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पर्यूषण आत्मा की सुरक्षा जीवन की रक्षा का पर्व है: महासती धर्मप्रभा

Sagevaani.com @चैन्नई। पयूर्षण आत्मा की सुरक्षा जीवन की रक्षा का पर्व है। गुरूवार साहूकार पेठ पयूर्षण के तृतीय दिवस महासती धर्मप्रभा ने पयूर्षण मे जप,तप करने वाले सभी श्रध्दांलूओ को सम्बोधित करते हुए कहा कि यह महापर्व आत्मिक उज्ज्वलता का पर्व है।और हमारी आत्मा के अवलोकन का दिन है,भीतर में झांकने का पर्व है। इस मे संसार मे हमारी आत्मा ने अनंत बार अनेक जीव योनियों मे जन्म लेकर भी आत्मा मुक्ति का मार्ग नहीं प्राप्त कर पाई है। पयूर्षण पर्व हमारी आत्मा को भीतर की ओर मुड़कर देखने की बात सिखाता है। जब तक हम अंतर की गहराई से स्वंय को जानेगे नही तब हमारी आत्मा को हम पहचान नहीं सकते है पर्यूषण ही एक ऐसा पर्व है जो हमारी सोई हुई आत्मा को जगाता है और हमे अहसास दिलाता है । संसारा असार है,और मोह का माया जाल है। हम कही जन्मो से इस संसार मे सुख की खोज कर रहे है जबकि सुख इस संसार में नहीं है भीतर मे छुपा हु...

जितनी ज्यादा धर्म आराधना में लग्न होगी उतनी ही कर्म निर्जरा होगी: जयतिलक मुनिजी

  यस यस जैन संघ नार्थ टाउन में चातुर्मासार्थ विराजित गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में फरमाया कि जिनकी तरफ से पिछले पर्युषण पर्व की आराधन में कमी रह गई तो इस पर्युषण पर्व में कमी पूरी कर सकते है। तप-त्याग, धर्म आराधना से अपनी आत्मा को जोड़ने का लक्ष्य रखना चाहिए। दूसरी बार पर्युषण पर्व मनाना अति पुण्यवाणी का फल है। जितनी ज्यादा धर्म आराधना में लग्न होगी उतनी ही कर्म निर्जरा होगी। लौकिक विद्या और लोकोत्तर विद्या ये दो प्रकार की विद्या है। लौकिक विद्या को मोक्ष मार्ग की विद्या नहीं समझना चाहिए । ये विद्या सांसारिक विद्या है। आध्यात्मिक विद्या मोक्ष मार्ग की विद्या है। दोनों विध्याओं का अपना महत्व है। आगमकारों ने लौकिक विद्या को मिथ्यात्व नहीं कहा क्योंकि लौकिक विद्या से उन्होंने तीनों काल को जान कर सांसारिक बाधाओं को दूर किया। निमित्त ज्ञान एकान्त रूप से मिथ्यात्व नही है। लौकिक विद्या ...

ईश्वर की पूजा से बढ़कर होती है माता-पिता की सेवा : साध्वी नूतन प्रभाश्री जी

पर्यूषण पर्व के तीसरे दिन जैन साध्वियों ने बताए अंतगढ़ सूत्र के प्रेरक संदेश Sagevaani.com @शिवपुरी। जिस पर अपने माता-पिता का आशीर्वाद होता है। जो अपने माता-पिता की तन, मन, धन से सेवा करता है उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। माता-पिता में ईश्वर की छवि होती है और ईश्वर पूजा से बढ़कर माता-पिता की सेवा है। उक्त उद्गार प्रसिद्ध जैन साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने आराधना भवन में पर्यूषण पर्व के तीसरे दिन धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। धर्मसभा में जैन शास्त्र अंतगढ़ सूत्र का वाचन साध्वी पूनमश्री जी ने किया और साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने अंतगढ़ सूत्र के प्रेरक संदेश धर्मांवलंबियों को बताए। साध्वी जयश्री जी ने माँ के चरणों में स्वर्ग है हमारा… स्वर्ग है हमारा, तेरे आंचल में मिलता है हर दुख से किनारा… भजन का सुमधुर स्वर में गायन किया। धर्मसभा में साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने अंतगढ़ सू...

