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इंसान की इच्छाएँ ही भटकाती औंर आत्मा को संसार में अटकाती है: महासती धर्मप्रभा

Sagevaani.com @चैन्नई। इंसान की इच्छाएँ ही भटकाती और आत्मा को संसार में अटकाती है। गुरूवार साहूकार पेठ के जैन भवन में महासती धर्मप्रभा ने सैकड़ों श्रध्दांलूओ को सम्बोधित करते हुए कहा कि इच्छाएं ही हमे भटकाती और अटकाती है और हमारे समस्त दुःखों की जड़ भी हमारी इच्छाएं ही है। जो हमारी आत्मा को संसार मे अटकाये रखती है। मनुष्य इच्छाओं के गुलाम और दास बनकर सुख नही भोग सकता है और ना हि संसार से तिर पाता है। संसार के रिश्ते केवल शरीर तक ही है, और हमारी आत्मा का रिश्ता अनंत है । फिर मनुष्य इच्छाओं का दास बनकर अपनी गति को बिगाड़ रहा है,और संसार मे भटक रहा है। इंसान के भीतर मे संसार नहीं है यह बात मनुष्य के समझ आ जाए तो वह अपनी इच्छाओं के गुलाम नहीं बन पाएगा और इच्छाओं का दमन करके संसार के भटकाव से आत्मा को मोक्ष दिला सकता है। आश्क्ति और मोह एक ऐसा बंधन है जो हमे संसार से बाहर नहीं निकलने देता है। मनुष्...

सूरत कैसी भी हो, लेकिन सीरत अच्छी होनी चाहिए : देवेंद्रसागरसूरि

श्री सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन श्वेतांबर मूर्तिपूजक जैन संघ में आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने धर्म प्रवचन देते हुए कहा कि मनुष्य जीवन में व्यक्तित्व का विशेष महत्व होता है। सूरत कैसी भी हो, लेकिन सीरत अच्छी होनी चाहिए। ऐसा इसलिए, क्योंकि यही सीरत ही आपके व्यक्तित्व को दर्शाती है। कुछ लोग बहुत सुंदर दिखते हैं, लेकिन उनके बजाय कोई साधारण-सा व्यक्ति हमारे मन में अपनी गहरी छाप छोड़ देता है। बाहरी तौर पर सुंदर दिखने वाले शख्स की तुलना में साधारण व्यक्ति के चेहरे पर छाई मधुर मुस्कान, उसके व्यवहार में शिष्टाचार और बातचीत करने का सलीका हमारे दिलो-दिमाग में एक खास पहचान बना लेता है। उन्होंने आगे कहा कि हर मनुष्य का अपना-अपना व्यक्तित्व, अपनी पहचान है। इसकी विशेषता यही है कि लाखों-करोड़ों लोगों की भीड़ में वह अपन निराले व्यक्तित्व के कारण पहचान लिया जाता है। दरअसल, व्यक्ति की उस संपूर्ण छवि का नाम ही...

जिसका मन पर नियंत्रण होता है उसको सब पर नियंत्रण होता है: डॉ लिलत प्रभा जी

*पुज्य प्रर्वतक श्री प्रकाश मुनि जी मासा* → पुखरपुण्य संयुक्त महावृती जितेन्द्रियम् ।। डॉ लिलत प्रभा जी गुरुदेव के लिये कहते है कि…वे इंद्रियों को जीतने वाले थे। पांच इंदियों पर विजय पाना कठिन है विषय जीव को भटकाता है! जिस का मन पर नियंत्रण होता है उसको सब पर नियंत्रण होता है। मन को वश में करना मुश्किल *लघुता*- अभ्यन्तर परिग्रह हास्य, रति, अरति भय, *शौक-* विषयों के कारण जीव दुखि, जो चाहिए वह नहीं मिले तो दुःखी होता है। जो प्राप्त उपलब्ध है, अधीन है उसका सुख नहीं भोगता ! सारी दुनिया अपनी नहीं। जितना माल आपके पास है वह आपका,,, हम शोक में डुबे है, जिंदगी में आज का काम आज नहीं किया उसका दुःख रावण को था कि मुझे समुद्र के पानी को मीठा करना और स्वर्ग तक सीढ़ी लगाना। में भ्रम में था… में इस बनवासी राम पर वीजय प्राप्त नहीं कर सका इसका **शोक* है।  *जिंदगी में आप सुख ले नहीं सकते है जब भी ...

