क्षमा मांगने जाने में सरलता, नम्रता का गुण चाहिए और क्षमा देने जाने में उदारता का गुण चाहिए- आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीजी महाराज
किलपाॅक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्य केशरसूरीजी के समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी म.सा. ने प्रवचन में साधु जीवन की प्रवृत्ति का महत्वपूर्ण उपदेश देते हुए कहा जैसे आग में फायर प्रूफ कोट पहनने से व्यक्ति जलता नहीं है, इसी तरह कषाय प्रूफ बन जाने से व्यक्ति को औरों के कषाय का व्यवहार दुःखी नहीं बनाता है। गुरुदेव कषाय प्रूफ होते हैं। गुरु को भी अनुशासन करने के नाम से क्रोध, माया आ सकता है लेकिन वे इससे अपने मन को मलिन नहीं करते हैं।
जिन्होंने अपना स्वभाव समतामयी, स्वीकारमयी बनाया है उनको कषाय छू ही नहीं सकते। उन्होंने कहा बुरा काम करना तो बुरा है ही, नासमझ का काम करना बहुत बुरा है। जब क्रोध करना ही पड़े तो शांति का गुण रखो। उन्होंने कहा क्षमा शब्द पृथ्वी का पर्यायवाची है। पृथ्वी सबको क्षमा से लेती है। ज्ञानी कहते हैं क्षमा वास्तविक धर्म है, यदि यह प्रेम से जुड़ा है। सामने वाले से फायदा हो रहा है इसीलिए मैं शांत हूं, वह उपकार क्षमा है। क्षमा दो प्रकार की है व्यवहार क्षमा और निश्चय क्षमा। व्यवहार क्षमा व्यक्तिगत रूप से देने या लेने के लिए की जाती है।
निश्चय क्षमा के लिए सभी जीवों से प्रतिक्रमण में क्षमा मांगते हैं। उन्होंने कहा यदि आगे वाले का शर्मीला स्वभाव है तो हमें सामने से क्षमा देनी चाहिए। हमें मध्यम भाव से उत्तम भाव की ओर जाने के लिए क्षमा मांगनी चाहिए। ज्ञानी कहते हैं क्षमा मांगने जाने में सरलता, नम्रता का गुण चाहिए और क्षमा देने जाने में उदारता का गुण चाहिए। आदर्श मुनि वे होते है जो विषय के आसक्त नहीं बनते, कषाय प्रूफ होते हैं। मुनि का दूसरा नाम क्षमा- श्रमण है। गुरु के क्लेश भाव थोड़ी देर के लिए आते हैं, क्योंकि उन्हें शासन का अटैचमेंट रहता है, लेकिन वे राग- द्वेष में लिप्त नहीं होते हैं।
आचार्य श्री ने कहा संसार में दुखों का कारण अहंकार है, मुनि की निर्लिप्त साधना अमृत के समान है। उन्होंने कहा दूसरों को अपने दुखड़े बार-बार सुनाने से स्वयं के दुखड़े बढ़ते हैं। दुखड़ों का पुनरावर्तन और संचय नहीं करना चाहिए। जीवन की पूर्व दुर्घटनाओं को हृदय में नहीं रखना चाहिए। जिस व्यक्ति ने कभी आपका बुरा किया है तो उसे भूल जाना चाहिए।
ज्ञानी कहते हैं पापों का प्रायश्चित जरूर लेना चाहिए लेकिन खुशी से लेना चाहिए। प्रायश्चित करके उन पापों का पुनरावर्नतन नहीं हो, यह निर्धार करना चाहिए। कुछ पाप ऐसे होते हैं जिनकी हमें आदत बन चुकी है, उनका प्रायश्चित भी लेना चाहिए, इसका फायदा यह होगा कि वे पाप आगे नहीं बढ़ेंगे। ज्ञानी कहते हैं प्रायश्चित आपके पाप की प्रवृत्ति को समाप्त करती है। उन्होंने कहा महापुरुषों के मजाक में बोले हुए वचन भी सत्य बन जाते हैं। सती, सात्विक, तपस्वी और सज्जन के वचन सच हो जाते हैं।