अच्छे काम करने के लिए कोई मुहूर्त नहीं होता: रविन्द्र मुनि जी म.सा

  दिवाकर भवन पर चल रहे पर्वाधिराज पर्युषण पर्व के तीसरे दिवस पर अतंगड सूत्र का वाचन हुआ, धर्मसभा को संबोधित करते हुए मेवाड गौरव प्रखर वक्ता रविन्द्र मुनि जी म.सा.ने कहा की अच्छे काम करने के लिए कोई मुहूर्त नहीं होता बात जब जगने की आती है तो पहले हम जिए फिर दुसरो को जगाये यदि आपका व्यक्तित्व विराट हो तो छोटा काम भी आपकों छोटा नहीं बना सकता शुरूवात घर से करें।एक माँ एक ऐसे व्यक्ति को दिया गया शब्द है जो जीवन भर अपने परिवार और बच्चों की भलाई, विकास और कल्याण के लिए बलिदान को पहली प्राथमिकता देती है। एक माँ न केवल एक बच्चे को जन्म देती है बल्कि उससे प्यार करने, उसकी देखभाल करने और बिना किसी पूर्वापेक्षा या शर्तों के समर्पण और प्यार दिखाने के लिए आजीवन प्रतिबद्धता रखती है। एक माँ प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं क्योंकि वह एक रक्षक, एक मित्र और साथ ही एक अनुशासक...

पौषध आत्मा की सूक्ष्म चीजों का अवलोकन करता है: आचार्य उदयप्रभ सूरीजी

Sagevaani.com @किलपाॅक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्य केशरसूरी समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी ने अष्टान्हिका प्रवचन में कहा पौषध औषध जैसा है। पौषध श्रमण जीवन का टेस्टिंग सेंटर है। पौषध यानी जो आत्मा में रहे हुए क्रोध, मान, माया, लोभ और अन्य कुव्यसनों को दूर करे। पौषध टेलिस्कोप है, यह आत्मा की सूक्ष्म चीजों का अवलोकन करता है। यह आत्म गुणों के दर्शन करने का साधन है। यह अट्ठारह पापस्थानकों को सुलाने का काम करता है, इसलिए यह हमारे दोषों के लिए एनेस्थीसिया का काम करता है। उन्होंने कहा जगत में तीन दुःख है अभाव, विभाव और दुर्भाव। इनको दूर करने के उपाय है सद्भाव, अहोभाव और स्वभाव। उन्होंने कहा जगत में जितनी चोइस ज्यादा है, उतनी ही नोइस ज्यादा है। वस्तुओं की चाह में दुःख बढ़ता है। आत्मा नाशवंत नहीं है, शास्वत है। मृत्यु में केवल आत्मा और शरीर की कनेक्टिंग दूर होती ह...

दान-तप के लिए प्रेरित करता पर्व पर्युषण: देवेंद्रसागरसूरिजी

दान, शील, तप और त्याग इस देश की विशेषता है। भारत में पर्युषण पर्व ही ऐसा है जो दान, तप के लिए प्रेरित करता है। भगवान महावीर ने भी गुप्त दान को सर्वश्रेष्ठ दान की संज्ञा दी है।यदि दान नाम कमाने के लिए या पुण्य कमाने के लिए हो तो दान नहीं कहलाता है। उक्त विचार पर्वाधिराज पर्युषण पर्व के अवसर पर श्री सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन जैन संघ में आयोजित धर्मसभा में आचार्य देवेंद्रसागरसूरिजी ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि दान देने वाला व लेने वाला दोनों ही सुपात्र होना चाहिए। ज्ञानियों ने कहा है कि हाथ की शोभा कंगन से नहीं दान से होती है। अहिंसा, सत्य और तप जिसके पास है, उन्हें देवता भी नमस्कार करते हैं। जो मानव शरीर के बजाय आत्मा का चिंतन करता है उसका जीवन सार्थक है। जैन धर्म में त्याग का सर्वाधिक महत्व बताया गया है। श्रावक के कर्तव्यों में साधार्मिक भक्ति भी एक प्रमुख कर्तव्य है। जैन धर्म त्याग प्रधान, सं...