के उपलक्ष में प्रोग्राम रखा गया

हमारे भाईन्दर में विराजीत उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया आदि ठाणा 7 साता पूर्वक विराजमान हैl वह रोज हमें प्रवचन के माध्यम से नित नयी वाणी सुनाते हैं, वह इस प्रकार हैंl बंधुओं जैसे कि आज जन्माष्टमी के उपलक्ष में प्रोग्राम रखा गया 100 बच्चों ने पार्टिसिपेट कियाl बहुत ही शानदार प्रोग्राम एवं गुरुणी मैया ने कृष्ण भगवान के बारे में जानकारी दीl अच्छे ढंग से समझाया कृष्ण भगवान का जन्म कैसे और कौन से तीर्थंकर बनने वाले यह समझायाl कामयाबी उन्हे नहीं मिलती जिनके लक्ष्य बने हुए नहीं होते मुझे लक्ष्य ऊंचे सपना व्यक्ति को ऊंचाइयों की तरफ बढ़ने की प्रेरणा देते हैंl ऐसे अर्जुन को लक्ष्य पाने के लिए मछली की केवल आख दिखती है वैसे ही कामयाबी को पाने के लिए केवल लक्ष्य को देखें और उसके लिए संगन प्रयास करें भाग्य का रोना रोने की बजाय कामयाबियों के मार्ग पर तलाश में चाहिएl सफलता केवल भा...

जिस साधु के पास वैयावच्च का गुण हो तो उसका मोक्ष जल्दी होता है

 किलपाॅक जैन संघ में हुई पंन्यास दयासिंधु विजयजी की गुणानुवाद सभा   किलपाॅक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्य केशरसूरीजी समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी की निश्रा में पंन्यास दयासिंधु विजयजी महाराज की गुणानुवाद सभा आयोजित हुई। गौरतलब है कि पंन्यास मुनि हाल ही में गिरनार तीर्थ की यात्रा की 3000 सीढियां चढ़ने के दौरान कालधर्म को प्राप्त हुए। 52 वर्ष की आयु में उस समय उनकी वर्धमान तप की 94वीं ओली चल रही थी। वे गिरनार तीर्थ की यात्रा के साथ श्रावक के लिए लोच करने के लिए गिरनार पहाड़ जा रहे थे। आचार्यश्री ने इस मौके पर कहा कि श्रमण जब कालधर्म पाते हैं, तब शोकसभा नहीं होती और करनी भी नहीं चाहिए। रोना उसके लिए पड़ता है, जो कहां गया पता नहीं। श्रमण के लिए ऐसा सोचना आवश्यक नहीं होता क्योंकि वे जब दीक्षित होते हैं तब यह जाहिर करके दीक्षित होते हैं कि सारा संसार नश्व...

बीजेएस द्वारा आदर्श समाज की परिकल्पना पर वृहद चिन्तन संगोष्ठी का आयोजन

◆ श्री सुधर्मा वाटिका, गौतम किरण परिसर, वेपेरी में समायोजित ◆ तमिलनाडु चेन्नई रीजन के तत्वावधान में सहभागी बनेगा सम्पूर्ण जैन समाज Sagevaani.com @चेन्नई ; जैन समाज के प्रत्येक व्यक्ति, परिवार और सम्पूर्ण समाज को सुदृढ़ एवं सक्षम बनाने के लिए समाज के हर व्यक्ति की जागरूकता एवं सहभागिता जरूरी है। उसी उद्देश्य के अनुरूप महत्वपूर्ण चर्चा, चिंतन गोष्ठी का आयोजन शुक्रवार दिनांक 8 सितंबर 2023 दोपहर 3.30 बजे श्री सुधर्मा वाटिका, गौतम किरण परिसर, वेपेरी में समायोजित की जा रही है। उपरोक्त जानकारी भारतीय जैन संघटना के तमिलनाडु राज्याध्यक्ष रमेश पटावरी ने दी। बीजेएस चेन्नई रीजन अध्यक्ष आकांश जैन ने कहा कि आदर्श परिवार की परिकल्पना से लक्षित इस संगोष्ठी में सम्पूर्ण जैन समाज के गणमान्य व्यक्तित्व सहभागी बन रहे हैं। बीजेएस राज्य उपाध्यक्ष दौलतराज बाँठिया ने बताया कि इस चिन्तन संगोष्ठी में बीजेएस के राष्ट...

