से बाधा है तो धर्म ध्यान करते हुए जीव इस संसार से सुखपूर्वक चला जाता है।
संचालन करते हुए ज्ञानचंद कोठारी ने सुचना दी कि कल से सात दिनों का अक्षर ध्यान चिकित्सा शिविर शुरू हो रहा है जो हर रोज दोपहर 2 से 3
बजे तक होगा। इस शिविर में 8 साल से 70 वर्ष तक के सभी भाग ले सकते हैं।