पाना चाहते हैं तो मन को बदले: उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया

हमारे भाईन्दर में विराजीत उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया आदि ठाणा 7 साता पूर्वक विराजमान हैl वह रोज हमें प्रवचन के माध्यम से नित नयी वाणी सुनाते हैं, वह इस प्रकार हैंl बंधुओं जैसे कि शांति चाहिए तो और शांति से बची है, जिंदगी में सदाबहार प्रश्न और आनंद चित् रहने के लिए ना तो कर की जरूरत होती है नहीं सत्ता संपत्ति की नहीं आलीशान मकान दुकान फैक्ट्री और ऑफिस की जरूरत होती हैl यह सब सुविधा है दे सकते हैं शांति नहीं शांति और जीवन की खुशियां कहीं और छुपी हुई हैl जब हम जानना चाहते हैं कि सदाबहार प्रश्न कैसे रहे एक बात निश्चित समझ ले प्रशांत और उसे नहीं बल्कि अपने चित की चेतना से उपार्जित की जाती हैl आज तो आदमी की जेब में ऐसा सीका है जिसके एक और खुशी दूसरी और ना खुशी और ना उम्मीद खुद ही हुई हैl व्यक्ति जब सिक्का निकाल कर उसे देखा है तो उसे खुशी नजर आती है और वह खुश होता हैl ...

उत्थान के समय विनाश नहीं होता: रविन्द्र मुनि जी म.सा. 

  दिवाकर भवन पर चल रहे पर्वाधिराज पर्युषण पर्व के दुसरे दिवस पर अतंगड सूत्र का वाचन प्रतिदिन चल रहा है धर्मसभा को संबोधित करते हुए मेवाड गौरव प्रखर वक्ता रविन्द्र मुनि जी म.सा.ने कहा की उत्थान के समय विनाश नहीं होता प्रकति के प्राम्भ में 7-7 दिन अमृत दूध पानी आदि की वर्षा हुई उसके बाद प्रकृति में हरियाली हुई उस दिन प्रकृति को देखकर मनुष्य ने अहिंसक होने का प्रण लिया तभी से वर्षावास मनाने की परम्परा का जन्म हुआ हम महावीर के अनुयाई है हम श्रमणोपासक है परोक्ष में रखी हुई भावना जहर बन जाती है दूसरा कर्म है मान यानि अहंकार मुझे सम्मान नहीं मिला में हु जो सब कुछ में ही हु की भावना ही अहंकार है ,अहंकार सलाह लेने से डरता है। अहंकार अपनी उलझन खुद ही सुलझा लेना चाहता है। यह भी स्वीकार करने में कि मैं उलझा हूं, अहंकार को चोट लगती है। और हमारी सारी उलझन अहंकार से पैदा होती है और तुम उसी से सुलझान...

मानव को मानव से जोड़ने का पर्व हे पर्युषण : देवेंद्रसागरसूरि

श्री सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन श्वेतांबर मूर्तिपूजक जैन संघ में आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरीश्वरजी की निश्रा में श्रद्धा भरे माहोल के बीच पर्युषण पर्व के अनुष्ठानों का आरंभ हुआ । पर्यूषण पर्व के दौरान सुबह पूजा-पक्षाल, प्रवचन और शाम को प्रतिक्रमण होगा। आचार्य श्री ने पर्युषण पर्व के ऊपर अपने मार्मिक उद्गार प्रगट करते हुए कहा की पर्युषण पर्व का शाब्दिक अर्थ है- आत्मा में अवस्थित होना। पर्युषण शब्द परि उपसर्ग व वस्  धातु इसमें अन् प्रत्यय लगने से पर्युषण शब्द बनता है। पर्युषण यानी ‘परिसमन्तात-समग्रतया  उषणं वसनं निवासं करणं’- पर्युषण का एक अर्थ है- कर्मों का नाश करना। कर्मरूपी शत्रुओं का  नाश होगा तभी आत्मा अपने स्वरूप में अवस्थित होगी अत: यह पर्युषण-पर्व आत्मा का आत्मा  में निवास करने की प्रेरणा देता है।पर्युषण महापर्व आध्यात्मिक पर्व है। इसका जो केंद्रीय तत्व है, वह है आत्मा। आत्मा ...