जिन्होंने स्वयं का मूलभूत परिवर्तन किया उसके जीवन में सफलता हर पल मिलती ही है: डॉ. वैभवरत्नविजयजी म.सा.

     🛕 *स्थल: श्री राजेन्द्र भवन चेन्नई*  🪷 *विश्व हितेषी प्रभु श्रीमद् विजय राजेंद्र सुरीश्वरजी महाराज साहब के प्रशिष्यरत्न दीर्घ दृष्टा, गीतार्थ श्रीमद् विजय जयंतसेनसुरीश्वरजी म.सा.के कृपापात्र सुशिष्यरत्न श्रुतप्रभावक मुनिप्रवर श्री डॉ. वैभवरत्नविजयजी म.सा.* के प्रवचन के अंश    🪔 *विषय : अभिधान राजेंद्र कोष भाग 7*🪔 ~ हमारे जीवन में यदि हमारी आत्मा, आत्मा का हित, आत्मा की शुद्धि को ही देखने की दृष्टि यदि है तो हम अन्य जीवों के भी आत्मा को ही देखेंगे। ~ ये मानव भव का सर्वश्रेष्ठ धर्म यह है कि स्वभाव का परिवर्तन। ~ जिन्होंने स्वयं का मूलभूत परिवर्तन किया उसके जीवन में सफलता हर पल मिलती ही है। ~ ज्ञानी भगवंत कहते हैं कि जो साधक ने सम्यक् दर्शन के भावों वाली श्रेष्ठ साधना की है उसके जीवन में स्वभाव, विचार, व्यवहार, मान्यता का मूलभूत बदलाव होता है। ~ हमारा मन हर पल पाप की रुचि वाला नहीं ही हो...

जैनदर्शन का योग सत्यदर्शन योग है: डॉ. वैभवरत्नविजयजी म.सा

     🛕 *स्थल: श्री राजेन्द्र भवन चेन्नई*  🪷 *विश्व वंदनीय प्रभु श्रीमद् विजय राजेंद्र सुरीश्वरजी महाराज साहब के प्रशिष्यरत्न राष्ट्रसंत, दीक्षा दाणेश्वरी श्रीमद् विजय जयंतसेनसुरीश्वरजी म.सा.के कृपापात्र सुशिष्यरत्न श्रुतप्रभावक मुनिप्रवर श्री डॉ. वैभवरत्नविजयजी म.सा.* के प्रवचन के अंश    🪔 *विषय : अभिधान राजेंद्र कोष भाग 7*🪔 ~ समाधिभाव देह की मृत्यु, कर्म की मृत्यु और सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण अज्ञान की मृत्यु जब होती है तभी प्रकट होता है। ~ बोधवान आत्मा है और अनंत काल से अनंत गुण संपन्न है ही अब इस भव में उसे पाने के लिए प्रबल पुरुषार्थ होना ही चाहिए। ~ भीतर यात्रा अनंत सुख संपन्न है ही इसलिए साधक परम सुखी होता ही है। ~ जैनदर्शन का योग सत्यदर्शन योग है। ~ जब एकांत में स्वयं का बलवान श्रेष्ठ आंतरिक निरीक्षण होगा तभी हमारी अज्ञान की आसक्ति और अज्ञान का भी अंत होगा। ~ ध्यान आपकी निजी पहचान है ज...

क्षमा देने जाने में उदारता का गुण चाहिए- आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीजी महाराज

क्षमा मांगने जाने में सरलता, नम्रता का गुण चाहिए और क्षमा देने जाने में उदारता का गुण चाहिए- आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीजी महाराज किलपाॅक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्य केशरसूरीजी के समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी म.सा. ने प्रवचन में साधु जीवन की प्रवृत्ति का महत्वपूर्ण उपदेश देते हुए कहा जैसे आग में फायर प्रूफ कोट पहनने से व्यक्ति जलता नहीं है, इसी तरह कषाय प्रूफ बन जाने से व्यक्ति को औरों के कषाय का व्यवहार दुःखी नहीं बनाता है। गुरुदेव कषाय प्रूफ होते हैं। गुरु को भी अनुशासन करने के नाम से क्रोध, माया आ सकता है लेकिन वे इससे अपने मन को मलिन नहीं करते हैं। जिन्होंने अपना स्वभाव समतामयी, स्वीकारमयी बनाया है उनको कषाय छू ही नहीं सकते। उन्होंने कहा बुरा काम करना तो बुरा है ही, नासमझ का काम करना बहुत बुरा है। जब क्रोध करना ही पड़े तो शांति का गुण रखो। उन्होंने कहा...

