दान, शील, तप और त्याग इस देश की विशेषता है। भारत में पर्युषण पर्व ही ऐसा है जो दान, तप के लिए प्रेरित करता है। भगवान महावीर ने भी गुप्त दान को सर्वश्रेष्ठ दान की संज्ञा दी है।यदि दान नाम कमाने के लिए या पुण्य कमाने के लिए हो तो दान नहीं कहलाता है।
उक्त विचार पर्वाधिराज पर्युषण पर्व के अवसर पर श्री सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन जैन संघ में आयोजित धर्मसभा में आचार्य देवेंद्रसागरसूरिजी ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि दान देने वाला व लेने वाला दोनों ही सुपात्र होना चाहिए। ज्ञानियों ने कहा है कि हाथ की शोभा कंगन से नहीं दान से होती है। अहिंसा, सत्य और तप जिसके पास है, उन्हें देवता भी नमस्कार करते हैं। जो मानव शरीर के बजाय आत्मा का चिंतन करता है उसका जीवन सार्थक है। जैन धर्म में त्याग का सर्वाधिक महत्व बताया गया है।
श्रावक के कर्तव्यों में साधार्मिक भक्ति भी एक प्रमुख कर्तव्य है। जैन धर्म त्याग प्रधान, संयम प्रधान और समता प्रधान धर्म है। यह न केवल जैन धर्मावलंबियों के लिए अनुकरणीय है अपितु मानवता में विश्वास रखने वाले प्रत्येक मनुष्य के लिए अनुसरणीय है। तभी तो इसे जन धर्म और मानव धर्म भी कहा जाता है। जैन धर्म का सबसे बड़ा महापर्व है- पर्वाधिराज पर्युषण। यह पर्व है आत्मा की आराधना का, प्रमाद के विसर्जन का, कषायों के त्याग का, अज्ञान को दूर करने का।
आचार्य श्री ने आगे कहा कि पौषध व्रत की महिमा की परमात्मा ने स्वयंमुख से प्रशंसा की थी। पौषध व्रत लेने वाली भव्य आत्मा को एक दिन के लिए भी साधु के समान माना जाता है।
अज्ञान दूर करने का सशक्त माध्यम स्वाध्याय है। स्वाध्याय दृष्टि परिमार्जन का साधन है, स्वाध्याय द्वारा ज्ञानार्जन कर क्षीर नीर भेद करने की क्षमता का विकास करते हुए साहित्य के अध्ययन से स्वयं एक सुसंस्कृत समाज की रचना का मार्ग प्रशस्त करें। अंत में वे बोले पर्युषण पर्व मोह की नींद में सोए लोगों के लिए सबक लेकर आया है। इन दिनों संसार के मूल कारण- आठ कर्म छूट जाते हैं। कहा भी है- पर्वराज यह आ गया, चला जाएगा काल। परंतु कुछ भी ना मिला, टेढ़ी हमारी चाल॥हमारी चाल टेढ़ी है, पर्वराज न आता है, न जाता है। हम चले जा रहे हैं। हमें सांसारिक संबंधों से छुट्टी लेनी है, परिश्रम से नहीं।