जंगल में रहो या बस्ती में रहो, लहरों में रहो या कश्ती, महंगाई में रहो या सस्ती में रहो, लेकिन जँहा भी रहो जिनवाणी की मस्ती में रहो। मानव एक ऐसा मननशील प्राणी है जो कभी भी संतुष्ट नही होता है। *चाणक्य नीति के अनुसार मानव को तीन बातों में हमेशा संतुष्ट रहना चाहिये। पहला स्वंय की पत्नि/पति से दूसरा जो भोजन मिले उससे तीसरा जो धन मिला उससे। सोने के लिए साढ़े तीन गज जमीन और खाने के लिये पाव भर अनाज पहनने के लिये चार गज कपड़ा चाहिये। लेकिन संग्रह हमारा कम नही होता है, बन्द मुट्ठी आए है लेकिन खाली हाथ जाएंगे।
तीन बातों से हमेशा असंतुष्ट रहना चाहिये । पहला मुझे और पढ़ना है और अधिक ज्ञान प्राप्त करना है, दूसरा और अधिक जप तप करना है एंव और अधिक जप तप करना है । इच्छाए आकाश के समान होती है । घने जंगल में जाए और आकाश की तरफ देखता है तो आकाश बहुत नजदीक दिखता है, ह्दय रूपी आकाश में अनेक इच्छाए उठती रहती है, कुछ कल्याण कारी इच्छाए होती है जो हमें नीचे से ऊपर की और ले जाती है और कुछ बुरी इच्छाए हमें नीचे से ऊपर की और ले जाती है। देवी देवता के भीतर भी इच्छाए होती है। वो इच्छाए क्या होती है देवी देवता धरती पर क्यों आते है ये आगे समय आने पर पता चलेगा।
शतावधानी पूज्या श्री गुरु अरुण कीर्ति ने फरमाया की संगठन में शक्ति है, संघ का मुखिया, परिवार का मुखिया अगर संघ म सदस्यों की परिवार के सदस्यों की भावना को इशारों में ही समझ ले और उस अनुरूप निर्णय करे तो संघ समाज और परिवार में शांति बनी रहेगी। संघ प्रमुख की आज्ञा में चलने की ही संघ सदस्य का फायदा है, कोई भी कार्य करने के पहले परिवार के मुखिया की और सामूहिक कार्य में संघ प्रमुख को बताकर उससे सलाह लेकर कार्य नही किया तो पतन या नुकसान निश्चित है। नयसार कलाप्रमुख से पूछे बिना अपनी पत्नि को रंगमहल दिखाने ले जाता है और सातवीं मंजिल से दोनों नीचे गिरकर अपने प्राणों से हाथ धो बैठते है, यदि नयसार कलाप्रमुख को बताकर जाता तो हो सकता है उसकी सुरक्षा का व्यापक इंतजाम किया जाता और प्राण नही गंवाने पड़ते।