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आत्मीयता में तटस्थता

आत्मीयता में तटस्थता

जिन्दगी चाहे कितनी ही छोटी क्यों न हो किन्तु उसे कोई भी एकाकी नहीं जी सकता। मनुष्य के लिए किसी का संग जरूरी है। इसी कारण मनुष्य नानाविध प्रकार के सम्बन्ध जोड़ता है। एक बात निश्चित है कि कोई भी व्यक्ति समूह से बिलकुल अलग नहीं रह सकता। साधु हो या गृहस्थ सामूहिक रूप से जीवन तो जीना ही पड़ता है किन्तु सम्बन्धों के सन्दर्भ में आत्मीयता के साथ सन्तुलन होना जरूरी है।

परिवार या समाज के प्रति मैत्री भाव रखने के साथ यदि उनसे अत्यधिक ममत्व जुड़ गया तो व्यक्ति शुभ कर्म के बजाय पाप कर्म का उपार्जन कर लेता है। जैसे जीव की रक्षा करना या अनुकम्पा करना धर्म है किन्तु उस जीव के प्रति अत्यधिक ममत्व भाव जुड़ जाएं तो अशुभ कर्म का बन्ध भी हो सकता है। इसलिए प्राणी मात्र के प्रति आत्मीयता रखते समय तटस्थता का विवेक, अनिवार्य है। जो व्यक्ति समस्त प्राणियों के प्रति मैत्री एवं सर्व जीवों के प्रति समभाव से ओत-प्रोत हो कर कार्य करता है वह पाप कर्म का बन्ध नहीं

यदि मनुष्य सामूहिक रूप से सबके साथ मिल-जुल कर मैत्री भाव से रहे, परस्पर सेवा-सहयोग, सहानुभूति एवं सह-अस्तित्व के आधार पर जिएं तो जीवन को उन्नत बनाया जा सकता है। तीर्थंकरों द्वारा तीर्थ स्थापना का मूल उद्देश्य भी यही है कि संघबद्ध होकर जीने से मनुष्य पाप कम करेगा और उसके कटुफल से बचकर आत्म-विकास की ओर उन्मुख होगा।
भगवान महावीर ने कहा, जहाँ उद्वेग या क्लेश होता हो उस स्थान को दूर से त्याग देना चाहिए। निमित्तों के अनुसार कभी राग का तो कभी द्वेष का पलड़ा भारी हो जाता है। अतः राग और द्वेष की न्यूनाधिकता का नाप-तोल करना बहुत कठिन है।

कुछ जीवों में राग की मात्रा अधिक होती है तो कुछ में द्वेष की मात्रा अधिक होती है। राग और द्वेष को मन्द करने के लिए शास्त्रकारों ने चार प्रकार के अनुराग बताये हैं।

(1) भावानुराग :- तत्व mका स्वरूप ज्ञात न होने पर
भी वीतराग परमात्मा कथित तत्व स्वरूप कभी असत्य नहीं होता ऐसी श्रद्धा रखना भावानुराग है।

(2) प्रेमानुराग :- जिन पर प्रेम एवं वात्सल्य हैं
उन्हें बार-बार तत्व ज्ञान की प्राप्ति हेतु सन्मार्ग की महत्ता व उपादेयता समझाकर धर्म में संलग्न करना प्रेमानुराग है।

(3) मज्जानुराग :- जिनके रग-रग में, हड्डियों में
और मज्जा-तन्तु में सद्धर्म के प्रति राग है वे धर्म से विपरित आचरण कभी नहीं करते। सद्धर्म का अर्थ है, श्रुत एवं चारित्र रूप धर्म ऐसे उत्तम धर्म के प्रति कल्याण कामना से प्रेरित होकर श्रद्धा-भक्ति और अनुराग रखना मज्जानुराग है।

(4) धर्मानुराग :- साधर्मिकों के प्रति वात्सल्य,
गुणी जनों के प्रति प्रेम और त्यागियों के प्रति भक्ति रखना धर्मानुराग है। इस प्रकार देव, गुरू और धर्म के प्रति अनुराग रखने से राग-द्वेष की मात्रा क्षीण हो जाती है।

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