नोर्थटाउन बिन्नी में तपस्वियों का पारणा महोत्सव सानंद संपन्न

आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरीश्वरजी मुनि श्री महापद्मसागरजी एवं साध्वी हर्षरत्नाश्री जी के सान्निध्य में श्री सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन जैन श्वेतांबर मूर्तिपूजक संघ के तत्वावधान में सिद्धितप, सामूहिक अट्ठाई तप, व मोक्षदंडक तप पारणा का भव्य व दिव्य आयोजन किया गया, तपस्वियों को पारणा करवाने का लाभ शा तिलोकचंदजी थानमलजी परिवार ने लिया। इस अवसर पर जैन समुदाय के गणमान्य लोग उपस्थित रहें। प्रसंग के तहत आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने कहा कि तीर्थंकर जहां तपस्या करते हैं, देवता वहां खुशियां नहीं मानते। तीर्थंकर परमात्मा जिस आंगन में पारणा करते हैं, उस आंगन में देवता ख़ुशी मानते हैं। देवता वहां बधाई देते हैं जहां तपस्वी पारणा करते हैं। उन्होंने कहा 1 अट्ठाई की छोड़िए, सैकड़ों तपस्वियों का पारणा आज यहां होने वाला है। उन्होंने आगे कहा कि तपस्वी अपने जीवन की दशा स्वयं निर्धारित करते हैं, जबकि सामान्य व्य...

जैन धर्म में दो प्रकार के जीव बताये गये है: जयतिलक मुनिजी

नार्थ टाउन में गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में फरमाया कि जैन धर्म में दो प्रकार के जीव बताये गये है भवी और अभवी। अभवी सम्यक आराधना नहीं कर सकता इसलिए अभवी मोक्ष नहीं जा सकता पर वह संयम अगींकार कर चौदह पूर्व का ज्ञान प्राप्त कर सकता है लेकिन कथनी और करणी में अन्तर होने के कारण अभवी मोक्ष में नहीं जा सकता। दिखावटी, सजावटी चीजों से हानि हो सकती है परन्तु लाभ नहीं हो सकता। असली जीव का उपदेश सुनकर प्रेरणा से कई जीव भव सागर से पार हो सकते है परन्तु स्वयं अथवा जीव धर्म के प्रति सह का अभाव होने से वे मोक्ष में नही जा सकते। भवी जीव गजसुकुमाल के समान पराक्रम फोड़ कर बिना चौदह पूर्व ज्ञान के भी एक ही भव में सिद्ध हो सकते हैं। भवी जीव उपसर्ग परिषह आने पर भी समभाव में रहते है। भवी जीव एक क्षण का भी प्रमाद नही करता। प्रत्याख्यान त्याग का कदाचित पालन न कर पाने से वह बेचैन हो उठता है। भवी जीव को धर्म क...

जीवन में तीन चीज व्यक्ति को नसीब से मिला करती है: उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया

हमारे भाईन्दर में विराजीत उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया आदि ठाणा 7 साता पूर्वक विराजमान हैl वह रोज हमें प्रवचन के माध्यम से नित नयी वाणी सुनाते हैं, वह इस प्रकार हैं बंधुओं जैसे कि जीवन में तीन चीज व्यक्ति को नसीब से मिला करती हैl अच्छी पत्नी अच्छी संतान और अच्छा मित्र हकीकत तो यह है की पत्नी और संतान से भी ज्यादा अच्छे नसीब होने पर अच्छा मित्र मिलता हैl  पत्नी अच्छी या बुरी मिली है तो इसमें सारा श्रेय या सारा दोष हमारा नहीं हैl पत्नी का चयन परिवार के द्वारा किया गया था उसके चाहने में शायद इतनी बड़ी भूमिका तुम्हारी नहीं थी जीतनीकी तुम्हारे माता-पिता की थी संतान प्राप्ति की देन हैl वह अच्छी निकलेगी या बुरी इसमें भी हमारा सत प्रतिसत हाथ नहीं है लेकिन मित्रों का चयन व्यक्ति स्वयं करता हैl इसलिए अपने विवेक अपनी प्रज्ञा बुद्धि और सजकता का उपयोग करता है पत्नी और संतान के...

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