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आत्मा की शुद्धि, मुक्ति, तृप्ति देता है, वह ज्ञान है : गच्छाधिपति जिनमणिप्रभसूरिश्वरजी

आत्मा की शुद्धि, मुक्ति, तृप्ति देता है, वह ज्ञान है : गच्छाधिपति जिनमणिप्रभसूरिश्वरजी

 मनुष्य जन्म के इस छोटे समय को कल्याण, उर्धारोहण के लिए बताया पर्याप्त

Sagevaani.com @चेन्नई; श्री मुनिसुव्रत जिनकुशल जैन ट्रस्ट के तत्वावधान में श्री सुधर्मा वाटिका, गौतम किरण परिसर, वेपेरी में शासनोत्कर्ष वर्षावास में उत्तराध्यन सूत्र के सातवें अध्ययन के विवेचन में धर्मपरिषद् को सम्बोधित करते हुए गच्छाधिपति आचार्य भगवंत जिनमणिप्रभसूरीश्वर म. ने कहा कि हम सौभाग्यशाली है कि हमें इस मनुष्य जन्म में समय मिला। अन्य पर्यायों, गतियों में जहां पर 10 हजार वर्ष से तो आयुष्य प्रारम्भ होता है, अधिक तो हमारी गणना के विषय से बहुत लम्बा होता है। फिर भी जो हमारा यह मनुष्य भव का छोटा सा 70-80 वर्षों का समय भी महत्वपूर्ण है। हम जो अल्प समय में कर सकते है, वह कार्य वे कर नहीं सकते। हमारे इस अल्पायुष्य के आगे उनका बड़ा आयुष्य फिका है। मनुष्य जन्म का यह समय कल्याण के लिए पर्याप्त है, उर्धारोहण के लिए पर्याप्त है, बस जरूरत है, उसका सम्यक् सदुपयोग करना।

◆ ज्ञान तन, मन, वचन को शुद्ध बनाता है

गुरुवर ने कहा कि हमारे इस जन्म के समय में काया का दुरुपयोग कम करते है, उससे ज्यादा वचन से और वचन से भी ज्यादा मन से समय का दुरुपयोग ज्यादा होता है। समझ जो मिला, विवेक, ज्ञान मिला है, उसका उपयोग करना। तत्व की अपेक्षा, ज्ञान- जो आत्मा की शुद्धि, मुक्ति, तृप्ति देता है, वह ज्ञान है, बाकी सब अज्ञान की श्रेणी में आते है। ज्ञान हमारा स्वरूप बताता है, तन, मन, वचन को शुद्ध बनाता है। सही रास्ता बताता है। अच्छा और सही में अन्तर है- जो सड़क डामरीकरण युक्त होना, फोर लाइन होना, दोनों तरफ पेड़ पौधे होना, यह अच्छे रास्ते की परिभाषा है। जो रास्ता, जहां मुझे जाना है, वहां पहुचा दे, वह सही रास्ता है। हमारे मन में सही रास्ते की पिपासा होनी चाहिए। संसारी पदार्थ में तो अभाव और अल्पता में ही भटकते है, शिकायत मे ही जीते हैं। बतीसी में जो एक दाँत कम है, उसके अभाव में गस्त रहते है, हमें जो है, उसमें तृप्ति होना चाहिए। समझ से हम अनावश्यक कर्म बंधन से बच सकते है।

◆ बंधन और मुक्ति के कारणों को जान करे क्रियाएं

गुरुश्री ने आगे कहा कि जो बंधन और मुक्ति के कारणों को नहीं जानता, वह मिथ्यादृष्टि जीव है। ज्ञान, ज्ञानी और ज्ञान के उपकरणों की असातन नहीं करनी चाहिए। समझ नहीं होने पर हम खाने के आइटमों में भी पशुओं का चित्र बनाते है और खाते हैं, उनसे कर्म बंधन है। हमें सामग्री मिली, अनुकूलता मिली और भी लोगों को मिलती है लेकिन वे उसका उपयोग नहीं करते, रुचि भाव भी नहीं होता। चौथा स्तंभ है – सामर्थ्य। सामर्थ्य छह प्रकार का होता है। 1. दर्शन शक्ति- हम आँखों से देख सकते हैं। संसार में अनेकानेक जो जन्म से अंधे होते है, उन्हें ही आँखों की महत्ता मालूम होता है। पूण्य के उपार्जन से ज्यों ज्यों पैसा बढ़ता है, धर्म भी बढ़ना चाहिए। 2. श्रवण शक्ति, 3. समझ शक्ति, 4. स्मरण शक्ति, 5. निर्णय शक्ति और 6. संवेदन शक्ति।

◆ अपनों की डांट, थप्पड़ में भी होता प्यार

पावन पाथेय प्रदान करते हुए गच्छाधिपति ने कहा कि अपने जब हमारे सिर पर हाथ फेरते है, उसमें प्यार है और उससे भी ज्यादा प्यार उनकी डांट, थप्पड़ में होती हैं। अपनों की उस फटकार से कभी डरना नहीं चाहिए। उसी से हम सही राह के राही बन सकते हैं।

समाचार सम्प्रेषक : स्वरूप चन्द दाँती

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