ज्ञान ही सर्व दुख कर्म से मुक्ति देता है। 

     स्थल: श्री राजेन्द्र भवन चेन्नई  विश्व हितेषी प्रभु श्रीमद् विजय राजेंद्र सुरीश्वरजी महाराज साहब के प्रशिष्यरत्न, राष्ट्रसंत, यूग प्रभावक श्रीमद् विजय जयंतसेनसुरीश्वरजी म.सा.के कृपापात्र सुशिष्यरत्न श्रुतप्रभावक मुनिप्रवर श्री डॉ. वैभवरत्नविजयजी म.सा.* के प्रवचन के अंश    🪔 *विषय : साधर्मिक भक्ति की सौंदर्यता*🪔 ~ जीवन में सर्वश्रेष्ठ मंगल सत्य है और सत्य एक ही है केवलि भगवंत द्वारा कहा हुआ धर्म और उनके अमूल्य वचन ही है। ~ जो ज्ञान सत्य है, शुद्ध है, स्पष्ट है वह ज्ञान ही सर्व दुख कर्म से मुक्ति देता है। ~ जीवन में ईमानदारी सर्वश्रेष्ठ धर्म है जो मानव के पास यह धर्म है उसे कुदरत के पूर्ण आशीर्वाद, सहाय मिलती है। ~ हमारे धन से हमारे दुखी,निर्धन साधर्मिक भाइयों की ऐसी भक्ति करें कि वह कभी भी दुखी रहे ही नहीं । ~ आबू संघवी जी ने 350 भाइयों को स्वयं जैसे करोड़पति बने थे । ~ परम पूज्य विरल ...

झुकना वहीं सफल है, जहां अपने कर्म झुक जाए: आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीजी

Sagevaani.com @किलपाॅक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्य केशरसूरी समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी ने अष्टान्हिका प्रवचन में कहा पर्यूषण के पांच कर्तव्य बताए गए हैं अमारी प्रवर्तन यानी अहिंसा का आचरण, साधर्मिक भक्ति, क्षमापना, अट्ठम तप और चैत्यपरिपाटी। उन्होंने कहा जगत में हरेक आत्मा का स्वभाव ज्ञान है। जीवों की रक्षा करना ज्ञानाचार है। उपशम बिना चारित्र का पालन नहीं होता। बड़े दिन जब भी आए, पांच मंदिरों के दर्शन करने चाहिए। वीर्याचार का पालन पांच मंदिर जाने से फलित होता है। चतुर्विध संघ साथ में रहने से उल्लास, अन्य लोगों के हृदय में प्रेम का प्रकाश प्रकट होता है। उन्होंने चैत्यपरिपाटी का एक उदाहरण देते हुए कहा जिनशासन का ध्वज कभी झुकता नहीं है। यह आन- बान- शान का प्रतीक है। उन्होंने कहा झुकना वहीं सफल है, जहां अपने कर्म झुक जाए। हमें कदाग्रह, पूर्वाग्रह और हमार...

भाषा में छपी है हर आशा: उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया

हमारे भाईन्दर में विराजीत उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया आदि ठाणा 7 साता पूर्वक विराजमान हैl वह रोज हमें प्रवचन के माध्यम से नित नयी वाणीnसुनाते हैं, वह इस प्रकार हैंl बंधुओं जैसे कि सिस्ट भाषा में छपी है हर आशाl जैसे की हाथ की खूबसूरती किसमे हैं महिलाओं के हाथ की खूबसूरती के लिए सोने की चूड़ियां पहनती है और पुरुष सोने का ब्रेसलेट पहनते हैंl हाथ की खूबसूरती सोने की कंगन और सोने के ब्रेसलेट से होती हैं, गले की खूबसूरती हीरे के हार और सोने की चैन से होती है पर इंसान की खूबसूरती इंसान की मिट्टी और माधुरी जुबान से होती हैंl इंसान की जिंदगी में तीन तरह के अमृत होने चाहिए हाथ में रखिए दान का अमृत दिल में रखिए दया का अमृत और जुबान पर रखिए मिठास का अमृतl यह तीन अमृत इंसान के पास होना चाहिए जिसके पास यह तीन अमृत है सच सचमुच वह अमृत पीकर हमारे प्रश्न है मीठा बोलो अच्छा बोलो प...

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