नार्थ टाउन में गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में फरमाया कि जैन धर्म में दो प्रकार के जीव बताये गये है भवी और अभवी। अभवी सम्यक आराधना नहीं कर सकता इसलिए अभवी मोक्ष नहीं जा सकता पर वह संयम अगींकार कर चौदह पूर्व का ज्ञान प्राप्त कर सकता है लेकिन कथनी और करणी में अन्तर होने के कारण अभवी मोक्ष में नहीं जा सकता। दिखावटी, सजावटी चीजों से हानि हो सकती है परन्तु लाभ नहीं हो सकता।
असली जीव का उपदेश सुनकर प्रेरणा से कई जीव भव सागर से पार हो सकते है परन्तु स्वयं अथवा जीव धर्म के प्रति सह का अभाव होने से वे मोक्ष में नही जा सकते। भवी जीव गजसुकुमाल के समान पराक्रम फोड़ कर बिना चौदह पूर्व ज्ञान के भी एक ही भव में सिद्ध हो सकते हैं। भवी जीव उपसर्ग परिषह आने पर भी समभाव में रहते है। भवी जीव एक क्षण का भी प्रमाद नही करता। प्रत्याख्यान त्याग का कदाचित पालन न कर पाने से वह बेचैन हो उठता है। भवी जीव को धर्म के प्रति अत्यन्त रुचि रहती है वह धर्म के आचरण को छोड़ता नहीं। यह भावना पल -2 वह भाता है कि कब मैं संयम अंगीकार कर आराधन कर मुक्त होऊँगा।
भवी जीव कभी संसार के प्रति आसक्त नहीं रहता। वह भली प्रकार जानता है कि संसार छोड़ने योग्य और धर्म धारण करने योग्य है। भगवान ने अशुभ प्रवृत्ति का निषेध और शुभ प्रवृत्ति का निर्देष दिया है। जिनेश्वर रूपित धर्म की शरण में रहने वाले को दुख आते भी है तो तुफान की भाँति आ कर चले जाते है वह ज्यादा विचलित नहीं होता। इसलिए कहते है दुःख आने पर धर्म-ध्यान को और बढ़ा देना चाहिए। क्योंकि कर्म निर्जरा में समर्थ एक मात्र धर्म ही है। मिथ्यात्व का सेवन करने से कर्म निर्जरा नहीं होती अधिक और ज्यादा कर्म बन्ध होता है।
इसलिए भगवान ने कहा कि पाप एक तरफ और मिथ्यादर्शन शल्य एक तरफ। इस पाप से संसार परिभ्रमण और बढ़ता है। धर्म को अपने जीवन में साँसों की तरह धारण करो। दिखावटी धर्म करने से अभवी जीव नरक में न जा कर देवलोक में चला जाता है। इसलिए ज्ञानी जन कहते है धर्म के महत्व को समझ जीवन में धारण करो। धर्म ध्यान करने वाला कोई भी क्रिया करे उसे उसकी कर्म निर्जरा होती है। जैन धर्म में ही कर्म निर्जरा का महत्व है।